रिटायरमेंट के बाद टैक्स का हिसाब: वो 7 कमाई जिन पर सीनियर सिटीजन को देना होता है इनकम टैक्स
भारत में नौकरीपेशा और कामकाजी लोगों के बीच यह एक बहुत बड़ा और आम भ्रम है कि 60 वर्ष की आयु पूरी करने और सेवानिवृत्त (Retirement) होने के बाद उनकी सारी कमाई टैक्स-फ्री हो जाती है। आयकर विभाग के नियमों के अनुसार उम्र 60 या 80 साल होने से आपकी कर देनदारी समाप्त नहीं होती, बल्कि केवल बेसिक टैक्स छूट सीमा (Basic Exemption Limit) और कुछ कटौतियों का दायरा बदलता है। यदि किसी वरिष्ठ नागरिक की विभिन्न स्रोतों से होने वाली कुल वार्षिक आय कर-योग्य सीमा से अधिक हो जाती है, तो उन्हें अनिवार्य रूप से इनकम टैक्स देना होता है और आईटीआर (ITR) फाइल करना पड़ता है। अक्सर टैक्स नियमों की सटीक जानकारी न होने के कारण कई बुजुर्ग अनजाने में टैक्स चुकाने से चूक जाते हैं, जिसके चलते बाद में उन्हें आयकर विभाग से भारी जुर्माने और ब्याज के साथ डिमांड नोटिस का सामना करना पड़ता है। यदि आप या आपके परिवार में कोई वरिष्ठ नागरिक हैं, तो रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली उन 7 प्रमुख आय स्रोतों को समझना बेहद जरूरी है जिन पर सरकार टैक्स वसूलती है।
1. मासिक और अनकम्यूटेड पेंशन: 'सैलरी' हेड के तहत पूरी तरह टैक्सेबल
रिटायरमेंट के बाद हर महीने बैंक खाते में आने वाली नियमित मासिक पेंशन (Uncommuted Pension) को आयकर अधिनियम के तहत 'इनकम फ्रॉम सैलरी' (वेतन से आय) माना जाता है। चाहे पेंशन केंद्र सरकार, राज्य सरकार या निजी क्षेत्र के नियोक्ता से मिल रही हो, वह वरिष्ठ नागरिक के संबंधित टैक्स स्लैब के अनुसार पूरी तरह से कर-योग्य होती है।
हालांकि, राहत की बात यह है कि पेंशनभोगियों को भी नौकरीपेशा लोगों की तरह स्टैंडर्ड डिडक्शन (Standard Deduction) का लाभ मिलता है। इसके विपरीत, यदि किसी कर्मचारी ने रिटायरमेंट के समय अपनी पेंशन का एक हिस्सा एकमुश्त (Commuted Pension) ले लिया था, तो वह सरकारी कर्मचारियों के लिए पूरी तरह टैक्स-फ्री होता है और गैर-सरकारी कर्मचारियों के लिए ग्रेच्युटी नियमों के तहत आंशिक रूप से कर-मुक्त होता है। वहीं मृत कर्मचारी के आश्रितों को मिलने वाली फैमिली पेंशन (Family Pension) 'इनकम फ्रॉम अदर सोर्सेज' के तहत टैक्स के दायरे में आती है।
2. बैंक एफडी, आरडी और बचत खाते पर मिलने वाला ब्याज
वरिष्ठ नागरिकों की आय का सबसे मुख्य और सुरक्षित जरिया फिक्स्ड डिपॉजिट (FD), रेकरिंग डिपॉजिट (RD) और सेविंग्स अकाउंट होता है। कई बुजुर्ग यह मान लेते हैं कि बैंक से मिलने वाला ब्याज पूरी तरह कर-मुक्त है, जबकि ऐसा नहीं है।
ओल्ड टैक्स रिजीम (Old Tax Regime) के तहत आयकर की धारा 80TTB वरिष्ठ नागरिकों (60 वर्ष या अधिक) को बैंक, सहकारी बैंक और डाकघर के सभी ब्याज पर एक वित्तीय वर्ष में अधिकतम ₹50,000 तक की विशेष टैक्स छूट देती है। यदि पूरे साल में कुल ब्याज ₹50,000 से ₹1 भी अधिक होता है, तो अतिरिक्त राशि आपकी कुल आय में जुड़ जाती है और उस पर टैक्स लगता है। इसके अतिरिक्त, यदि बैंक में ब्याज ₹50,000 की सीमा को पार करता है, तो बैंक स्वतः 10% की दर से टीडीएस (TDS) काट लेते हैं। यदि आपकी कुल आय कर योग्य सीमा से कम है, तो टीडीएस कटने से बचाने के लिए वित्तीय वर्ष की शुरुआत में ही बैंक में 'फॉर्म 15H' जमा करना अनिवार्य होता है। न्यू टैक्स रिजीम में धारा 80TTB की छूट उपलब्ध नहीं होती है।
