400 मीटर का दुर्गम मार्ग भी पार नहीं कर सकी 102 एंबुलेंस, बीच रास्ते में मजबूर महिला ने दिया बच्चे को जन्म
छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य तंत्र और ग्रामीण इलाकों की बदहाल सड़क व्यवस्था की एक बेहद झकझोर देने वाली और संवेदनशील तस्वीर सामने आई है, जिसने सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। छत्तीसगढ़ के एक सुदूर ग्रामीण इलाके में प्रसव पीड़ा से तड़प रही एक गर्भवती महिला की मदद के लिए सरकार की महत्वाकांक्षी 102 महतारी एक्सप्रेस एंबुलेंस बुलाई गई थी, लेकिन खराब और दुर्गम रास्ते के चलते वह एंबुलेंस महज 400 मीटर की दूरी पर ही दम तोड़ गई और अस्पताल तक नहीं पहुंच सकी। पक्की सड़क और आवागमन के साधनों के अभाव के कारण एंबुलेंस खराब रास्ते को पार करने में पूरी तरह असमर्थ साबित हुई, जिसके चलते मजबूरन महिला को बीच रास्ते में ही एक बच्चे को जन्म देना पड़ा। इस अमानवीय और विकट परिस्थिति ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ग्रामीण अंचलों में आज भी प्रसव जैसी आपातकालीन स्थिति में सुरक्षित मातृत्व एक सपना बनकर रह गया है। इस घटना के सामने आने के बाद से स्थानीय ग्रामीणों में भारी आक्रोश है और वे बुनियादी सड़क सुविधाओं के लिए लंबे समय से की जा रही अपनी मांगों की उपेक्षा किए जाने से बेहद खफा हैं। आइए आज के इस विस्तृत लेख में जानते हैं कि इस दर्दनाक घटना का पूरा घटनाक्रम क्या है, 400 मीटर के उस दुर्गम रास्ते की क्या सच्चाई है और इसके बाद प्रशासनिक गलियारों में किस तरह की हलचल मची हुई है।
महतारी एक्सप्रेस का इंतजार और रास्ते में अटकी उम्मीदें
घटना के दिन एक गर्भवती महिला को अचानक तेज प्रसव पीड़ा शुरू हुई, जिसके बाद परिजनों ने बिना एक पल गंवाए स्वास्थ्य विभाग की आपातकालीन सेवा 102 एंबुलेंस को फोन पर सूचना दी। कुछ ही समय के भीतर एंबुलेंस सेवा मौके पर पहुंच भी गई और परिजनों ने राहत की सांस लेते हुए महिला को गाड़ी में बैठा दिया, ताकि समय पर उसे नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल पहुंचाया जा सके। लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं था कि जिस अस्पताल पहुंचने की वे उम्मीद कर रहे थे, वह सफर इतना कांटों भरा साबित होने वाला है। गांव से मुख्य सड़क तक आने वाला लगभग 400 मीटर का रास्ता इतना ज्यादा उबड़-खाबड़, पथरीला और दुर्गम था कि वहां किसी भी चार पहिया वाहन का चल पाना लगभग असंभव था। एंबुलेंस चालक ने अपनी पूरी कोशिश की कि वह किसी तरह इस कठिन मार्ग को पार कर ले, लेकिन गाड़ी के फंसने का डर और रास्ते की खराब हालत देखकर उसे वाहन को बीच रास्ते में ही रोकना पड़ गया। जब एंबुलेंस आगे नहीं बढ़ सकी, तो महिला की तकलीफ और ज्यादा बढ़ गई और परिजनों तथा वहां मौजूद महिलाओं की मदद से बीच रास्ते में ही प्रसव कराना पड़ा।
सड़क विहीन गांवों का दर्द और स्वास्थ्य सेवाओं की सीमाएं
यह घटना सिर्फ एक मरीज की परेशानी नहीं है, बल्कि यह देश और राज्य के उन तमाम ग्रामीण इलाकों की एक कड़वी सच्चाई है जहां आज भी स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी पक्की सड़कें नहीं पहुंच पाई हैं। छत्तीसगढ़ के कई ऐसे सुदूरवर्ती गांव हैं जहां बरसात के दिनों में या सामान्य दिनों में भी आवागमन के साधन भगवान भरोसे चलते हैं। जब भी गांव में कोई गंभीर मरीज या गर्भवती महिला होती है, तो उसे अस्पताल तक पहुंचाने के लिए एंबुलेंस तो दूर, खाट या डोली का सहारा लेना पड़ता है। 102 और 108 जैसी एंबुलेंस सेवाएं सरकार द्वारा जरूर चलाई जा रही हैं, लेकिन जब तक गांवों तक पहुंचने के लिए बेहतर सड़कें और बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार नहीं होगा, तब तक इन सेवाओं का पूरा लाभ अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक नहीं पहुंच सकता। इस घटना के बाद यह बहस फिर से छिड़ गई है कि क्या कागजी विकास योजनाओं और धरातल की बदहाली के बीच का यह अंतर कभी खत्म हो पाएगा।
जच्चा और बच्चा की स्थिति और ग्रामीणों का बढ़ता रोष
बीच रास्ते में इस तरह प्रसव होने के बाद हालांकि प्रारंभिक तौर पर जच्चा और बच्चा दोनों सुरक्षित बताए जा रहे हैं, लेकिन जिस तरह की जान जोखिम में डालने वाली परिस्थितियां बनीं, उसने हर किसी को सिहरा कर रख दिया है। अगर समय पर स्थानीय महिलाओं या परिजनों की सूझबूझ काम न आती, तो स्थिति और भी ज्यादा खतरनाक हो सकती थी। इस घटना से आक्रोशित ग्रामीणों ने प्रशासन के खिलाफ खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की है। उनका कहना है कि उन्होंने कई बार स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों को अपने गांव के रास्ते की बदहाली और सड़क निर्माण को लेकर लिखित आवेदन दिए थे, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला। ग्रामीणों का साफ तौर पर कहना है कि यदि अब भी प्रशासन नहीं जागा और इस 400 मीटर के रास्ते को पक्का नहीं किया गया, तो उन्हें और भी बड़े स्तर पर आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
प्रशासन की सफाई और भविष्य के लिए सुधार के दावे
इस संवेदनशील मामले के मीडिया में तूल पकड़ने और सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की नींद टूटी है। अधिकारियों ने इस मामले की जानकारी मिलने के बाद स्थिति का जायजा लेने और पूरे प्रकरण की जांच कराने की बात कही है। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि वे ग्रामीण क्षेत्रों में आपातकालीन सेवाओं को और अधिक सुगम बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं, और जहां इस तरह की भौगोलिक समस्याएं हैं, वहां वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर विचार किया जाएगा। वहीं, स्थानीय प्रशासन ने यह भी भरोसा दिलाया है कि ग्रामीण सड़क निर्माण योजना के तहत उस दुर्गम मार्ग को प्राथमिकता के सूची में शामिल करके जल्द से जल्द पक्का करने का प्रयास किया जाएगा। हालांकि, जनता अब कोरे आश्वासनों की बजाय जमीनी स्तर पर ठोस काम देखना चाहती है ताकि भविष्य में किसी भी अन्य गर्भवती महिला को इस तरह की अमानवीय पीड़ा से न गुजरना पड़े।