15 अगस्त 1947 को आजाद होकर भी अधूरा था भारत! जब हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर ने टेकने से इनकार किया था घुटने, जानें सरदार पटेल की कूटनीति से विलय की पूरी कहानी
15 अगस्त 1947 का दिन भारतीय इतिहास का सबसे स्वर्णिम दिन माना जाता है। लगभग 200 वर्षों की ब्रिटिश गुलामी के बाद भारत ने आजादी की सांस ली थी। लेकिन जिस समय देश की राजधानी दिल्ली में पंडित जवाहरलाल नेहरू का ऐतिहासिक भाषण गूंज रहा था, उस समय नए स्वतंत्र देश के नक्शे पर कई गहरे अनसुलझे सवाल लटक रहे थे। अंग्रेजों ने भारत छोड़ो आंदोलन और स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत भारत को विभाजित तो किया ही, साथ ही 565 देशी रियासतों (Princely States) को यह विकल्प भी दे दिया कि वे चाहें तो भारत में शामिल हों, पाकिस्तान में जाएं या फिर एक स्वतंत्र देश के रूप में अपना अस्तित्व बनाए रखें।
तमाम रियासतों ने भारत के गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और उनके प्रशासनिक सचिव वी.पी. मेनन के प्रयासों से विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए, लेकिन तीन रियासतों—जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर—ने 15 अगस्त 1947 तक भारत का हिस्सा बनने से साफ इनकार कर दिया था। इन तीनों रियासतों के अपने अलग-अलग भौगोलिक, राजनीतिक और धार्मिक समीकरण थे, जिन्हें सुलझाना सरदार पटेल के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य था।
जूनागढ़ का मामला: नवाब का पाकिस्तान प्रेम और जनमत संग्रह का फैसला
गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित जूनागढ़ रियासत चारों तरफ से भारतीय क्षेत्र से घिरी हुई थी, लेकिन समुद्री मार्ग से पाकिस्तान से जुड़ी थी। यहां की बहुसंख्यक आबादी (लगभग 80 प्रतिशत) हिंदू थी, जबकि यहां के नवाब महाबत खान III मुस्लिम थे। नवाब को कुत्तों का बहुत शौक था और वे शासन में कम रुचि लेते थे। जब 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ, तो जूनागढ़ के दीवान शाहनवाज भुट्टो (जो जुल्फिकार अली भुट्टो के पिता थे) के प्रभाव में आकर नवाब ने पाकिस्तान में विलय की घोषणा कर दी। पाकिस्तान ने भी 13 सितंबर 1947 को इस विलय को स्वीकार कर लिया।
नवाब के इस फैसले से जूनागढ़ की जनता में भारी आक्रोश फैल गया। बॉम्बे में समलदास गांधी के नेतृत्व में एक 'आरजी हुकूमत' (अस्थायी सरकार) का गठन हुआ और जनता ने नवाब के खिलाफ विद्रोह कर दिया। जूनागढ़ की आर्थिक नाकेबंदी कर दी गई। हालात बिगड़ते देख नवाब अपने कुत्तों और परिवार को लेकर कराची भाग गए। इसके बाद नवंबर 1947 में भारतीय सेना ने जूनागढ़ का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया। फरवरी 1948 में भारत सरकार ने वहां एक पारदर्शी जनमत संग्रह (Plebiscite) कराया, जिसमें 99 प्रतिशत से अधिक जनता ने भारत के पक्ष में मतदान किया और इस तरह जूनागढ़ औपचारिक रूप से भारत का अटूट हिस्सा बन गया।
हैदराबाद और ऑपरेशन पोलो: निजाम की जिद और भारतीय सेना का पुलिस एक्शन
हैदराबाद भारत की सबसे बड़ी और समृद्ध देशी रियासत थी। भारत के बिल्कुल केंद्र में स्थित इस रियासत का शासक दुनिया का सबसे अमीर व्यक्ति निजाम मीर उस्मान अली खान था। हैदराबाद की 85 प्रतिशत आबादी हिंदू थी, लेकिन सत्ता और सेना में मुस्लिम कुलीन वर्ग का वर्चस्व था। निजाम न तो भारत में शामिल होना चाहता था और न ही पाकिस्तान में; वह हैदराबाद को एक स्वतंत्र देश के रूप में स्थापित करने का सपना देख रहा था। उसने पाकिस्तान को वित्तीय मदद दी और लॉर्ड माउंटबेटन के जरिए ब्रिटेन से स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा मांगने की कोशिश की।