3. सीनियर सिटीजन सेविंग्स स्कीम (SCSS) और पोस्ट ऑफिस योजनाएं
केंद्र सरकार द्वारा वरिष्ठ नागरिकों के लिए संचालित 'सीनियर सिटीजन सेविंग्स स्कीम' (SCSS), नेशनल सेविंग्स सर्टिफिकेट (NSC) और पोस्ट ऑफिस मंथली इनकम स्कीम (POMIS) में निवेश पर आकर्षक और सुरक्षित रिटर्न मिलता है।
एससीएसएस में किए गए निवेश पर ओल्ड टैक्स रिजीम के तहत धारा 80C में ₹1.5 लाख तक की छूट जरूर मिलती है, लेकिन इससे मिलने वाला तिमाही ब्याज पूरी तरह टैक्सेबल होता है। डाकघर या बैंक इस योजना के तहत मिलने वाले ब्याज पर वरिष्ठ नागरिक के लिए ₹50,000 से अधिक होने पर टीडीएस की कटौती करते हैं। यह पूरी ब्याज राशि वरिष्ठ नागरिक की कुल आय में 'अदर सोर्सेज' के रूप में जोड़ी जाती है।
रिटायरमेंट के बाद इनकम टैक्स का हिसाब: समझें बाकी 4 अहम आमदनी और टैक्स नियम
4. प्रॉपर्टी और मकान से मिलने वाला किराया (Rental Income)
कई वरिष्ठ नागरिक रिटायरमेंट के बाद अपनी दूसरी संपत्ति, दुकान, व्यावसायिक जगह या मकान के किसी हिस्से को किराए पर देकर नियमित आमदनी हासिल करते हैं। किराए से होने वाली यह कमाई 'इनकम फ्रॉम हाउस प्रॉपर्टी' (Income from House Property) हेड के तहत सीधे तौर पर कर-योग्य होती है।
किराए की आय की गणना करते समय सरकार मकान मालिक को कुछ राहतें देती है। कुल प्राप्त किराए में से नगर निगम टैक्स (Municipal Taxes) घटाने के बाद बची हुई शुद्ध राशि पर 30% का सीधा 'मानक कटौती' (Standard Deduction) मिलता है, जो घर के रखरखाव और मरम्मत के लिए माना जाता है। इसके बाद बची हुई 70% रेंटल इनकम पर वरिष्ठ नागरिक को अपने टैक्स स्लैब के अनुसार कर का भुगतान करना पड़ता है।
5. म्यूचुअल फंड, शेयर बाजार और प्रॉपर्टी की बिक्री से कैपिटल गेन्स
रिटायरमेंट के बाद चिकित्सा खर्चों, बच्चों की शादी या किसी अन्य जरूरत के लिए जब बुजुर्ग अपने पुराने निवेश—जैसे इक्विटी म्यूचुअल फंड, शेयर, सोना या कोई अचल संपत्ति (जमीन/मकान)—बेचते हैं, तो उस पर होने वाला मुनाफा 'पूंजीगत लाभ' (Capital Gains) कहलाता है और उस पर भारी टैक्स लगता है:
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इक्विटी म्यूचुअल फंड और शेयर्स (LTCG): 12 महीने से अधिक समय तक रखे गए शेयर्स या इक्विटी फंड्स को बेचने पर एक वित्तीय वर्ष में ₹1.25 लाख तक का लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन टैक्स-फ्री होता है। इसके ऊपर के किसी भी मुनाफे पर फ्लैट 12.5% की दर से टैक्स लागू होता है।
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शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन (STCG): एक साल से पहले बेचे गए इक्विटी फंड्स और शेयर्स के मुनाफे पर फ्लैट 20% टैक्स लगता है।
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रियल एस्टेट और प्रॉपर्टी: जमीन या मकान की बिक्री पर बिना इंडेक्सेशन लाभ के 12.5% की दर से लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स देना होता है।
