FMGE Result June 2026: विदेशी MBBS डिग्री धारकों का बेहद खराब रहा रिजल्ट, सिर्फ 12% डॉक्टर ही भारत में प्रैक्टिस के लिए हुए पास; जानें बड़ी वजह

FMGE Result June 2026: विदेशी MBBS डिग्री धारकों का बेहद खराब रहा रिजल्ट, सिर्फ 12% डॉक्टर ही भारत में प्रैक्टिस के लिए हुए पास; जानें बड़ी वजह

भारत में डॉक्टर बनने और एक प्रतिष्ठित सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला पाने के लिए नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट यानी नीट यूजी (NEET UG) परीक्षा को अच्छे रैंक से पास करना अनिवार्य होता है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) द्वारा हर साल आयोजित की जाने वाली इस परीक्षा में लाखों की संख्या में देश के होनहार छात्र बैठते हैं, लेकिन सीमित सीटों के कारण चंद हजार छात्र ही सरकारी कॉलेजों में जगह बना पाते हैं। इसके बाद बचे हुए छात्रों के पास या तो अगले साल दोबारा तैयारी करने का विकल्प होता है या फिर देश के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को चुनने का। हालांकि, भारत के प्राइवेट कॉलेजों की बेहद महंगी और आम बजट से बाहर की फीस के कारण हर साल हजारों छात्र मेडिकल की पढ़ाई के लिए विदेशों (Foreign Countries) का रुख कर लेते हैं।

लेकिन, विदेश से एमबीबीएस (MBBS) की डिग्री लेकर भारत लौटना और यहाँ डॉक्टर के रूप में अपनी प्रैक्टिस शुरू करना उतना आसान नहीं है, जितना सोशल मीडिया या कन्सल्टेंट्स के विज्ञापनों में दिखाया जाता है। हाल ही में जारी हुए ताजा सरकारी आंकड़ों ने विदेशी डिग्रियों की सफलता दर पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।

जून 2026 परीक्षा में सिर्फ 12.38% उम्मीदवार ही हुए सफल

नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) द्वारा 7 जुलाई 2026 को फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्जामिनेशन (FMGE) जून सत्र का परिणाम घोषित किया गया है। इस परीक्षा के नतीजों ने हर किसी को चौंका दिया है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस साल जून सत्र की परीक्षा में कुल 37,448 विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट्स शामिल हुए थे, जिनमें से महज 4,635 छात्र ही पास होने में कामयाब रहे। यानी इस बार का कुल पासिंग प्रतिशत सिर्फ 12.38% रहा है। तुलनात्मक रूप से देखें तो पिछले साल दिसंबर में आयोजित हुई एफएमजीई परीक्षा का पासिंग रेट 23.93% था, जो इस बार गिरकर लगभग आधा रह गया है।

क्या है भारत में प्रैक्टिस करने का नियम और FMGE का क्राइटेरिया?

भारत के कानून और नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के नियमों के अनुसार, यदि कोई भारतीय नागरिक विदेश के किसी भी विश्वविद्यालय से मेडिकल की पढ़ाई करके लौटता है, तो वह भारत में तब तक सीधे मरीजों का इलाज या सरकारी नौकरी नहीं कर सकता, जब तक वह FMGE परीक्षा पास करके 'पंजीकरण प्रमाण पत्र' (Registration Certificate) हासिल न कर ले।

  • परीक्षा का स्वरूप: NBEMS द्वारा यह परीक्षा साल में दो बार (जून और दिसंबर) आयोजित की जाती है।

  • पासिंग मार्क्स: यह परीक्षा कुल 300 अंकों की होती है, जिसमें किसी भी प्रकार की माइनस मार्किंग नहीं होती। परीक्षा को पास करने के लिए उम्मीदवार को न्यूनतम 150 अंक (यानी पूरे 50 प्रतिशत) लाना अनिवार्य होता है।

  • अटेम्प्ट्स की सीमा: इस परीक्षा को पास करने के लिए प्रयासों (Attempts) की कोई निश्चित सीमा नहीं है। फेल होने वाले छात्र अगली छमाही में दोबारा आवेदन कर परीक्षा में शामिल हो सकते हैं।

आखिर भारत के प्राइवेट कॉलेजों को छोड़ क्यों विदेश जाते हैं छात्र?

इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण दोनों जगह की पढ़ाई के खर्च में जमीन-आसमान का अंतर होना है। वर्तमान में भारत के अधिकांश टॉप प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस कोर्स की कुल फीस ₹60 लाख से लेकर ₹1 करोड़ से भी अधिक तक पहुंच जाती है। इसके विपरीत, भारत के पड़ोसी देशों और पूर्वी यूरोप जैसे नेपाल, कजाकिस्तान, बांग्लादेश, उज्बेकिस्तान, रूस और जॉर्जिया में यही पूरी डॉक्टरी की पढ़ाई ₹40 लाख से ₹50 लाख के कुल बजट (रहने और खाने के खर्च सहित) में पूरी हो जाती है। यही कारण है कि मिडिल क्लास परिवारों के बच्चे इन देशों को ज्यादा तरजीह देते हैं।

एक्सपर्ट्स की राय: क्यों लगातार गिर रहा है FMGE का पासिंग ग्राफ?

मेडिकल शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों और एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस खराब रिजल्ट के पीछे की बुनियादी कड़ी खुद नीट (NEET) परीक्षा से जुड़ी है। दरअसल, विदेशों में मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए जाने वाले अधिकांश छात्र वही होते हैं, जो या तो भारत की नीट परीक्षा में शामिल नहीं होते या फिर बहुत ही कम अंकों के साथ बॉर्डर लाइन पर क्वालीफाई होते हैं।

चूंकि FMGE परीक्षा का सिलेबस और प्रश्नों का स्तर भारत की नीट पीजी (NEET PG) और देश के कड़े क्लिनिकल मानकों के समान ही बेहद कठिन होता है, इसलिए बेसिक मेडिकल कॉन्सेप्ट्स कमजोर होने और विदेशों में भाषा व क्लिनिकल एक्सपोजर की कमी के कारण छात्र भारत लौटकर इस 50% के पासिंग क्राइटेरिया को भी पार नहीं कर पाते। विशेषज्ञों का कहना है कि विदेशों में दाखिला लेने से पहले छात्रों को कॉलेज के इतिहास और भारत के परीक्षा पैटर्न को ध्यान में रखकर ही कोई फैसला लेना चाहिए।

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