50 सालों के नक्सली जख्मों पर मरहम लगाएगी सरकार, जानिए बस्तर की इनसाइड स्टोरी

50 सालों के नक्सली जख्मों पर मरहम लगाएगी सरकार, जानिए बस्तर की इनसाइड स्टोरी

भारत के नक्शे पर सुदूर और घने जंगलों से घिरा छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग दशकों से एक ऐसे खौफ, दर्द और अशांति के साए में जी रहा था, जिसकी कल्पना करना भी आम शहरवासियों के लिए मुश्किल होता है। गोलियों की तड़तड़ाहट, बारूदी सुरंगों (Landmines) के धमाके और अपनों को खोने का गम—यह बस्तर की वह खौफनाक दास्तान है जिसने पिछले 50 वर्षों से अधिक समय से इस धरती को लहूलुहान कर रखा था। लेकिन कहते हैं कि अंधेरी रात चाहे कितनी भी लंबी क्यों न हो, सवेरे की एक किरण सारे अंधकार को चीरकर बाहर आ ही जाती है। बस्तर के ही एक सुदूर और अति-संवेदनशील गांव से एक ऐसा भावुक कर देने वाला वाक्या सामने आया है, जिसे सुनकर किसी की भी आंखें नम हो जाएंगी। एक स्थानीय आदिवासी ग्रामीण ने सुरक्षा बलों का नया कैंप खुलने और शांति बहाل होने के बाद जब पूरे तीन साल के लंबे अंतराल के बाद अपने कांपते हाथों से खुद पानी का गिलास उठाकर पिया, तो उसकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। यह सिर्फ एक शख्स की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस पूरे इलाके की दास्तान है जिसके 50 सालों के गहरे जख्मों पर अब डबल इंजन सरकार और सुरक्षा बलों की मजबूत इच्छाशक्ति से मरहम लगने जा रहा है। आइए एक ग्राउंड और इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टर की नजर से गहराई से जानते हैं कि बस्तर के जंगलों में चल रहे इस ऐतिहासिक बदलाव की पूरी कहानी क्या है।

बंदूक और बारूद के साए में बीत गए पांच दशक: कैसे नर्क बन गया था आदिवासियों का जीवन?

आजादी के बाद के दशकों में जब देश विकास की नई ऊंचाइयों को छू रहा था, तब छत्तीसगढ़ के बस्तर, सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर जैसे इलाके माओवादी उग्रवाद और आतंकवाद की चपेट में पूरी तरह जकड़ते चले गए। नक्सलियों ने विकास के हर रास्ते को रोक दिया, स्कूल और अस्पताल बम से उड़ा दिए गए और सड़कों की जगह बारूद बिछा दिया गया। गांव के भोले-भाले आदिवासियों के लिए जीना मुहाल हो चुका था। यदि किसी ने पुलिस या प्रशासन की मदद करने की कोशिश की, तो उसे क्रूरता से मौत के घाट उतार दिया जाता था। इस खौफ के माहौल के कारण लोगों ने अपनों से मिलना, त्योहार मनाना और स्वतंत्र रूप से सांस लेना तक छोड़ दिया था। विकास की रोशनी इन इलाकों तक पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ देती थी। नक्सलियों के इस खूनी खेल ने बस्तर की पीढ़ियों को केवल दर्द, आंसू और डर के सिवा कुछ नहीं दिया।

विकास के पहिये को गति और सुरक्षा बलों का नया कैंप: कैसे बदल रही है बस्तर की तस्वीर?

पिछले कुछ समय से केंद्र और छत्तीसगढ़ सरकार ने वामपंथी उग्रवाद (Left Wing Extremism) के खिलाफ देश की सबसे बड़ी और निर्णायक नीति पर काम करना शुरू किया है। सरकार की रणनीति के तहत सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के गढ़ माने जाने वाले उन सुदूर भीतरी इलाकों में अपनी चौकियां (Security Camps) स्थापित करना शुरू कर दिया है, जहां आज तक कभी खाकी वर्दी वाला पुलिसकर्मी या तिरंगा झंडा नहीं पहुंच पाया था। इन नए सुरक्षा कैंपों के खुलने से न सिर्फ नक्सलियों का दायरा लगातार सिमटता चला गया है, बल्कि वहां के स्थानीय निवासियों में एक नया विश्वास जागा है। सड़क निर्माण, बिजली, पानी, मोबाइल नेटवर्क और पक्के स्कूलों जैसी बुनियादी सुविधाएं अब उन गांवों तक तेजी से पहुंच रही हैं जो दशकों से अंधेरे में डूबे हुए थे। सुरक्षा बलों की मौजूदगी ने आदिवासियों को यह भरोसा दिलाया है कि अब उन्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि राज्य और देश की ताकत उनके साथ खड़ी है।

