ईरान पर अमेरिका के नए प्रतिबंधों का शिकंजा: भारत के चावल, चाय और दवा निर्यात पर संकट के बादल
पश्चिम एशिया में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच अमेरिका द्वारा ईरान पर कसे जा रहे आर्थिक शिकंजे का असर अब भारतीय व्यापार पर भी साफ दिखने लगा है। वाशिंगटन की ओर से ईरान को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से अलग-थलग करने के लिए शुरू किए गए नए अभियानों और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) द्वारा तेहरान के साथ व्यापारिक गतिविधियों पर लगाई गई रोक ने भारत के लिए बड़ी चिंता खड़ी कर दी है। इसका सीधा असर भारत से ईरान होने वाले प्रीमियम बासमती चावल, चाय और फार्मास्यूटिकल्स (दवाओं) के निर्यात पर पड़ता नजर आ रहा है। भारतीय निर्यातकों और किसानों के लिए यह स्थिति एक नई और बड़ी व्यापारिक चुनौती बनकर उभरी है।
चावल और चाय के निर्यात पर मंडराया बड़ा खतरा
भारतीय चावल एक्सपोर्टर्स फेडरेशन के अनुसार, वर्ष 2026 की पहली छमाही में ही भारत ने ईरान को लगभग 38.31 करोड़ डॉलर (करीब 3,638 करोड़ रुपये) मूल्य के चावल का निर्यात किया है। ईरान भारतीय लंबे दाने वाले प्रीमियम बासमती चावल के सबसे बड़े और अहम विदेशी बाजारों में से एक है। अमेरिकी प्रतिबंधों और यूएई के रास्ते बंद होने से इस सप्लाई चेन में भारी रुकावट आई है। इसके अलावा, इसी अवधि में भारत से ईरान को लगभग 1.43 करोड़ डॉलर की चाय का निर्यात किया गया है। टी बोर्ड के जानकारों का मानना है कि यदि भुगतान और शिपिंग के वैकल्पिक रास्ते जल्द नहीं खोजे गए, तो उत्तर भारत के बासमती मिलर्स और चाय बागान मालिकों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
पेमेंट और दुबई रूट बंद होने से बढ़ी मुश्किलें
पारंपरिक रूप से भारत और ईरान के बीच का अधिकांश व्यापार संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के वित्तीय और कमर्शियल चैनलों के माध्यम से संचालित होता था। भारतीय व्यापारी यूएई के जरिए दिरहम या डॉलर में भुगतान प्राप्त करते थे। लेकिन अब यूएई द्वारा ईरान के साथ वित्तीय लेनदेन को निलंबित करने से बिचौलियों का यह मजबूत नेटवर्क कमजोर पड़ गया है। हालांकि दवाइयों और खाद्य वस्तुओं को मानवीय आधार पर कुछ तकनीकी छूट मिली हुई है, इसके बावजूद कड़े बैंकिंग अनुपालन (ओवर-कम्पलायन्स), महंगे शिपिंग फ्रेट और हाई मरीन इंश्योरेंस प्रीमियम के कारण लेवी और ट्रांजैक्शन की लागत काफी बढ़ गई है।
रणनीतिक और ऊर्जा सुरक्षा पर भी असर की आशंका
भारत और ईरान के द्विपक्षीय व्यापार में पिछले कुछ वर्षों में पहले ही भारी गिरावट आ चुकी है, जो वित्तीय वर्ष 2018-19 के 17 अरब डॉलर के शिखर से घटकर काफी नीचे आ चुका है। वर्तमान में यह व्यापार मुख्य रूप से आवश्यक और मानवीय छूट प्राप्त वस्तुओं तक सीमित है। इसके अलावा, भारत की ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट तथा इंटरनेशनल नॉर्थ-SOUTH ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) पर भी इन प्रतिबंधों की अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। जानकारों का कहना है कि यदि हालात ऐसे ही रहे, तो भारत को अपने कृषि उत्पादों के लिए नए और सुरक्षित वैश्विक बाजार तलाशने होंगे।