छत्तीसगढ़: राज्यपाल और सीएम को 3 प्रमुख मांगों के साथ भेजा कड़ा पत्र, दिया 10 दिन का अल्टीमेटम

छत्तीसगढ़: राज्यपाल और सीएम को 3 प्रमुख मांगों के साथ भेजा कड़ा पत्र, दिया 10 दिन का अल्टीमेटम

छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में इस समय एक ऐसी घटना ने तूल पकड़ लिया है जिसने शासन-प्रशासन की नींद उड़ा दी है. राज्य के विभिन्न हिस्सों में अपने अधिकारों, शिक्षा और सुरक्षा की मांग को लेकर बच्चों और युवाओं के सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करने के बाद अब 'सिटीजंस फॉर जस्टिस एंड पीस' (CJP) जैसे प्रतिष्ठित और सक्रिय संगठनों ने इस मामले में सीधी एंट्री ले ली है. बच्चों के उबलते आक्रोश और उनकी दयनीय एवं संघर्षपूर्ण स्थिति को गंभीरता से लेते हुए सीजेपी ने सीधे तौर पर छत्तीसगढ़ के महामहिम राज्यपाल और माननीय मुख्यमंत्री को एक बेहद कड़ा पत्र प्रेषित किया है. इस पत्र के माध्यम से सरकार के सामने स्पष्ट रूप से तीन सूत्रीय मुख्य मांगें रखी गई हैं और साथ ही प्रशासन को कड़ी कार्रवाई करने के लिए महज 10 दिनों का अल्टीमेटम भी सौंपा गया है. छत्तीसगढ़ के जनजातीय और ग्रामीण अंचलों से लेकर शहरी इलाकों तक बच्चों के इस प्रकार सड़क पर उतरने और न्याय की गुहार लगाने की तस्वीरों ने देश भर के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. इस हाई-प्रोफाइल हस्तक्षेप के बाद अब राज्य सरकार और प्रशासनिक अमले पर भारी दबाव बन गया है कि वे बिना किसी देरी के इन मांगों पर विचार करें और बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए ठोस कदम उठाएं, अन्यथा आने वाले दिनों में यह आंदोलन और अधिक व्यापक रूप ले सकता है.

सड़कों पर उतरे मासूम बच्चों का दर्द और शासन-प्रशासन की सुस्ती पर तीखे सवाल

जब देश के भविष्य यानी छोटे-छोटे बच्चों को अपनी बुनियादी सुविधाओं, स्कूल की जर्जर हालत, सुरक्षित माहौल और मूलभूत अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करना पड़े, तो यह किसी भी सभ्य समाज और जिम्मेदार शासन व्यवस्था के लिए बेहद शर्मनाक स्थिति मानी जाती है. छत्तीसगढ़ के कई जिलों में हाल ही में देखने को मिला कि कैसे स्कूली बच्चों ने अपनी पढ़ाई लिखाई और खेलकूद की उम्र में हाथों में तख्तियां लेकर शासन-प्रशासन के खिलाफ हुंकार भरी. बच्चों का आरोप था कि उनके स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है, पीने के लिए शुद्ध पानी तक उपलब्ध नहीं है और दूर-दराज के इलाकों से स्कूल आने जाने के लिए सुरक्षित रास्तों या परिवहन का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है. इन तमाम व्यवस्थागत कमियों के कारण जब प्रशासनिक अधिकारियों ने उनकी शिकायतों पर लंबे समय तक कोई ध्यान नहीं दिया, तो बच्चों का यह घुमड़ता हुआ आक्रोश अंततः सड़कों पर लावा बनकर फूट पड़ा. बच्चों के इन आंसुओं और उनकी संघर्ष भरी आवाज़ को जमीन से उठाकर सीधे राजभवन और मुख्यमंत्री सचिवालय तक पहुँचाने का काम सीजेपी संगठन ने किया है, जिसने यह साबित कर दिया है कि समाज के सबसे कमजोर और बेजुबान तबके की आवाज को दबाया नहीं जा सकता.

