छत्तीसगढ़ में स्कूलों में मंत्र और प्रार्थना अनिवार्य करने की मांग खारिज, बिलासपुर हाईकोर्ट ने दिया बड़ा फैसला
छत्तीसगढ़ के शिक्षा जगत और कानूनी गलियारों से एक बेहद महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। बिलासपुर हाईकोर्ट ने राज्य के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में मंत्रोच्चार और विशेष प्रार्थना पाठ को अनिवार्य करने की मांग वाली जनहित याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। संविधान और देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को ध्यान में रखते हुए अदालत का यह फैसला बेहद ऐतिहासिक माना जा रहा है। याचिका खारिज होने के साथ ही माननीय हाईकोर्ट ने इस संवेदनशील विषय पर एक बेहद गंभीर और महत्वपूर्ण टिप्पणी भी की है, जिसकी चर्चा अब पूरे देश में होने लगी है।
जानिए किस मांग को लेकर दायर की गई थी यह याचिका
दरअसल, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर यह मांग की गई थी कि राज्य के सभी प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में सुबह की सभा के दौरान कुछ विशेष मंत्रों और धार्मिक प्रार्थनाओं के पाठ को अनिवार्य कर दिया जाए। याचिकाकर्ता का तर्क था कि इससे छात्रों में नैतिक मूल्यों और भारतीय संस्कृति का विकास होगा। हालांकि, इस मांग को लेकर शुरुआती दौर से ही कानूनी और सामाजिक स्तर पर बहस छिड़ गई थी कि क्या किसी लोकतांत्रिक और बहुसांस्कृतिक देश में ऐसा फैसला थोपा जा सकता है।
याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने की यह बड़ी टिप्पणी
मामले की गहन सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि भारत का संविधान हर नागरिक को अपनी पसंद के धर्म को मानने और उसका आचरण करने की स्वतंत्रता देता है। अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि सरकारी सहायता प्राप्त या किसी भी सामान्य शिक्षण संस्थान में किसी विशेष धार्मिक विचार, मंत्र या प्रार्थना को अनिवार्य रूप से लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने साफ किया कि स्कूलों का माहौल ऐसा होना चाहिए जहां सभी धर्मों और आस्थाओं के बच्चों को एक समान और सहज वातावरण मिल सके, न कि उन पर कोई विशेष आचरण थोपा जाए।
कानूनी और सामाजिक हलकों में क्यों हो रही है इस फैसले की चर्चा
बिलासपुर हाईकोर्ट के इस कड़े रुख के बाद राज्य के शिक्षा विभाग, बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों ने राहत की सांस ली है। कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला देश के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों (Secularism) को और मजबूती प्रदान करता है। इस आदेश के बाद अब यह पूरी तरह साफ हो गया है कि स्कूलों में प्रार्थना सभाएं पहले की तरह सामान्य और सर्वधर्म समभाव पर आधारित रहेंगी। वहीं, फैसले के आते ही सोशल मीडिया और प्रशासनिक हलकों में इस बात को लेकर विमर्श शुरू हो गया है कि शिक्षा व्यवस्था में धार्मिक प्रतीकों की सीमा क्या होनी चाहिए।