एयरलाइंस की मनमानी पर लगेगी लगाम! महंगे हवाई किराए पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, 2 हफ्ते में आएंगे नए नियम
त्योहारी सीजन, शादियों और छुट्टियों के दौरान निजी एयरलाइंस की मनमानी और हवाई टिकटों की आसमान छूती कीमतों पर अब कानूनी नकेल कसने की तैयारी पूरी हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट में हवाई किराए के अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव, डायनेमिक सर्ज प्राइसिंग और बैगेज चार्ज को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर अहम सुनवाई हुई। शीर्ष अदालत के कड़े रुख के बाद केंद्र सरकार ने आधिकारिक रूप से अदालत को आश्वस्त किया है कि हवाई किराए को नियंत्रित और पारदर्शी बनाने वाले नए नियम पूरी तरह फाइनल हो चुके हैं और उन्हें प्रशासनिक मंजूरी भी मिल चुकी है। सरकार ने अदालत को बताया कि अगले दो हफ्तों के भीतर इन नियमों को आधिकारिक तौर पर अधिसूचित व प्रकाशित कर दिया जाएगा। इस आश्वासन के बाद जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की विशेष पीठ ने केंद्र को अगली सुनवाई यानी 16 नवंबर को प्रकाशित नियमों को अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने का सख्त निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: हम खुद भी सर्ज प्राइसिंग के भुक्तभोगी हैं
याचिकाकर्ता सामाजिक कार्यकर्ता एस. लक्ष्मीनारायण की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रवींद्र श्रीवास्तव ने अदालत में दलील दी कि दिवाली, छठ, दुर्गा पूजा या महाकुंभ जैसे बड़े मौकों पर एयरलाइंस मांग बढ़ते ही टिकटों के दाम 3 से 4 गुना तक बढ़ा देती हैं। एक ही गंतव्य के लिए इकोनॉमी क्लास में एक एयरलाइन 8,000 रुपये ले रही होती है तो दूसरी उसी दिन 18,000 से 20,000 रुपये वसूलती है। इस मनमानी लूट पर पीठ ने भी मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि हवाई किराए में अचानक होने वाली इस बेतहाशा बढ़ोतरी और सर्ज प्राइसिंग के भुक्तभोगी वे खुद भी रहे हैं। अदालत ने कहा कि किराए का युक्तिकरण (Rationalisation) होना अनिवार्य है ताकि अंतिम समय में आपातकालीन यात्रा करने वाले आम नागरिकों और परिवारों का शोषण न हो सके।
भारतीय वायुयान अधिनियम के तहत तैयार हुआ नया कानूनी ढांचा
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार की ओर से पीठ को अवगत कराया कि 'भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024' (Bharatiya Vayuyan Adhiniyam) के वैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत नए व्यापक नियमों का ड्राफ्ट तैयार कर लिया गया है। इससे पहले सरकार ने एक सीलबंद लिफाफे में मसौदा अदालत के सामने रखा था, जिस पर अंतिम विचार-विमर्श के बाद अब प्रशासनिक मुहर लग चुकी है। यह नया ढांचा नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) और मंत्रालय को यह कानूनी अधिकार देगा कि वे रूट-वाइज बेस फेयर, अधिकतम किराया सीमा (Upper Cap) और एयरलाइंस के डायनेमिक एल्गोरिदम की नियमित मॉनिटरिंग कर सकें, जिससे पीक आवर्स या त्योहारों पर कृत्रिम रूप से टिकट महंगे न किए जा सकें।
15 किलो बैगेज सीमा और छुपे हुए शुल्कों पर भी याचिका में सवाल
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में केवल महंगे टिकट ही नहीं, बल्कि एयरलाइंस द्वारा वसूले जा रहे विभिन्न 'हिडन चार्जेस' और सहायक शुल्कों पर भी गंभीर आपत्ति जताई गई है:
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मुफ्त चेक-इन बैगेज में कटौती: पहले इकोनॉमी क्लास के यात्रियों को 20 से 25 किलोग्राम तक मुफ्त चेक-इन सामान ले जाने की अनुमति मिलती थी, जिसे निजी एयरलाइंस ने घटाकर चुपचाप 15 किलोग्राम (और केवल एक बैग) कर दिया है।
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अतिरिक्त कमाई का साधन: आरोप है कि जो यात्री बिना किसी चेक-इन बैगेज के केवल केबिन बैग लेकर यात्रा करते हैं, उन्हें टिकट में कोई छूट या रियायत नहीं दी जाती, जबकि अतिरिक्त वजन पर प्रति किलो भारी जुर्माना वसूला जाता है।
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सीट चयन और कैंसिलेशन फीस: वेब चेक-इन के नाम पर अनिवार्य सीट फीस और टिकट रद्द करने पर मूल किराए का बड़ा हिस्सा काट लेने जैसी प्रथाओं को भी गैर-पारदर्शी और अनुचित व्यापार व्यवहार करार दिया गया है।
स्वतंत्र विमानन नियामक और 16 नवंबर की अहम सुनवाई
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि जिस प्रकार टेलीकॉम सेक्टर के लिए ट्राई (TRAI) और बिजली व इंश्योरेंस के लिए स्वतंत्र नियामक संस्थाएं हैं, उसी तर्ज पर विमानन क्षेत्र में उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए एक स्वतंत्र एविएशन रेगुलेटरी अथॉरिटी का गठन किया जाए। आगामी दो हफ्तों में केंद्र सरकार द्वारा नए नियमों के गजट नोटिफिकेशन के बाद यह तस्वीर साफ होगी कि क्या सरकार ने किराए पर सख्त अपर कैप लगाया है या फिर एयरलाइंस के प्रॉफिट मार्जिन व सर्ज फॉर्मूले को सीमित किया है। 16 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई न केवल देश के करोड़ों घरेलू विमान यात्रियों के बजट को राहत दे सकती है, बल्कि एयरलाइंस के एकाधिकार और मनमाने रवैये पर हमेशा के लिए लगाम कसने का रास्ता भी साफ करेगी।