Sugar Price Surge: त्योहारों से ठीक पहले चीनी क्यों हो गई 'कड़वी'? 10 साल बाद आयात करने की आई नौबत, जानिए क्या E20 पेट्रोल और इथेनॉल ब्लेंडिंग है असली वजह

Sugar Price Surge: त्योहारों से ठीक पहले चीनी क्यों हो गई 'कड़वी'? 10 साल बाद आयात करने की आई नौबत, जानिए क्या E20 पेट्रोल और इथेनॉल ब्लेंडिंग है असली वजह

देश में रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी, नवरात्रि और दिवाली जैसे बड़े त्योहारों का सीजन दस्तक दे चुका है, लेकिन इस बार त्योहारों की मिठास पर महंगाई का तगड़ा साया पड़ता दिखाई दे रहा है। भारत के खुदरा बाजारों में चीनी की कीमतें पिछले दो महीनों में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। कुछ प्रमुख शहरों और थोक मंडियों में चीनी के भाव ₹55 से लेकर ₹65 प्रति किलोग्राम तक दर्ज किए जा रहे हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादक और निर्यातक देशों में शुमार भारत को करीब 10 साल बाद 10 लाख मीट्रिक टन (1 मिलियन टन) कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त (Duty-Free) आयात का रास्ता खोलना पड़ा है। इस फैसले के बाद से पूरे देश में एक नई आर्थिक और नीतिगत बहस छिड़ गई है कि क्या केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ई-20 (E20) इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति ने आम जनता की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है?

10 साल बाद चीनी आयात का फैसला: कैसे बदल गया भारत का बाजार?

भारत बीते कई वर्षों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में लाखों टन चीनी का निर्यात कर विदेशी मुद्रा अर्जित करता रहा है। देश में सालाना लगभग 2.83 से 2.90 करोड़ टन चीनी की घरेलू खपत होती है। चालू पेराई सीजन की शुरुआत में चीनी उत्पादन 3.40 करोड़ टन के पार रहने का अनुमान लगाया गया था, लेकिन फसल कटाई और पेराई के अंतिम आंकड़ों में यह उत्पादन घटकर लगभग 3.06 से 3.11 करोड़ टन के आसपास सिमट गया।

उत्पादन में गिरावट और बफर स्टॉक में आई कमी के बीच रेटिंग एजेंसियों और इंडस्ट्री रिपोर्ट्स ने चेतावनी दी कि सितंबर के अंत तक देश का क्लोजिंग स्टॉक घटकर मात्र 43 लाख टन रह सकता है, जो केवल दो महीने की घरेलू खपत के बराबर है। त्योहारों के दौरान जब मिठाइयों, बेकरी और प्रोसेस्ड फूड इंडस्ट्री में चीनी की मांग में 30 से 40 प्रतिशत का उछाल आता है, तब घरेलू बाजार में आपूर्ति संकट और कीमतें आसमान छूने से रोकने के लिए वाणिज्य एवं खाद्य मंत्रालय को आनन-फानन में 10 लाख टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट को मंजूरी देनी पड़ी।

क्या E-20 पेट्रोल और इथेनॉल ब्लेंडिंग बनी कीमतों में तेजी की वजह?

इस पूरे संकट के केंद्र में भारत सरकार की राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति और पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण (E20 Mandate) का लक्ष्य आ गया है। कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने और कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए देश भर में स्थापित 499 से अधिक डिस्टिलरी साइट्स के जरिए इथेनॉल उत्पादन को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया गया है।

कृषि और ऊर्जा विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग तर्क दे रहा है कि चीनी मिलों द्वारा गन्ने के सीधे रस (Cane Juice) और बी-हैवी शीरे (B-Heavy Molasses) को बड़े पैमाने पर इथेनॉल बनाने में डायवर्ट किया गया। बीते सीजन में ही लगभग 30 लाख मीट्रिक टन गन्ने की चीनी क्षमता को सीधे ईंधन में बदल दिया गया। आलोचकों और अर्थशास्त्रियों का कहना है कि जब गन्ने से चीनी बनाने के बजाय पेट्रोल के लिए फ्यूल तैयार करने को प्राथमिकता दी गई, तो घरेलू बाजार में चीनी की फिजिकल सप्लाई टाइट हो गई, जिसने कीमतों को रिकॉर्ड ऊंचाई पर धकेल दिया।