CJP द्वारा राज्यपाल और मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र में शामिल हैं ये 3 प्रमुख और अहम मांगें

सिटीजंस फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) द्वारा छत्तीसगढ़ के सर्वोच्च पदों पर बैठे राजनेताओं और प्रशासकों को जो आधिकारिक पत्र भेजा गया है, उसमें मुख्य रूप से तीन बेहद गंभीर और व्यावहारिक मांगें रखी गई हैं, जिन पर तुरंत अमल करने की जरूरत है. पहली मांग यह है कि राज्य के सभी सरकारी और दूरदराज के ग्रामीण स्कूलों में बुनियादी शैक्षणिक बुनियादी ढांचे (Infrastructure), योग्य शिक्षकों की नियुक्ति और पेयजल जैसी अनिवार्य सुविधाओं को युद्ध स्तर पर दुरुस्त किया जाए ताकि बच्चों को पढ़ाई के लिए भटकना न पड़े. दूसरी मुख्य मांग यह उठाई गई है कि बच्चों की सुरक्षा और उनके कल्याण से जुड़े मामलों में जो स्थानीय अधिकारी और प्रशासनिक अमला अब तक अपनी जिम्मेदारियों से मुंह चुराता रहा है या जिनकी लापरवाही के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है, उनके खिलाफ सख्त विभागीय जांच बैठाकर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए. तीसरी और अंतिम मांग के रूप में सीजेपी ने यह अल्टीमेटम दिया है कि बच्चों के अधिकारों के हनन और उन्हें इस तरह सड़कों पर प्रदर्शन करने के लिए मजबूर करने वाली परिस्थितियों की उच्च स्तरीय न्यायिक या स्वतंत्र जांच कराई जाए ताकि भविष्य में इस तरह की अमानवीय पुनरावृत्ति को पूरी तरह रोका जा सके. इन तीनों मांगों के दायरे में राज्य की पूरी शिक्षा और बाल-कल्याण प्रणाली की पोल खुलती नजर आ रही है, और सरकार के लिए इन सवालों से बचना अब लगभग असंभव हो गया है.

10 दिन का सख्त अल्टीमेटम और आने वाले दिनों में छत्तीसगढ़ की राजनीति पर इसका असर

सिटीजंस फॉर जस्टिस एंड पीस द्वारा छत्तीसगढ़ सरकार को दिया गया यह 10 दिनों का अल्टीमेटम अब प्रशासनिक गलियारों में काउंटडाउन की तरह देखा जा रहा है. यदि तय सीमा यानी अगले 10 दिनों के भीतर शासन की ओर से कोई ठोस, सकारात्मक और संतोषजनक कदम नहीं उठाया जाता है, तो संगठन ने राज्य स्तर पर एक बड़े जनआंदोलन, धरना-प्रदर्शन और कानूनी कानूनी उपायों का सहारा लेने की चेतावनी दी है. छत्तीसगढ़ में पहले से ही कई मुद्दों को लेकर विपक्ष सरकार पर हमलावर रहता है, और अब बच्चों के अधिकारों और उनके सड़कों पर उतरने के इस संवेदनशील मामले के जुड़ जाने से राजनीतिक तापमान और अधिक उबलने लगा है. विपक्षी दलों के नेताओं ने भी इस पत्र का समर्थन करते हुए सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया है और यह कहना शुरू कर दिया है कि मौजूदा सरकार में न तो बच्चे सुरक्षित हैं और न ही उनके भविष्य की कोई सुध ली जा रही है. आने वाले कुछ दिन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और प्रशासन के लिए बहुत ही अग्निपरीक्षा वाले साबित होने वाले हैं, क्योंकि जनता और मानवाधिकार संगठन अब किसी भी प्रकार के कोरे आश्वासनों या कागजी खानापूर्ति को स्वीकार करने के मूड में बिल्कुल नहीं दिखाई दे रहे हैं.

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