तीन साल बाद जब कांपते हाथों ने उठाया पानी का गिलास: उस बेबसी और खुशी का जीवंत मंظر

उस ग्रामीण की यह मार्मिक घटना तब सामने आई जब सुरक्षा बलों की एक टुकड़ी ने एक अति-संवेदनशील क्षेत्र में नया फारवर्ड ऑपरेटिंग बेस (FOB) स्थापित किया। उस इलाके में पिछले तीन वर्षों से नक्सलियों की आवाजाही और भीषण गोलीबारी के कारण ग्रामीणों का घरों से बाहर निकलना भी दूभर हो गया था। डर इस हद तक था कि लोग अपने घरों के भीतर भी घुट-घुट कर जीने को मजबूर थे और कई बार प्यास बुझाने के लिए भी उन्हें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था। जब सुरक्षा जवानों ने वहां पहुंचकर मोर्चा संभाला और इलाके को सुरक्षित घोषित किया, तो उस ग्रामीण ने पहली बार बिना किसी खौफ के अपने रसोईघर तक खुलकर कदम रखा। उसने जब अपने हाथों से पानी का गिलास उठाया और पानी पिया, तो उसके हाथ कांप रहे थे। उसने नम आंखों से जवानों से कहा कि पिछले तीन साल से उसने कभी चैन की सांस नहीं ली थी, और आज पहली बार उसे ऐसा महसूस हुआ है कि वह इस दुनिया में आजाद इंसान की तरह जी रहा है। यह दृश्य वहां मौजूद कड़े मिजाज वाले सुरक्षा अधिकारियों और जवानों की आंखों को भी नम कर गया।

सरकार का व्यापक पुनर्वास और विकास पैकेज: बस्तर के हर घर तक पहुंचेगी राहत

सुरक्षा बलों की इस सफलता के पीछे केवल सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि सरकार की एक व्यापक 'सरेंडर और पुनर्वास नीति' (Surrender and Rehabilitation Policy) भी उतनी ही प्रभावी साबित हो रही है। जो युवा बहकावे में आकर बंदूक उठाने को मजबूर हो गए थे, वे अब मुख्यधारा में लौट रहे हैं और सरकार उन्हें रोजगार, आवास तथा सम्मानजनक जीवनयापन के साधन मुहैया करा रही है। बस्तर के युवाओं के लिए खेलकूद प्रतियोगिताएं, कौशल विकास केंद्र और आधुनिक शिक्षा के द्वार खोले जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर महुआ प्रसंस्करण, इमली व्यापार और लघु वनोपजों (Minor Forest Produce) के सही दाम मिलने से आदिवासियों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार होने लगा है। सरकार का यह संकल्प है कि आने वाले कुछ ही वर्षों में बस्तर को देश के सबसे विकसित और शांत क्षेत्रों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया जाएगा, ताकि वहां के बच्चे बंदूक की गोली की आवाज के बजाय स्कूल की घंटी की आवाज सुनकर बड़े हों।

50 सालों के काले साये से मुक्ति की ओर बढ़ता बस्तर, भविष्य की नई सुबह

निसंदेह, बस्तर के 50 सालों के गहरे जख्मों को पूरी तरह भरने में थोड़ा वक्त जरूर लगेगा, लेकिन जिस इच्छाशक्ति के साथ सरकार और हमारे वीर जवान जमीन पर उतरकर काम कर रहे हैं, उसने यह साबित कर दिया है कि आतंक का अंत अब तय है। छत्तीसगढ़ का यह क्षेत्र अब बारूद की महक से दूर अपनी संस्कृति, पारंपरिक लोक नृत्यों, प्राकृतिक सुंदरता और विकास की नई इबारत लिखने के लिए पूरी तरह तैयार है। वह ग्रामीण जिसने तीन साल बाद अपने हाथ से पानी पिया, वह इस बात का जीता-जागता प्रतीक है कि बस्तर की जनता अब अंधेरे को पीछे छोड़कर उजाले की तरफ मजबूती से कदम बढ़ा चुकी है।