देश में J&K के बाद छत्तीसगढ़ में नेताओं की सुरक्षा पर उड़ रहे सबसे ज्यादा करोड़
देश के सबसे संवेदनशील और रणनीतिक राज्यों में गिने जाने वाले छत्तीसगढ़ को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और बड़ा खुलासा हुआ है। सुरक्षा और प्रशासनिक खर्च के नए आंकड़ों के अनुसार, देश में जम्मू-कश्मीर के बाद अगर किसी राज्य में नेताओं, जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक हस्तियों की वीआईपी सुरक्षा पर सरकारी खजाने का सबसे बड़ा हिस्सा पानी की तरह बहाया जा रहा है, तो वह छत्तीसगढ़ है। राज्य सरकार हर साल केवल माननीयों, मंत्रियों, पूर्व जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था, बुलेटप्रूफ गाड़ियों, एस्कॉर्ट और गार्ड्स पर औसतन 150 करोड़ रुपये से अधिक की भारी-भरकम राशि खर्च कर रही है। नक्सल प्रभावित क्षेत्र की आड़ में सुरक्षा के नाम पर हो रहे इस बेतहाशा खर्च को लेकर अब आम जनता और प्रशासनिक गलियारों में सवाल उठने शुरू हो गए हैं कि क्या वाकई इतने बड़े बजट का सही इस्तेमाल हो रहा है या यह केवल वीआईपी कल्चर का एक बड़ा जरिया बन चुका है।
#1 जम्मू-कश्मीर के बाद छत्तीसगढ़ क्यों बना नेताओं की सुरक्षा में सबसे बड़ा खर्चीला राज्य?
देश के राजनीतिक मानचित्र पर छत्तीसगढ़ की स्थिति हमेशा से नक्सल हिंसा और उग्रवाद के दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील रही है। साल 2013 का झीरम घाटी नक्सली हमला, जिसमें कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का सफाया हो गया था, उसके बाद से ही राज्य में जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा को लेकर सुरक्षा एजेंसियों और सरकार का रुख बेहद सख्त हो गया। वर्तमान आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में वर्तमान विधायकों, पूर्व विधायकों, सांसदों, विभिन्न निगम-मंडलों के अध्यक्षों और यहां तक कि जिला स्तरीय नेताओं को भी एक्स (X), वाई (Y), वाई-प्लस (Y+), जेड (Z) और जेड-प्लस (Z+) श्रेणी की वीआईपी सुरक्षा प्रदान की गई है। इस पूरी सुरक्षा व्यवस्था में हजारों सशस्त्र पुलिस बल (CAF), जिला पुलिस बल और विशेष सुरक्षा समूह (SSG) के जवान चौबीसों घंटे तैनात रहते हैं, जिनकी सैलरी, भत्ते और लॉजिस्टिक्स पर हर साल करीब 150 करोड़ रुपये का विशाल बजट खर्च होता है।
#1 बुलेटप्रूफ गाड़ियां, फ्यूल और एस्कॉर्ट का काफिला: सरकारी खजाने पर भारी पड़ रहा 'वीआईपी कल्चर'
नेताओं की सुरक्षा केवल गार्ड्स की तैनाती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा वाहनों के काफिले और लॉजिस्टिक्स पर खर्च होता है। राज्य के मुख्यमंत्री, गृहमंत्री और बस्तर व सरगुजा संभाग जैसे अत्यधिक नक्सल प्रभावित इलाकों में दौरा करने वाले नेताओं के लिए विशेष रूप से बुलेटप्रूफ (Bulletproof) फॉर्च्यूनर, सफारी और जिप्सी गाड़ियों का बेड़ा इस्तेमाल किया जाता है। इन बख्तरबंद गाड़ियों का रखरखाव (Maintenance) बेहद खर्चीला होता है और सामान्य गाड़ियों की तुलना में इनमें ईंधन की खपत बहुत अधिक होती है। इसके अलावा, एस्कॉर्ट गाड़ियों का काफिला, पायलट वाहन और जवानों के आने-जाने व ठहरने का दैनिक खर्च रोजाना लाखों रुपये में पहुंच जाता है। जनहित के विकास कार्यों के लिए इस्तेमाल होने वाला करदाताओं का यह पैसा हर साल नेताओं की सुरक्षा में स्वाहा हो रहा है।
#1 सुरक्षा ऑडिट पर उठे सवाल: क्या वास्तव में खतरे में हैं सभी नेता या सिर्फ रुतबे की जंग?
गृह मंत्रालय की गाइडलाइंस के अनुसार, किसी भी जनप्रतिनिधि या व्यक्ति को सुरक्षा देने से पहले खुफिया एजेंसियों (IB और स्टेट इंटेलिजेंस) द्वारा थ्रेट पर्सेप्शन रिपोर्ट (Threat Perception Report) यानी खतरे के आकलन की विस्तृत समीक्षा की जाती है। लेकिन छत्तीसगढ़ में जिस पैमाने पर जिला स्तर के नेताओं और पूर्व जनप्रतिनिधियों को भारी सुरक्षा मुहैया कराई गई है, उस पर अब एक्सपर्ट्स और इंटेलिजेंस के पूर्व अधिकारी भी उंगली उठाने लगे हैं। जानकारों का कहना है कि कई बार राजनीतिक दबाव और रुतबा दिखाने के लिए भी सुरक्षा श्रेणियों का आवंटन कर दिया जाता है। चुनाव खत्म होने के बाद भी कई पूर्व नेताओं से सुरक्षा वापस नहीं ली जाती, जिससे पुलिस महकमे में बल (Manpower) की भारी कमी हो जाती है और आम जनता की सुरक्षा के लिए थानों में जवानों का अकाल पड़ जाता है।
#1 आम जनता की सुरक्षा राम भरोसे, थानों में जवानों की कमी और नेताओं के घर पहरा
छत्तीसगढ़ में नेताओं की वीआईपी सुरक्षा का सबसे नकारात्मक असर आम जनता की कानून-व्यवस्था पर देखने को मिल रहा है। राज्य के मैदानी और शहरी इलाकों—जैसे रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग और भिलाई—के थानों में पुलिस बल की भारी कमी है। पुलिस की प्राथमिक जिम्मेदारी अपराध नियंत्रण और सड़कों पर नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, लेकिन हजारों जवानों को नेताओं के बंगलों के बाहर पहरेदारी करने, उनके काफिले को रास्ता देने और व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी (PSO) के रूप में तैनात कर दिया गया है। जनता और नागरिक संगठनों ने मांग उठाई है कि राज्य में सुरक्षा व्यवस्था का निष्पक्ष कैडर रिव्यू (Cadre Review) किया जाना चाहिए ताकि अनावश्यक सुरक्षा हटाकर उस बजट को राज्य की स्वास्थ्य, शिक्षा और पुलिस व्यवस्था के आधुनिकीकरण में लगाया जा सके।