Dhanbad Rail News : रेल मंत्री के बड़े प्लान में धनबाद क्यों नहीं? जनता पूछ रही सवाल हमारा नंबर कब आएगा?

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News India Live, Digital Desk : भारतीय रेलवे हम सबकी लाइफलाइन है। हम सब चाहते हैं कि हमारे शहर के स्टेशन से ज्यादा से ज्यादा ट्रेनें चलें, वेटिंग लिस्ट का झंझट खत्म हो और सफर आसान हो जाए। अभी हाल ही में रेलवे की तरफ से एक बहुत बड़ी खबर आई है, जिसे सुनकर देश के कई शहरों के लोग तो खुश हैं, लेकिन झारखंड के धनबाद (Dhanbad) वालों का दिल थोड़ा टूट गया है।

असल में, भारतीय रेलवे ने भविष्य (2050 तक की आबादी) को ध्यान में रखते हुए एक "मास्टर प्लान" तैयार किया है। लेकिन सवाल यह है कि सबसे ज्यादा पैसा कमाकर देने वाला धनबाद इस रेस में पीछे क्यों है?

आइए, आसान भाषा में समझते हैं कि रेलवे का यह नया प्लान क्या है और इसमें किसका फायदा होने वाला है।

48 स्टेशनों का बदलेगा नक्षा (The Big Plan)

रेल मंत्रालय ने देश भर के 48 प्रमुख स्टेशनों की लिस्ट तैयार की है। प्लान यह है कि इन स्टेशनों के यार्ड (Yard) और पटरियों के ढांचे (Layout) को पूरी तरह बदल दिया जाएगा।

इसे आसान शब्दों में ऐसे समझिए—अभी कई स्टेशनों पर पटरियां कम हैं या उनका डिज़ाइन पुराना है, जिसकी वजह से ट्रेनें आउटर पर खड़ी रहती हैं और नई ट्रेनें चलाने की जगह नहीं बचती। अब इन 48 स्टेशनों पर "स्टैण्डर्ड लेआउट" बनाया जाएगा। इसका सीधा फायदा यह होगा कि इन स्टेशनों से अभी जितनी ट्रेनें चलती हैं, भविष्य में उसकी दोगुनी (Double) ट्रेनें चलाई जा सकेंगी।

यानी, अगर आज 50 ट्रेनें गुजर रही हैं, तो नए काम के बाद 100 ट्रेनें गुजर सकेंगी। है न कमाल की बात?

धनबाद वालों को क्यों आया गुस्सा?

अब आती है कड़वी सच्चाई। आप सभी जानते हैं कि धनबाद रेल मंडल (Dhanbad Division) रेलवे के लिए "कुबेर का खजाना" है। यह मंडल रेलवे को हर साल हजारों करोड़ की कमाई करके देता है (मुख्य रूप से कोयला ढुलाई से)।

बावजूद इसके, खबर है कि इस "48 स्टेशनों वाली लिस्ट" में धनबाद जंक्शन का नाम शामिल नहीं है या उस पर अभी संशय बना हुआ है। सोचिए, जिस स्टेशन से रेलवे की जेब भर रही है, उसे ही अपग्रेड करने में पीछे रखा जा रहा है।

वहीँ, इसके ठीक पड़ोसी स्टेशन जैसे दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन (DDU) और आसनसोल के पास के प्रधानखंटा जैसे इलाकों में काम तेजी से होने वाला है। रेलवे का फोकस उन रास्तों पर है जो दिल्ली-हावड़ा रूट को तेज करते हैं।

क्या धनबाद का नंबर कभी नहीं आएगा?

ऐसा नहीं है कि धनबाद में कुछ नहीं हो रहा। वहां "कोचिंग कॉम्पलेक्स" बनाने की बात चल रही है, लेकिन जिस रफ़्तार से बाकी स्टेशनों को 'डबल कैपेसिटी' के लिए तैयार किया जा रहा है, वैसा फोकस यहाँ नदारद है।

स्थानीय लोगों का कहना वाजिब है— "जब हम सबसे ज्यादा राजस्व (Revenue) देते हैं, तो सुविधाएँ सबसे बाद में क्यों मिलती हैं?" धनबाद से कई लंबी दूरी की ट्रेनें शुरू करने की मांग बरसों से हो रही है, लेकिन अगर स्टेशन की क्षमता नहीं बढ़ेगी, तो नई ट्रेनें चलेंगी कैसे?

भविष्य की तैयारी

रेलवे का यह कदम 2030 और उसके बाद के भारत के लिए है। आबादी बढ़ रही है, और लोग बढ़ रहे हैं। ऐसे में अगर पटरियां और प्लेटफार्म नहीं बढ़े, तो सिस्टम फेल हो जाएगा। इन 48 स्टेशनों पर काम पूरा होने के बाद 'रेल रोको' और 'आउटर पर इंतज़ार' जैसी समस्याएं कम हो जाएंगी।

आप क्या सोचते हैं?
क्या आपको नहीं लगता कि कमाई के हिसाब से धनबाद को 'वीआईपी ट्रीटमेंट' मिलना चाहिए था? या रेलवे की कोई और मजबूरी हो सकती है? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर रखें, क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना जरुरी है!