सरकार की दो टूक सफाई: 'इथेनॉल को दोष देना गलत, जमाखोरी और मौसम जिम्मेदार'

विवाद और विरोध के बीच उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी कर ई-20 नीति पर उठ रहे सवालों को खारिज किया है। सरकार के अनुसार, 2022-23 में जहां इथेनॉल निर्माण के लिए करीब 12% चीनी डायवर्ट की गई थी, वहीं वर्तमान सीजन में यह हिस्सा घटकर मात्र 9% रह गया है।

मंत्रालय का कहना है कि अब देश में बनने वाले कुल इथेनॉल का लगभग 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा अनाजों, विशेष रूप से मक्के (Maize) और खराब चावल से तैयार किया जा रहा है। सरकार ने कीमतों में बढ़ोतरी के लिए मुख्य रूप से दो कारणों को जिम्मेदार ठहराया है:

  • मौसमी अनिश्चितता और कीट प्रकोप: महाराष्ट्र और कर्नाटक के प्रमुख गन्ना बेल्ट में अनियमित मानसून, सूखे की मार और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में फसल में रेड रॉट जैसी बीमारियों के कारण गन्ने की प्रति हेक्टेयर पैदावार और चीनी रिकवरी दर में अप्रत्याशित गिरावट आई।

  • त्योहारी सीजन में सट्टेबाजी और जमाखोरी: उत्पादन में कमी की खबरों का फायदा उठाते हुए बड़े थोक व्यापारियों और स्टॉकिस्टों ने कृत्रिम कमी पैदा कर सट्टेबाजी शुरू कर दी, जिससे खुदरा बाजार में कीमतें अचानक उछल गईं।

दामों पर नकेल कसने के लिए सरकार के 4 कड़े कदम

बाजार में चीनी के बढ़ते दामों को नियंत्रित करने और आम उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने कई सख्त प्रशासनिक कदम उठाए हैं:

  • व्यापारियों पर 400 टन की स्टॉक लिमिट: सरकार ने देश भर के चीनी थोक विक्रेताओं और डीलरों के लिए अधिकतम 400 मीट्रिक टन की स्टॉक सीमा तय कर दी है, जो त्योहारी सीजन के अंत यानी 30 नवंबर तक प्रभावी रहेगी।

  • थोक उपभोक्ताओं पर 15 दिन की पाबंदी: हलवाई, कोल्ड ड्रिंक निर्माता, बिस्कुट और कन्फेक्शनरी कंपनियों जैसे बड़े थोक खरीदारों को अपनी 15 दिन की जरूरत से ज्यादा चीनी का अग्रिम स्टॉक रखने पर रोक लगा दी गई है।

  • चीनी मिलों में जॉइंट रेड और ऑडिट: केंद्रीय और राज्य खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की संयुक्त टीमों को चीनी मिलों के गोदामों में भौतिक सत्यापन (Physical Audit) के लिए तैनात किया गया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मिलें कोटा जारी होने के बावजूद चीनी रोककर तो नहीं रख रहीं।

  • समय से पहले नया पेराई सीजन: चीनी मिलों को आगामी 15 अक्टूबर से नया पेराई सत्र शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं ताकि अक्टूबर महीने में ही 10 लाख टन से ज्यादा नई ताजी चीनी बाजार में आ सके।

खाद्य सुरक्षा बनाम ऊर्जा सुरक्षा: 'फूड वर्सेज फ्यूल' की बड़ी चुनौती

चीनी के इस ताजा संकट ने देश के नीति-निर्माताओं के सामने एक गंभीर नीतिगत दुविधा खड़ी कर दी है। भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने भी हाल ही में इस बात पर जोर दिया है कि देश को इथेनॉल सम्मिश्रण के 20% से आगे जाने से पहले 'फूड वर्सेज फ्यूल' (खाद्य बनाम ईंधन) के नफे-नुकसान का गहरा आर्थिक मूल्यांकन करना चाहिए।

यदि गन्ने और मक्के जैसे खाद्यान्नों का अत्यधिक इस्तेमाल फ्यूल ब्लेंडिंग में किया जाएगा, तो इससे न सिर्फ चीनी बल्कि पोल्ट्री, डेयरी और पशु आहार की लागत भी बढ़ेगी, जिसका सीधा असर व्यापक खाद्य महंगाई के रूप में सामने आएगा।

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