छत्तीसगढ़ के गोमर्डा अभयारण्य में क्या है खास? 1970 में गायब हुए काले हिरण
भारत के वन्यजीव मानचित्र पर जैव विविधता और प्रकृति के अद्भुत नजारों के लिए पहचाने जाने वाले छत्तीसगढ़ राज्य से पर्यावरण प्रेमियों और वन्यजीव संरक्षकों के लिए एक बहुत ही रोमांचक, सुखद और ऐतिहासिक खबर सामने आ रही है। छत्तीसगढ़ के सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में स्थित प्रसिद्ध 'गोमर्डा वन्यजीव अभयारण्य' (Gomarda Wildlife Sanctuary) इन दिनों देश भर के वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट्स के बीच चर्चा का केंद्र बना हुआ है। इस अभयारण्य का इतिहास अपने आप में अनूठा है, लेकिन पिछले कुछ दशकों से यहाँ एक बड़ी कमी महसूस की जा रही थी। आज से लगभग पांच दशक पहले यानी 1970 के दशक में कभी इस इलाके की शान हुआ करने वाले 'काला हिरण' यानी ब्लैकबक (Blackbuck) यहाँ के जंगलों से पूरी तरह विलुप्त हो गए थे। लेकिन अब वन विभाग और वन्यजीव संरक्षण बोर्ड के संयुक्त प्रयासों से एक बड़ा चमत्कार होने जा रहा है, और साल 2026 में इन्हीं विलुप्त हो चुके काले हिरणों की गोमर्डा अभयारण्य में दोबारा वापसी कराई जा रही है। आइए एक ग्राउंड और वाइल्डलाइफ रिपोर्टर की नजर से गहराई से जानते हैं कि गोमर्डा अभयारण्य की भौगोलिक विशेषता क्या है और काले हिरणों के इस ऐतिहासिक री-इंट्रोडक्शन प्रोजेक्ट की पूरी इनसाइड स्टोरी क्या है।
गोमर्डा वन्यजीव अभयारण्य का भौगोलिक परिदृश्य और इसकी प्राकृतिक विशेषताएं
छत्तीसगढ़ के सुदूर और घने जंगलों के बीच फैला गोमर्डा वन्यजीव अभयारण्य अपनी प्राकृतिक सुंदरता, घुमावदार पहाड़ियों, झरनों और समृद्ध वनस्पति के लिए जाना जाता है। इस अभयारण्य का कुल क्षेत्रफल लगभग 278 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है, जहाँ साल, सागौन और मिश्रित वनों की बहुतायत पाई जाती है। यहाँ की भौगोलिक बनावट और घास के मैदान (Grasslands) वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास के लिए सबसे मुफीद माने जाते हैं। इस अभयारण्य में पहले से ही तेंदुआ, जंगली सूअर, धारीदार लकड़बग्घा, भारतीय लोमड़ी, चीतल और विभिन्न प्रजाति के रंग-बिरंगे पक्षी निवास करते हैं। महानदी और उसकी सहायक नदियों के नजदीक होने के कारण यहाँ की पारिस्थितिकी (Ecology) वन्यजीवों के फलने-फूलने के लिए बेहद अनुकूल है। इसके बावजूद, लंबे समय से इस बात की कसक खल रही थी कि खुले घास के मैदानों की शोभा बढ़ाने वाला ब्लैकबक इस अभयारण्य से गायब था।
1970 के दशक में क्यों और कैसे गोमर्डा के जंगलों से गायब हो गए थे काले हिरण?
इतिहास के पन्नों को पलटें तो 1970 के दशक से पहले गोमर्डा और आसपास के मैदानी इलाकों में काले हिरणों की अच्छी खासी आबादी हुआ करती थी। लेकिन उस दौर में अनियंत्रित शिकार (Poaching), वनों की कटाई, इंसानी बस्तियों का तेजी से विस्तार और उनके प्राकृतिक घास के मैदानों के नष्ट होने के कारण इन खूबसूरत और संवेदनशील जीवों का जीवन खतरे में पड़ गया। देखते ही देखते शिकारियों के कुचक्र और मानवीय दखलअंदाजी के चलते गोमर्डा के जंगलों से काले हिरण हमेशा के लिए गायब हो गए। पिछले कई दशकों से स्थानीय प्रकृति प्रेमी और वन्यजीव संरक्षण संगठन लगातार यह मांग उठा रहे थे कि गोमर्डा के खुले पारिस्थितिकी तंत्र को उसका खोया हुआ वैभव वापस दिलाया जाए, जिसके लिए ब्लैकबक का पुनः यहां बसाया जाना बेहद जरूरी था।
2026 का ऐतिहासिक प्रोजेक्ट: काले हिरणों की सुरक्षित वापसी और विशेष री-इंट्रोडक्शन प्लान
वन विभाग और छत्तीसगढ़ शासन की वन्यजीव विंग ने मिलकर एक बेहद महत्वाकांक्षी 'री-इंट्रोडक्शन प्रोजेक्ट' तैयार किया है, जिसके तहत वर्ष 2026 में अन्य सुरक्षित राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्रों से काले हिरणों को लाकर गोमर्डा अभयारण्य में छोड़ा जा रहा है। इस पूरी प्रक्रिया को बेहद वैज्ञानिक और सावधानीपूर्वक अंजाम दिया जा रहा है। सबसे पहले गोमर्डा के भीतर काले हिरणों के अनुकूल एक बड़े बाड़े (Soft Release Enclosure) का निर्माण किया गया है, जहाँ उन्हें शुरुआती कुछ हफ्तों तक रखकर नए वातावरण के अनुकूल ढाला जा रहा है। विशेषज्ञ पशुचिकित्सकों और वन अधिकारियों की एक विशेष टीम लगातार उनकी सेहत, खानपान और गतिविधियों पर 24 घंटे नजर रख रही है। जब ये हिरण पूरी तरह से यहाँ की आबोहवा में ढल जाएंगे, तब उन्हें खुले जंगलों और घास के मैदानों में स्वतंत्र रूप से छोड़ दिया जाएगा।
स्थानीय इको-टूरिज्म को मिलेगा बढ़ावा और क्षेत्र के विकास की नई उम्मीदें
काले हिरणों के गोमर्डा अभयारण्य में वापस लौटने से न केवल इस क्षेत्र की जैव विविधता (Biodiversity) में अभूतपूर्व सुधार होगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर इको-टूरिज्म (Eco-Tourism) को भी एक बहुत बड़ा पंख लग जाएगा। छत्तीसगढ़ सरकार और पर्यटन विभाग इस बात को लेकर बेहद उत्साहित हैं कि इस दुर्लभ वन्यजीव के आने से देश-विदेश से वन्यजीव फोटोग्राफर, प्रकृति प्रेमी और पर्यटक गोमर्डा की तरफ आकर्षित होंगे। पर्यटकों के आने से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, होमस्टे और गाइड सेवाओं का विकास होगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। गोमर्डा अभयारण्य का यह प्रोजेक्ट इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो और वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाएं, तो इंसानों द्वारा कुदरत को पहुँचाए गए नुकसान को भी काफी हद तक सुधारा जा सकता है।