चीरघर में शवों की तस्वीरें आंखों में घूमी तो त्यागा अन्न, जानिए कौन हैं मोहन वाल्मिकी

चीरघर में शवों की तस्वीरें आंखों में घूमी तो त्यागा अन्न, जानिए कौन हैं मोहन वाल्मिकी

आज के दौर में जहां लोग अपनी छोटी-छोटी जरूरतों और सुख-सुविधाओं के पीछे भागते हैं, वहीं हमारे ही समाज के बीच कुछ ऐसे निस्वार्थ लोग भी मौजूद हैं जिनकी इंसानियत और संवेदनशीलता की कहानियां सुनकर सिर श्रद्धा से झुक जाता है। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के सरकारी अस्पताल के चीरघर (पोस्टमार्टम हाउस) में जीवनदीप समिति के तहत बतौर सफाईकर्मी काम करने वाले 42 वर्षीय मोहन वाल्मिकी इन दिनों पूरे देश में चर्चा और सम्मान का केंद्र बने हुए हैं। वजह है लावारिस और अभागी आत्माओं व मृत शरीरों के प्रति उनका असीम और अलौकिक सम्मान। स्वीपर मोहन वाल्मिकी के इस त्याग की गंभीरता आप इसी बात से लगा सकते हैं कि उन्होंने पिछले 10 वर्षों से दिन का भोजन करना पूरी तरह से छोड़ दिया है। उनका मानना है कि इस दुनिया से रुखसत हो चुके बेजान शरीरों और आत्माओं के प्रति सम्मान प्रकट करने का यह उनका अपना अनूठा तरीका है। आइए एक संवेदनशील पत्रकार की नजर से गहराई से जानते हैं कि चीरघर की उस खौफनाक और गंधभरी चारदीवारी के बीच कैसे जन्मा यह अनोखा संकल्प और कौन हैं मोहन वाल्मिकी।

16 साल की मासूम उम्र में कंधों पर आया परिवार का बोझ, चीरघर के कड़वे सच से हुआ सामना

मोहन वाल्मिकी के इस कठिन और दर्दभरे जीवन सफर की शुरुआत आज से करीब 26 साल पहले हुई थी। उनके पिता धमतरी के जिला अस्पताल में पोस्टमार्टम प्रक्रिया के दौरान डॉक्टरों और पुलिस का सहयोग करने वाले स्वीपर के पद पर तैनात थे। जब मोहन महज 10वीं कक्षा में पढ़ रहे थे और अपनी पढ़ाई-लिखाई के सपने बुन रहे थे, तभी अचानक उनके पिता बहुत गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और बिस्तर पकड़ लिया। घर में राशन के लाले पड़ गए और परिवार का पेट पालने की पूरी जिम्मेदारी अचानक 16 साल के एक मासूम बच्चे के कमजोर कंधों पर आ टिकी। मजबूरी और पेट की आग बुझाने के लिए मोहन को पढ़ाई छोड़नी पड़ी और वे अपने पिता की जगह अस्पताल के चीरघर में शवों के विच्छेदन, धुलाई और देख-रेख के कठिन काम में उतर गए।

जब आंखों में घूमती थीं शवों की खौफनाक तस्वीरें: एक साल तक नहीं खा पाए थे सब्जी

जिस उम्र में बच्चे खेलते-कूदते हैं, उस उम्र में मोहन को रोजाना सड़ चुके, हादसों में कटे-फटे और खून से लथपथ इंसानी शवों को संभालना पड़ता था। अपने उन शुरुआती और भयावह दिनों की यादों को साझा करते हुए मोहन बताते हैं कि जब वे नए-नए चीरघर में आए थे, तो शवों और बहते खून को देखकर उनके हाथ-पैर कांपने लगते थे। काम खत्म करके जब वे घर लौटते थे, तो सोते-जागते उनकी बंद आंखों के सामने केवल पोस्टमार्टम वाले बेजान शवों और क्षत-विक्षत चेहरों की तस्वीरें ही घूमती रहती थीं। स्थिति यह हो गई थी कि शुरुआती पूरे एक साल तक वे घर पर बनी सब्जी तक नहीं खा पाते थे, क्योंकि लाल-हरी सब्जियों को देखकर उन्हें खून और शवों का ख्याल आ जाता था और वे तुरंत उल्टी कर देते थे। इसी घबराहट और मानसिक प्रभाव के कारण धीरे-धीरे उनकी दिन की भूख गायब हो गई और उन्होंने दिन में खाना खाना बंद कर दिया।

दिनभर सिर्फ चाय का सहारा, रात 11 बजे भोजन और नशा-मुक्त अनुशासित जीवन

समय बीतने के साथ मोहन को इस खौफनाक काम की आदत तो पड़ गई, लेकिन 10 साल पहले उन्होंने अपने भीतर उठने वाली मानवीय संवेदनाओं को एक पवित्र संकल्प में बदल दिया। मोहन ने तय किया कि जो बेजान शरीर रोजाना उनके हाथों से होकर अंतिम विदाई पाते हैं, उनके सम्मान में वे अब कभी दिन का भोजन नहीं करेंगे। अपने इस कड़े नियम के तहत वे सुबह से लेकर शाम तक अन्न का एक दाना भी मुंह में नहीं डालते। चीरघर के भीतर बेहद विकट और दुर्गंध भरे माहौल में घंटों काम करने के बाद वे पूरे दिन केवल चाय पीकर खुद को तरोताजा रखते हैं। दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद वे रात को लगभग 11 बजे ही पहली और आखिरी बार अपना सादा भोजन करते हैं। ताज्जुब की बात यह है कि चीरघर में काम करने वाले कई लोग अवसाद और गंध से बचने के लिए शराब का सहारा लेते हैं, लेकिन मोहन ने आज तक शराब या किसी अन्य नशे को हाथ तक नहीं लगाया है।

हजारों पोस्टमार्टम में किया सहयोग, आज भी Collector Rate पर काम करने को मजबूर

आज 42 वर्ष की आयु में पहुंच चुके मोहन वाल्मिकी अपने जीवनकाल में अब तक हजारों लावारिस और अन्य शवों के पोस्टमार्टम में डॉक्टरों का सहयोग कर चुके हैं। वे हर शव को उतने ही आदर और सम्मान से छूते हैं जैसे वह कोई जीवित इंसान हो। हालांकि, समाज को इंसानियत का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाने वाले मोहन की अपनी जिंदगी आर्थिक तंगहाली से जूझ रही है। वे आज भी कलेक्टर दर (Collector Rate) पर मात्र 10 हजार रुपये महीने के मानदेय पर जीवनदीप समिति के तहत अनुबंध पर काम कर रहे हैं। वे लंबे समय से अपनी सेवा के नियमितीकरण (Regularization) की मांग कर रहे हैं, लेकिन शासन-प्रशासन की फाइलों में उनका यह हक आज भी अटका हुआ है। इसके बावजूद, वे बिना किसी शिकायत के हर रोज पूरी निष्ठा के साथ अपनी इस निस्वार्थ सेवा में जुटे हुए हैं। मोहन वाल्मिकी का यह त्याग हमें यह सिखाता है कि पद या रुतबा चाहे जो भी हो, दिल में इंसानियत और मुर्दों के प्रति भी सम्मान का भाव होना ही इंसान को महान बनाता है।