बिहार में हार के बाद जागी कांग्रेस सालों बाद बनने जा रही है प्रदेश कमिटी

Post

News India Live, Digital Desk : कहते हैं न कि "जब जागो तभी सवेरा", लेकिन राजनीति में अगर जागने में बहुत देर हो जाए, तो सवेरा नहीं, अंधेरा हाथ लगता है। कुछ ऐसा ही हाल इन दिनों बिहार कांग्रेस (Bihar Congress) का है। चुनावों में मिली करारी हार और घटते जनाधार के बाद, आखिरकार पार्टी आलाकमान की नींद खुली है।

खबर आ रही है कि बिहार कांग्रेस अब जाकर अपनी प्रदेश कमिटी (State Committee) का गठन करने जा रही है। सुनने में यह एक आम खबर लग सकती है, लेकिन अगर आप बिहार की राजनीति को गहराई से समझते हैं, तो आप जानेंगे कि यह फैसला कितना बड़ा और कितना 'लेट' है।

इतिहास गवाह है: सालों से "भगवान भरोसे" चल रही पार्टी

आपको जानकर हैरानी होगी कि बिहार कांग्रेस का आखिरी बार जो पूर्ण और व्यवस्थित विस्तार (Expansion) हुआ था, वो तब हुआ था जब अशोक चौधरी (Ashok Choudhary) प्रदेश अध्यक्ष थे। और उन्हें गए हुए जमाना हो गया!
अशोक चौधरी के जाने के बाद अध्यक्ष तो बदले—कौकब कादरी आए, मदन मोहन झा आए, और अब अखिलेश प्रसाद सिंह हैं—लेकिन एक "जंबो कमिटी" या जमीन पर काम करने वाली पूरी फौज कभी बन ही नहीं पाई। पार्टी तदर्थ समितियों (Ad-hoc committees) के सहारे ही चलती रही।

हार ने खोली आंखें

हालिया चुनाव परिणामों ने (चाहे वो विधानसभा हो या उपचुनाव) कांग्रेस को आईना दिखा दिया है। आरजेडी के साथ गठबंधन में रहने के बावजूद पार्टी का स्ट्राइक रेट वो नहीं रहा जिसकी उम्मीद थी।
कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी थी। उनका कहना था, "भैया, जब संगठन ही नहीं है, जिला और प्रखंड स्तर पर जिम्मेदारियां ही तय नहीं हैं, तो हम लड़ें किसके लिए?"

इसी गुस्से और हार की समीक्षा के बाद अब यह तय हुआ है कि संगठन का ढांचा दोबारा खड़ा किया जाएगा।

क्या होगा नया?

अब कयास लगाए जा रहे हैं कि प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह (Akhilesh Prasad Singh) जल्द ही अपनी नई टीम का ऐलान करेंगे। इसमें:

  • पुराने वफादारों को जगह मिलेगी।
  • नाराज गुटों को मनाने की कोशिश होगी।
  • और सबसे जरुरी—युवाओं और जातीय समीकरणों (Caste Equations) को साधने पर जोर दिया जाएगा।

चुनौती अब भी बड़ी है

कमिटी बनाना आसान है, लेकिन उसे एक्टिव करना मुश्किल। बिहार में बीजेपी और जेडीयू का संगठन बूत स्तर (Booth Level) तक बेहद मजबूत है। आरजेडी का अपना आधार है। ऐसे में कांग्रेस, जो सिर्फ "गठबंधन की बैसाखी" बनकर रह गई है, क्या इस नई कमिटी के जरिए अपने पैरों पर खड़ी हो पाएगी?

सवाल बड़ा है क्या यह कवायद वाकई में पार्टी को जिंदा करेगी या फिर यह भी सिर्फ़ कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएगी? कार्यकर्ता तो यही उम्मीद लगाए बैठे हैं कि उन्हें उनका सम्मान और पद मिलेगा, ताकि वो फील्ड में जाकर लड़ सकें।

अब देखना दिलचस्प होगा कि इस नई लिस्ट में किसका नाम आता है और किसका पत्ता कटता है।