6. एनपीएस (NPS) और इंश्योरेंस कंपनियों से मिलने वाली नियमित एन्युइटी
नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) या किसी बीमा कंपनी की रिटायरमेंट/पेंशन पॉलिसी (Annuity Plans) में जब कोई व्यक्ति 60 की उम्र में रिटायर होता है, तो कुल जमा फंड का कम से कम 40% हिस्सा एन्युइटी खरीदने में लगाना अनिवार्य होता है।
एनपीएस से निकाली गई 60% एकमुश्त रकम पूरी तरह से टैक्स-फ्री होती है, लेकिन जो 40% रकम एन्युइटी सर्विस प्रोवाइडर (बीमा कंपनी) के पास जाती है और जिसके बदले जीवन भर हर महीने या हर तिमाही 'एन्युइटी पेंशन' मिलती है, वह रकम पूरी तरह कर-योग्य होती है। यह एन्युइटी पेआउट हर साल आपकी आमदनी में जुड़ता है और उस पर लागू टैक्स स्लैब के हिसाब से इनकम टैक्स काटा जाता है।
7. कंसल्टेंसी, पार्ट-टाइम काम और गैर-रिश्तेदारों से मिले उपहार
कई वरिष्ठ नागरिक अपनी विशेषज्ञता और अनुभव के आधार पर रिटायरमेंट के बाद भी खाली बैठने के बजाय किसी कंपनी में एडवाइजर, लीगल/टेक्निकल कंसलटेंट, बोर्ड मेंबर या पार्ट-टाइम फ्रीलांसर के रूप में सेवाएं देते हैं।
इस काम के बदले मिलने वाली फीस या मानदेय 'प्रॉफिट्स एंड गेन्स फ्रॉम बिजनेस ऑर प्रोफेशन' (PGBP) के तहत टैक्सेबल होती है। इस पर धारा 194J के तहत कंपनियां 10% टीडीएस काटकर भुगतान करती हैं। इसके अलावा, यदि किसी वित्तीय वर्ष में वरिष्ठ नागरिक को अपने सगे रिश्तेदारों (माता-पिता, भाई-बहन, जीवनसाथी, बच्चे) के अलावा किसी बाहरी मित्र या परिचित से ₹50,000 से अधिक का कोई नकद उपहार या कीमती गिफ्ट मिलता है, तो वह पूरी गिफ्ट राशि 'इनकम फ्रॉम अदर सोर्सेज' के तहत टैक्सेबल मानी जाती है।
वरिष्ठ नागरिकों को इनकम टैक्स में मिलने वाली 3 बड़ी विशेष राहतें
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धारा 194P के तहत ITR फाइलिंग से छूट: 75 वर्ष से अधिक आयु के ऐसे सुपर सीनियर सिटीजन, जिनकी आय का स्रोत केवल पेंशन और उसी बैंक खाते से मिलने वाला ब्याज है, उन्हें आईटीआर दाखिल करने की आवश्यकता नहीं होती। संबंधित बैंक खुद उनका टैक्स कैलकुलेट करके काट लेता है।
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एडवांस टैक्स (Advance Tax) से पूरी मुक्ति: 60 वर्ष से अधिक आयु के ऐसे वरिष्ठ नागरिक जिनका कोई व्यावसायिक या व्यापारिक आय (Business Income) नहीं है, उन्हें साल में चार बार एडवांस टैक्स की किस्तों का भुगतान करने से छूट मिलती है। वे साल के अंत में सेल्फ-असेसमेंट टैक्स जमा कर सकते हैं।
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मेडिकल इंश्योरेंस और इलाज पर छूट (80D व 80DDB): वरिष्ठ नागरिक अपने हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम और मेडिकल खर्चों पर धारा 80D के तहत ₹50,000 तक और गंभीर बीमारियों के इलाज पर धारा 80DDB के तहत ₹1,00,000 तक की टैक्स कटौती का दावा कर सकते हैं।
सेवानिवृत्ति के बाद वित्तीय रूप से सुरक्षित और चिंतामुक्त रहने के लिए जरूरी है कि आप अपनी सभी आय का सही ब्योरा रखें, समय पर फॉर्म 15H जमा करें और यदि कुल आय कर योग्य सीमा से अधिक हो तो नियमानुसार अपना इनकम टैक्स रिटर्न जरूर दाखिल करें।