Contract Workers Strike : सरकार से आर-पार ,छत्तीसगढ़ में हजारों स्वास्थ्यकर्मियों ने एक साथ दिया इस्तीफा, थम सकती हैं सेवाएं
News India Live, Digital Desk: Contract Workers Strike : छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के हजारों संविदा कर्मचारी अब अपने ही भविष्य को लेकर सड़क पर उतर आए हैं. सालों से नियमितीकरण और वेतन विसंगति जैसी मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे इन कर्मचारियों के सब्र का बांध अब टूट चुका है. सरकार से आर-पार की लड़ाई का ऐलान करते हुए प्रदेश भर के हजारों NHM कर्मचारियों ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं पर बड़ा संकट मंडराने लगा है.
क्या हैं इन स्वास्थ्यकर्मियों की पीड़ा?
ये वो कर्मचारी हैं जो गांवों से लेकर शहरों तक, स्वास्थ्य योजनाओं को जमीन पर उतारने का काम करते हैं. टीकाकरण से लेकर संस्थागत प्रसव और मौसमी बीमारियों की रोकथाम तक, हर महत्वपूर्ण काम में इनकी भूमिका होती है. इसके बावजूद, उनकी अपनी नौकरी पक्की नहीं है. उनकी मुख्य मांगें हैं:
- नियमितीकरण: सालों से संविदा पर काम कर रहे इन कर्मचारियों की सबसे बड़ी मांग नौकरी में स्थायित्व यानी रेगुलराइजेशन की है. उनका कहना है कि वे सालों से सरकारी कर्मचारियों की तरह ही काम कर रहे हैं, लेकिन उन्हें स्थायी नौकरी के फायदे नहीं मिलते.
- वेतन विसंगति: समान पद पर काम करने वाले नियमित कर्मचारियों के मुकाबले संविदा कर्मचारियों का वेतन काफी कम है. वे इस वेतन विसंगति को दूर करने की मांग कर रहे हैं.
- नौकरी की सुरक्षा: संविदा पर होने के कारण उनकी नौकरी पर हमेशा तलवार लटकी रहती है. वे नौकरी की सुरक्षा चाहते हैं.
क्यों लिया सामूहिक इस्तीफे का फैसला?
NHM कर्मचारी संघ का कहना है कि वे पिछले कई सालों से अपनी मांगों को लेकर सरकार से गुहार लगा रहे हैं. उन्हें कई बार आश्वासन भी मिले, लेकिन आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई. विधानसभा चुनाव से पहले भी पार्टियों ने अपने घोषणापत्र में उन्हें नियमित करने का वादा किया था, जो अब तक अधूरा है.
सरकार की इसी बेरुखी से तंग आकर अब उन्होंने अंतिम कदम उठाते हुए सामूहिक इस्तीफे का फैसला किया है. उन्होंने साफ चेतावनी दी है कि जब तक उनकी मांगें नहीं मानी जातीं, वे काम पर वापस नहीं लौटेंगे. उनके इस कदम से प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं, खासकर ग्रामीण इलाकों में, बुरा असर पड़ सकता है. अब देखना यह है कि सरकार इन नाराज स्वास्थ्य 'योद्धाओं' की मांगों पर क्या फैसला लेती है.