Chhattisgarh News : तमनार में बवाल खदान की जनसुनवाई में फूटा ग्रामीणों का गुस्सा, जलती गाड़ियां और घायल पुलिसकर्मी.
News India Live, Digital Desk : छत्तीसगढ़ को शांत प्रदेश माना जाता है, लेकिन आज रायगढ़ (Raigarh) जिले के तमनार (Tamnar) इलाके से जो तस्वीरें सामने आई हैं, वो वाकई चिंता में डालने वाली हैं। अक्सर हम सुनते हैं कि "विकास" के लिए उद्योगों का आना जरूरी है, लेकिन जब वही विकास स्थानीय लोगों के अस्तित्व पर भारी पड़ने लगे, तो गुस्सा कैसे फूटता है इसका जीता-जागता उदाहरण तमनार में देखने को मिला।
यहाँ एक जनसुनवाई (Public Hearing) चल रही थी, लेकिन देखते ही देखते वह जगह जंग के मैदान में बदल गई। गाड़ियों से उठतीं आग की लपटें और घायल पुलिसवाले इस बात की गवाही दे रहे हैं कि मामला बहुत ज्यादा बिगड़ चुका है।
आखिर हुआ क्या था? (What Really Happened?)
मामला तमनार के 'पेलमा' (Pelma) गाँव का है। यहाँ एक नई कोयला खदान (Coal Mine) के लिए जनसुनवाई आयोजित की गई थी। खबरों के मुताबिक, यह खदान एसईसीएल (SECL) की है, लेकिन इसे ऑपरेट करने का जिम्मा (MDO) एक निजी कंपनी (अडानी समूह से जुड़ी खबरें) के पास है।
स्थानीय ग्रामीण और आदिवासी समाज लंबे समय से इसका विरोध कर रहे हैं। उनका सीधा सा कहना है— "हमें कोयला नहीं, अनाज चाहिए। हमें अपनी जमीन नहीं देनी।"
जब प्रशासन ने भारी पुलिस बल के साथ जनसुनवाई शुरू करने की कोशिश की, तो वहां मौजूद हज़ारों ग्रामीणों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उनका आरोप था कि उन्हें सुनवाई स्थल के अंदर जाने से रोका जा रहा था और उनकी बात नहीं सुनी जा रही थी।
पत्थरबाजी, आगजनी और भगदड़
बहसबाजी से शुरू हुआ यह मामला अचानक हिंसक हो गया। गुस्सायी भीड़ बेकाबू हो गई। बताया जा रहा है कि बैरिकेड्स तोड़ दिए गए और पत्थरबाजी शुरू हो गई। इस अफरातफरी में पुलिस की कई गाड़ियों और वहां खड़ी निजी वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया।
सोचिए जरा, जो पुलिस सुरक्षा के लिए खड़ी थी, उन्हें ही जान बचाकर भागना पड़ा। इस झड़प में कई पुलिसकर्मी और अधिकारी बुरी तरह घायल हुए हैं। मौके पर "अडानी वापस जाओ" और "पेलमा खदान नहीं चाहिए" के नारे गूंजते रहे।
प्रशासन क्या कह रहा है?
फिलहाल तमनार का वह पूरा इलाका पुलिस छावनी में तब्दील हो गया है। रायपुर और आसपास के जिलों से अतिरिक्त फ़ोर्स मंगाई गई है। प्रशासन का कहना है कि उपद्रवियों की पहचान की जा रही है और उन पर सख्त एक्शन लिया जाएगा। लेकिन सवाल वही खड़ा है—क्या लाठी के जोर पर जनसुनवाई हो सकती है?
'जल, जंगल, जमीन' की लड़ाई
दोस्तों, यह पहली बार नहीं है जब छत्तीसगढ़ के इस इलाके में बवाल हुआ हो। हसदेव अरण्य (Hasdeo) हो या तमनार, आदिवासी अपनी जमीनों को बचाने के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्हें डर है विस्थापन (Displacement) का, प्रदूषण का और अपनी संस्कृति खोने का।
ग्रामीणों का कहना है कि वे फर्जी ग्राम सभाओं और जबरदस्ती जमीनों के अधिग्रहण के खिलाफ हैं। आज का यह बवाल प्रशासन के लिए एक चेतावनी भी है कि लोगों की भावनाओं को नजरअंदाज करके प्रोजेक्ट्स थोपना आसान नहीं होगा।
माहौल तनावपूर्ण लेकिन शांत
ताज़ा अपडेट के मुताबिक, फ़िलहाल स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन तनाव बरकरार है। पुलिस की सायरन और जले हुए वाहनों का मलबा बता रहा है कि आज तमनार में लोकतंत्र की एक कठिन परीक्षा हुई है।
आप क्या सोचते हैं?
क्या विकास के लिए खदाने जरूरी हैं? या फिर ग्रामीणों की मर्जी के बिना उनकी जमीन लेना गलत है? इस संवेदनशील मुद्दे पर आप किसका साथ देंगे सरकार का या ग्रामीणों का? अपनी राय कमेंट में जरूर रखें।