निजाम ने अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए 'रजाकार' नामक एक कट्टरपंथी अर्धसैनिक संगठन को छूट दी, जिसका नेतृत्व कासिम रिजवी कर रहा था। रजाकारों ने हैदराबाद में आम जनता, विशेषकर हिंदुओं पर अत्याचार, लूटपाट और हिंसा शुरू कर दी। जब कूटनीतिक बातचीत के सारे रास्ते बंद हो गए, तो गृह मंत्री सरदार पटेल ने कड़ा कदम उठाने का फैसला किया। 13 सितंबर 1948 को भारत सरकार ने 'ऑपरेशन पोलो' नाम से एक सैन्य कार्रवाई (जिसे आधिकारिक तौर पर पुलिस एक्शन कहा गया) शुरू की। मेजर जनरल जे.एन. चौधरी के नेतृत्व में भारतीय सेना ने हैदराबाद पर तीन तरफ से धावा बोला। मात्र 100 घंटे (5 दिन) से भी कम समय में रजाकार और निजाम की सेना पस्त हो गई। 17 सितंबर 1948 को निजाम ने आत्मसमर्पण कर दिया और हैदराबाद का भारत में पूर्ण विलय हो गया।
जम्मू-कश्मीर का मामला: महाराजा हरि सिंह की हिचकिचाहट और पाक प्रायोजित हमला
जम्मू-कश्मीर की स्थिति जूनागढ़ से बिल्कुल विपरीत थी। यहां की बहुसंख्यक आबादी मुस्लिम थी, जबकि शासक महाराजा हरि सिंह हिंदू (डोगरा राजवंश) थे। महाराजा हरि सिंह भारत या पाकिस्तान किसी भी देश में शामिल नहीं होना चाहते थे और उन्होंने दोनों देशों के साथ 'यथास्थिति समझौते' (Standstill Agreement) का प्रस्ताव रखा। पाकिस्तान ने इस समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए, लेकिन उसकी नजर कश्मीर घाटी पर कब्जा करने पर थी।
अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान ने अपनी सेना के अधिकारियों के नेतृत्व में हजारों पश्तून आदिवासियों (लश्कर) को आधुनिक हथियारों से लैस करके कश्मीर पर आक्रमण करवा दिया। हमलावरों ने बारामुला तक पहुंचकर भीषण लूटपाट और कत्लेआम मचाया तथा वे श्रीनगर की ओर बढ़ने लगे। अपनी रियासत और जनता को खतरे में देखकर महाराजा हरि सिंह ने भारत सरकार से सैन्य सहायता मांगी। भारत के गृह मंत्री सरदार पटेल और प्रधानमंत्री नेहरू ने स्पष्ट कर दिया कि जब तक कश्मीर भारत का कानूनी हिस्सा नहीं बनता, तब तक भारतीय सेना वहां हस्तक्षेप नहीं कर सकती। 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने 'विलय पत्र' (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर कर दिए। अगले ही दिन 27 अक्टूबर की सुबह भारतीय वायुसेना के विमानों से भारतीय सेना के वीर जवानों को श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतारा गया, जिन्होंने पाकिस्तानी हमलावरों को खदेड़ना शुरू किया और कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाया।
तीनों रियासतों के विलय का तुलनात्मक विवरण
| रियासत | शासक | बहुसंख्यक आबादी | भारत में विलय का माध्यम | विलय की अंतिम तिथि |
| जूनागढ़ | नवाब महाबत खान III | हिंदू (80%) | जनमत संग्रह (Plebiscite) | फरवरी 1948 |
| हैदराबाद | निजाम मीर उस्मान अली खान | हिंदू (85%) | सैन्य कार्रवाई (ऑपरेशन पोलो) | 17 सितंबर 1948 |
| जम्मू-कश्मीर | महाराजा हरि सिंह | मुस्लिम (77%) | विलय पत्र (Instrument of Accession) | 26 अक्टूबर 1947 |
सरदार वल्लभभाई पटेल का अटूट संकल्प और अखंड भारत का निर्माण
यदि 1947 में सरदार वल्लभभाई पटेल का दृढ़ संकल्प, कूटनीतिक दूरदर्शिता और कठोर निर्णय लेने की क्षमता न होती, तो भारत आज कई छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटा होता। हैदराबाद जैसी विशाल रियासत अगर भारत के पेट के मध्य में एक स्वतंत्र या दुश्मन देश के रूप में बनी रहती, तो यह भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए हमेशा एक नासूर बन जाती। सरदार पटेल और वी.पी. मेनन की जोड़ी ने साम, दाम, दंड, भेद का कुशल प्रयोग करते हुए 500 से अधिक रियासतों को एक तिरंगे के नीचे लाकर अखंड भारत के नक्शे की रचना की।