शिक्षकों की कमी से भड़के छात्र और ग्रामीण: धमतरी के स्कूल में बारिश के बीच जड़ा ताला, जमकर की नारेबाजी
छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले से शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलती एक बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है, जहां सरकारी स्कूलों में लंबे समय से शिक्षकों की भारी कमी से परेशान छात्र और स्थानीय ग्रामीण सड़क पर उतरने को मजबूर हो गए हैं। लगातार शिकायतों के बाद भी जब प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस सुनवाई नहीं हुई, तो गुस्साए ग्रामीणों और छात्र-छात्राओं ने तेज बारिश के बीच ही शासकीय स्कूल के मुख्य गेट पर ताला जड़ दिया और जमकर नारेबाजी शुरू कर दी। पढ़ाई बाधित होने से भविष्य को लेकर चिंतित बच्चों का यह गुस्सा इस बात का गवाह है कि ग्रामीण अंचलों में शिक्षा के हालात कितने बदतर हो चुके हैं। इस अनोखे और कड़े प्रदर्शन से शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन के अधिकारियों में हड़कंप मच गया है, और मौके पर पुलिस व प्रशासनिक टीम को स्थिति संभालने के लिए पहुंचना पड़ा। आइए आज के इस विस्तृत लेख में जानते हैं कि धमतरी के इस स्कूल में उपजे इस बड़े विवाद की पूरी वजह क्या है और ग्रामीण क्यों इस तरह उग्र प्रदर्शन करने पर मजबूर हुए।
लंबे समय से खाली पड़े हैं शिक्षकों के पद, बच्चों का भविष्य अधर में
किसी भी देश या राज्य के विकास की नींव वहां की शिक्षा व्यवस्था पर टिकी होती है, लेकिन ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों की तस्वीर आज भी कई सवाल खड़े करती है। धमतरी जिले के इस सुदूरवर्ती स्कूल में पिछले काफी समय से विभिन्न विषयों के शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं, जिसके कारण छात्र-छात्राओं की पढ़ाई पूरी तरह से ठप हो चुकी है। परीक्षा का समय नजदीक आ रहा है और कोर्स पूरा न होने की वजह से बच्चों के मन में भविष्य को लेकर भारी डर और अनिश्चितता बनी हुई है। अभिभावकों और स्कूल प्रबंधन समिति ने कई बार स्थानीय शिक्षा अधिकारियों और जिला प्रशासन के दफ्तरों के चक्कर काटे, लिखित आवेदन दिए और गुहार लगाई, लेकिन हर बार सिर्फ झूठे आश्वासन ही हाथ लगे। जब पानी सिर से ऊपर निकल गया और बच्चों की पढ़ाई का एक-एक दिन बर्बाद होने लगा, तो ग्रामीणों का सब्र आखिरकार टूट गया और उन्होंने स्कूल पर ताला लगाने का यह कड़ा कदम उठाया।
बारिश के बीच बच्चों और ग्रामीणों का अनोखा और उग्र प्रदर्शन
आमतौर पर खराब मौसम और तेज बारिश के दिनों में लोग अपने घरों से बाहर निकलना पसंद नहीं करते, लेकिन धमतरी के इस गांव में नजारा बिल्कुल अलग था। आसमान से बरसती तेज फुहारों और बारिश की परवाह किए बिना छोटे-छोटे स्कूली बच्चे, महिलाएं और ग्रामीण सुबह-सुबह स्कूल के सामने एकत्र हो गए। हाथों में तख्तियां और बैनर लेकर उन्होंने शिक्षा विभाग और सरकार के खिलाफ जोरदार नारेबाजी शुरू कर दी। बच्चों का कहना था कि जब स्कूल में पढ़ाने के लिए शिक्षक ही नहीं हैं, तो वे रोज स्कूल आकर क्या करेंगे? इस विरोध प्रदर्शन की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसमें पढ़ाई की महत्ता को समझने वाले ग्रामीण एकजुट थे और उन्होंने किसी भी तरह की हिंसा के बिना पूरी शिद्दत के साथ अपनी जायज मांग को प्रशासन के सामने रखा। इस दौरान स्कूल के शिक्षक और प्रशासनिक नुमाइंदे भी मौके पर पहुंचे, लेकिन ग्रामीणों ने साफ कह दिया कि अब कोरे आश्वासनों से काम नहीं चलेगा और जब तक पक्के तौर पर शिक्षकों की नियुक्ति नहीं होती, ताला नहीं खुलेगा।
प्रशासन की नींद टूटी, मौके पर पहुंचे अधिकारी और दिया आश्वासन
ग्रामीणों के इस उग्र और अनुशासित प्रदर्शन की खबर जैसे ही जिला मुख्यालय और शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों तक पहुंची, वैसे ही प्रशासन में खलबली मच गई। आनन-फानन में स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों और शिक्षा विभाग के ब्लॉक कोऑर्डिनेटरों का दल पुलिस बल के साथ मौके पर रवाना हुआ। अधिकारियों ने ग्रामीणों और छात्र-छात्राओं को शांत कराने की कोशिश की और उन्हें समझाने का प्रयास किया। अधिकारियों ने लिखित में आश्वासन दिया कि बहुत जल्द इस स्कूल में वैकल्पिक व्यवस्था के तहत शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति की जाएगी और स्थाई समाधान निकाला जाएगा। हालांकि, ग्रामीणों का कहना था कि वे कई बार ऐसे झूठे आश्वासनों का शिकार हो चुके हैं, इसलिए इस बार जब तक हकीकत में शिक्षक स्कूल नहीं पहुंच जाते, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा। प्रशासनिक अधिकारियों के कड़े रुख और समझाने के बाद फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन इस घटना ने पूरे जिले की शिक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।
ग्रामीण क्षेत्रों की शिक्षा व्यवस्था पर एक गंभीर सवालिया निशान
यह कोई पहली घटना नहीं है जब छत्तीसगढ़ या देश के किसी अन्य ग्रामीण हिस्से से शिक्षकों की कमी को लेकर इस तरह के विरोध प्रदर्शन की खबरें सामने आई हों। हर साल सरकारें शिक्षा के स्तर को सुधारने और डिजिटल शिक्षा के बड़े-बड़े दावे करती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई स्कूलों में आज भी बुनियादी शिक्षकों का अभाव है। एक शिक्षक के भरोसे पांच-पांच कक्षाओं को चलाने की मजबूरी के कारण न तो बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल पा रही है और न ही वे प्रतियोगी युग में टिक पा रहे हैं। धमतरी की इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि जब तक सरकार ग्रामीण स्कूलों में शिक्षकों के पदों को प्राथमिकता के आधार पर नहीं भरेगी, तब तक 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' और 'सबको शिक्षा, अच्छी शिक्षा' के नारे कागजी साबित होते रहेंगे। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में कितनी जल्दी ठोस कदम उठाता है और बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए क्या स्थाई व्यवस्था करता है।