SEBI का Omaxe पर बड़ा हंटर: प्रमोटर्स समेत 6 संस्थाएं शेयर बाजार से बैन, लगा 1.92 करोड़ का भारी जुर्माना

SEBI का Omaxe पर बड़ा हंटर: प्रमोटर्स समेत 6 संस्थाएं शेयर बाजार से बैन, लगा 1.92 करोड़ का भारी जुर्माना

पूंजी बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने रियल एस्टेट क्षेत्र की प्रमुख कंपनी ओमेक्स लिमिटेड (Omaxe Limited) और उसके प्रमोटरों के खिलाफ अत्यंत सख्त प्रवर्तन कार्रवाई की है। सूचीबद्ध कंपनियों में पारदर्शिता, निष्पक्षता और खुदरा निवेशकों के अधिकारों की रक्षा करने वाले न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता यानी मिनिमम पब्लिक शेयरहोल्डिंग (MPS) नियमों के गंभीर उल्लंघन के मामले में सेबी ने ओमेक्स सहित कुल छह संस्थाओं व व्यक्तियों पर प्रतिभूति बाजार में खरीद-फरोख्त पर पाबंदी लगा दी है। इसके साथ ही विनियामक ने नियमों को ताक पर रखकर भ्रामक व्यवस्था रचने के आरोप में इन सभी पक्षों पर सम्मिलित रूप से ₹1.92 करोड़ का वित्तीय जुर्माना भी अधिरोपित किया है। दलाल स्ट्रीट और रियल एस्टेट सेक्टर में इस कड़े आदेश के सामने आते ही हड़कंप मच गया है, क्योंकि सेबी ने अपने विस्तृत आदेश में प्रमोटर स्तर पर फंड के जरिए रची गई कथित धोखाधड़ी की एक-एक परत खोलकर रख दी है।

ओमेक्स पर 3 महीने और प्रमोटरों पर 1 साल का कड़ा ट्रेडिंग प्रतिबंध

सेबी के पूर्णकालिक सदस्य द्वारा पारित आधिकारिक आदेश के अनुसार, मुख्य सूचीबद्ध कंपनी ओमेक्स लिमिटेड को प्रतिभूति बाजार (Securities Market) से सीधे 3 महीने के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया है। वहीं इस पूरे वित्तीय खेल में शामिल प्रमुख रणनीतिकारों और समूह इकाइयों पर इससे भी अधिक सख्त कार्रवाई की गई है। कंपनी के मुख्य प्रमोटर रोहताश गोयल, जय भगवान गोयल, समूह की सहयोगी कंपनियों ड्रीम होम डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड और गिल्ड बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ-साथ ओमेक्स के पूर्व संयुक्त प्रबंध निदेशक (Joint MD) सुनील गोयल पर 1 वर्ष की लंबी अवधि के लिए बाजार प्रतिबंध लगाया गया है। इस रोक की अवधि के दौरान ये सभी छह पक्ष सीधे या परोक्ष रूप से किसी भी सूचीबद्ध शेयर, बॉन्ड, डेरिवेटिव्स या म्यूचुअल फंड की यूनिट्स में न तो कोई नया निवेश कर सकेंगे और न ही मौजूदा होल्डिंग्स की ट्रेडिंग कर पाएंगे। इसके अलावा इन व्यक्तियों के किसी भी मान्यता प्राप्त मध्यस्थ या मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थान से जुड़ने पर पूर्ण पाबंदी रहेगी।

25% मिनिमम पब्लिक शेयरहोल्डिंग का नियम और स्वतंत्र निवेशकों का दिखावा

भारतीय प्रतिभूति कानूनों के अनुसार, प्रत्येक सूचीबद्ध कंपनी के लिए यह अनिवार्य वैधानिक अनिवार्यता है कि उसकी कुल चुकता शेयर पूंजी में से कम से कम 25 प्रतिशत हिस्सेदारी वास्तविक और स्वतंत्र सार्वजनिक शेयरधारकों (Independent Public Shareholders) के हाथों में होनी चाहिए। इसका मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि प्रमोटर समूह कंपनी के लिक्विड फ्लो और शेयरों की कीमतों में मनमाना फेरबदल न कर सके। सेबी ने अपनी विस्तृत जांच में पाया कि ओमेक्स लिमिटेड इस 25% की सीमा को वैध और स्वतंत्र सार्वजनिक निवेशकों के जरिए हासिल करने में पूरी तरह नाकाम रही। कंपनी ने कागजों पर तो यह दर्शा दिया कि उसने 25% की सीमा हासिल कर ली है, लेकिन वास्तविकता में जिन संस्थाओं को स्वतंत्र पब्लिक शेयरधारक बनाकर पेश किया गया था, उन्होंने शेयर खरीदने के लिए जिन पैसों का इस्तेमाल किया, उसका मूल स्रोत स्वयं ओमेक्स और उसकी समूह से जुड़ी फर्में ही थीं।

₹46.50 करोड़ की राउंड-ट्रिपिंग: शेल इकाइयों के जरिए अपने ही शेयर खरीदे

सेबी की वित्तीय फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट ने फंड के जटिल और घुमावदार रास्तों का सनसनीखेज खुलासा किया है। जांच के अनुसार, ओमेक्स और उसकी सहयोगी कंपनियों ने डीवीएम रियल्टर्स प्राइवेट लिमिटेड (DRPL), गर्व बिल्डटेक प्राइवेट लिमिटेड और जीत बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड (JBPL) जैसी मध्यवर्ती कंपनियों के बैंक खातों में कुल ₹46.50 करोड़ की भारी-भरकम राशि ट्रांसफर की। इस पूरी रकम को अलग-अलग खातों के जरिए घुमाकर अंततः 3 जून 2013 और 29 अक्टूबर 2013 को कंपनी द्वारा लाए गए ऑफर फॉर सेल (OFS) में झोंक दिया गया। इन कथित मध्यवर्ती संस्थाओं ने ओमेक्स के खुद के पैसों से ही ओमेक्स के शेयर खरीद लिए और बाद में खुद को गैर-प्रमोटर यानी 'सार्वजनिक शेयरधारक' के रूप में रजिस्टर्ड करा लिया। सेबी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि फंड के इस ट्रांसफर और शेयर खरीद को किसी भी सूरत में स्वतंत्र या अलग-थलग लेनदेन नहीं माना जा सकता, बल्कि यह प्रमोटरों द्वारा अपने ही शेयरों को बेनामी तरीके से खरीदने की एक संगठित योजना थी।

पब्लिक होल्डिंग्स के वास्तविक आंकड़ों में आया भारी अंतर

जांच रिपोर्ट में सेबी ने गणितीय आंकड़ों के जरिए यह साबित किया कि किस तरह एक्सचेंज और शेयरधारकों को गुमराह किया गया। आदेश के अनुसार, 3 जून 2013 के ओएफएस के बाद कंपनी ने अपनी सार्वजनिक हिस्सेदारी 16.21 प्रतिशत रिपोर्ट की थी, लेकिन जब कंपनी के फंड से खरीदे गए मुखौटा शेयरों को गणना से बाहर किया गया, तो वास्तविक सार्वजनिक हिस्सेदारी घटकर मात्र 14.57 प्रतिशत रह गई। इसी तरह, 29 अक्टूबर 2013 के दूसरे ओएफएस के बाद कंपनी ने सार्वजनिक हिस्सेदारी 20.97 प्रतिशत घोषित की थी, जबकि हकीकत में वह केवल 19.04 प्रतिशत ही थी। इसके बाद जब कंपनी ने शेयरधारकों को बोनस शेयर जारी किए, तो उस समय कागजों पर पब्लिक होल्डिंग 25.01 प्रतिशत दिखाकर अनिवार्य 25% का नियम पूरा होने का दावा किया गया। सेबी के फॉरेंसिक ऑडिट से साफ हुआ कि यदि प्रमोटर फंड से खरीदे गए शेयरों और उनसे मिले बोनस शेयरों को घटा दिया जाए, तो वास्तविक जन-हिस्सेदारी मात्र 22.71 प्रतिशत पर ही सिमट कर रह जाती है, जिससे नियमों का गंभीर उल्लंघन स्वतः सिद्ध हो गया।

'धोखाधड़ीपूर्ण और भ्रामक षड्यंत्र': PFUTP नियमों के उल्लंघन का फैसला

मार्केट रेगुलेटर सेबी ने ओमेक्स और उसके प्रमोटरों द्वारा गढ़ी गई इस पूरी कार्यप्रणाली को सामान्य चूक नहीं, बल्कि सिक्योरिटीज बाजार में निवेशकों के साथ की गई एक सोची-समझी 'धोखाधड़ी और कपटपूर्ण कलाकारी' (Fraudulent and Deceptive Scheme and Artifice) करार दिया है। सेबी ने अपने अंतिम फैसले में रेखांकित किया कि प्रमोटरों का एकमात्र उद्देश्य बाजार में एक झूठा भ्रम पैदा करना था कि कंपनी ने कानूनन 25% पब्लिक शेयरहोल्डिंग हासिल कर ली है, जबकि पर्दे के पीछे कंपनी के नियंत्रण को ही सार्वजनिक लबादे में छिपाया गया था। इस कृत्य को भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 की धारा 12ए और सेबी (धोखाधड़ी और अनुचित व्यापार व्यवहार निषेध) विनियम, यानी PFUTP Regulations, 2003 के विभिन्न प्रावधानों का खुला और अस्वीकार्य उल्लंघन माना गया।

₹1.92 करोड़ का सामूहिक जुर्माना और कॉरपोरेट गवर्नेंस को सख्त संदेश

सेबी के आदेश के तहत न्यूनतम पब्लिक शेयरहोल्डिंग्स नियमों के उल्लंघन और शेयरहोल्डिंग पैटर्न के गलत व भ्रामक खुलासे करने के जुर्म में छह पक्षों पर कुल ₹1.92 करोड़ का जुर्माना लगाया गया है, जिसे निर्धारित समय सीमा के भीतर सरकारी कोष में जमा कराने का आदेश दिया गया है। मार्केट विश्लेषकों का मानना है कि सेबी का यह कड़ा फैसला भारतीय शेयर बाजार में सूचीबद्ध सभी रियल एस्टेट और कॉरपोरेट कंपनियों के लिए एक स्पष्ट और कड़ा संदेश है कि प्रमोटरों द्वारा फंड की राउंड-ट्रिपिंग करके पब्लिक शेयरहोल्डिंग के नियमों से खिलवाड़ किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। खुदरा निवेशकों के विश्वास को बनाए रखने के लिए विनियामक अब पुराने सौदों और ऑफ-मार्केट ट्रांजेक्शंस की भी बारीकी से फॉरेंसिक जांच कर रहा है।