DGFT का बड़ा फैसला: एक्सपोर्ट फैक्टोरिंग में UIN की अनिवार्यता खत्म, अब सीधे IEC से मिलेगा फायदा; MSME कारोबारियों को दोहरी राहत
भारतीय निर्यातकों, विशेषकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) के लिए कारोबार को सुगम बनाने (Ease of Doing Business) की दिशा में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने एक बड़ा और नीतिगत फैसला लिया है। निर्यात प्रोत्साहन मिशन (EPM – Niryat Protsahan) के घटक 'सपोर्ट फॉर अल्टरनेटिव ट्रेड इंस्ट्रूमेंट्स' के तहत एक्सपोर्ट फैक्टोरिंग सुविधा का लाभ लेने के लिए अब तक अनिवार्य रहे 'यूनिक आइडेंटिफिकेशन नंबर' (UIN) की व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया गया है। डीजीएफटी ने अपने ताजा ट्रेड नोटिस (Trade Notice No. 32/2026-27) के माध्यम से स्पष्ट किया है कि अब निर्यातकों को फैक्टोरिंग सहायता पाने के लिए अलग से 'डिक्लेरेशन ऑफ इंटेंट' भरने और यूआईएन हासिल करने की जटिल प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ेगा। अब निर्यातकों की पहचान सभी चरणों में केवल उनके 10-अंकीय 'इम्पोर्टर-एक्सपोर्टर कोड' (IEC) के माध्यम से की जाएगी, जिससे कागजी औपचारिकताएं और तकनीकी अड़चनें पूरी तरह खत्म हो जाएंगी।
क्या है एक्सपोर्ट फैक्टोरिंग और भारतीय निर्यातकों के लिए यह क्यों है जरूरी
अंतरराष्ट्रीय व्यापार में जब कोई निर्यातक विदेशी खरीदार को माल भेजता है, तो भुगतान मिलने में अक्सर 30, 60 या 90 दिनों तक का समय लग जाता है। इस दौरान निर्यातक की कार्यशील पूंजी (Working Capital) फंस जाती है। इस समस्या के समाधान के लिए 'एक्सपोर्ट फैक्टोरिंग' एक आधुनिक वित्तीय साधन के रूप में काम करता है। इसके अंतर्गत एक वित्तीय संस्थान (Factor/NBFC/Bank) निर्यातक के इनवॉइस को खरीद लेता है और शिपमेंट होते ही 80 से 90 प्रतिशत तक का भुगतान तुरंत जारी कर देता है, जबकि बाकी रकम विदेशी खरीदार से भुगतान मिलने पर चुकाई जाती है। सरकार ने एमएसएमई सेक्टर को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए इस प्रक्रिया पर 2.75% तक की ब्याज सबवेंशन (छूट) की व्यवस्था की है। हालांकि, पहले इस छूट का दावा करने के लिए वित्तीय संस्थान के पास जाने से पूर्व डीजीएफटी पोर्टल पर यूआईएन जनरेट करना अनिवार्य था, जिसकी तकनीकी दिक्कतों के कारण कई बार निर्यातक समय पर इसका लाभ नहीं ले पाते थे।
अब सीधे IEC से होगा काम: आवेदन, सत्यापन और क्लेम की प्रक्रिया हुई आसान
डीजीएफटी द्वारा जारी नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, आवेदन, क्लेम और सब्सिडी वितरण के हर चरण में आयातक-निर्यातक कोड (IEC) ही प्राथमिक पहचान दस्तावेज होगा। जिन निर्यातकों ने पहले से यूआईएन जनरेट कर रखा था, उनकी वह व्यवस्था भी स्वतः निष्प्रभावी हो गई है, यानी उन्हें भी अब किसी अतिरिक्त नंबर की आवश्यकता नहीं होगी। नई व्यवस्था के तहत, पंजीकृत फैक्टरिंग कंपनियां (RBI या IFSCA द्वारा विनियमित संस्थाएं) सीधे डीजीएफटी पोर्टल पर निर्यातक के आईईसी के खिलाफ लेनदेन का डेटा अपलोड करेंगी। इसके बाद निर्यातक अपने डीजीएफटी डैशबोर्ड में लॉगिन कर 'सपोर्ट फॉर अल्टरनेटिव ट्रेड इंस्ट्रूमेंट्स' मॉड्यूल में जाकर सीधे अपने क्लेम को वेरीफाई और सबमिट कर सकेंगे। सक्षम प्राधिकारी से क्लेम की मंजूरी मिलते ही स्वीकृत सबवेंशन की राशि सीधे निर्यातक के आईईसी से लिंक बैंक खाते में इलेक्ट्रॉनिक रूप से ट्रांसफर कर दी जाएगी।
पात्रता की कटऑफ डेट तय: 20 फरवरी 2026 के बाद के शिपमेंट्स होंगे कवर
नए संशोधन में डीजीएफटी ने दावों की पात्रता को लेकर उत्पन्न भ्रम को भी पूरी तरह से दूर कर दिया है। ट्रेड नोटिस के तहत पात्रता निर्धारित करने के लिए 'निर्यात की वास्तविक तिथि' (Date of Export) को प्रमुख आधार माना जाएगा। इसकी पुष्टि संबंधित शिपिंग बिल वाले एक्सपोर्ट जनरल मैनिफेस्ट (EGM) की फाइलिंग डेट से की जाएगी। सरकार ने साफ किया है कि 20 फरवरी 2026 को या उसके बाद हुए सभी वैध निर्यात फैक्टोरिंग सौदे इस वित्तीय छूट के पात्र होंगे और जैसे ही पोर्टल का नया मॉड्यूल पूरी तरह एक्टिव होगा, निर्यातक पूर्वव्यापी (retroactive) रूप से भी इन दावों को दर्ज कर सकेंगे। इससे उन निर्यातकों को बड़ा फायदा मिलेगा जो पिछले कुछ महीनों से नियमों के सरलीकरण के इंतजार में अपनी फाइलें रोके बैठे थे।
इंटरेस्ट सबवेंशन के साथ कॉनकरेंट क्लेम: निर्यातकों को मिलेगा दोहरा वित्तीय कवच
इस संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकार ने एक साथ दोहरी वित्तीय सहायता का रास्ता साफ कर दिया है। डीजीएफटी ने स्पष्ट किया है कि जो एमएसएमई निर्यातक पहले से प्री-शिपमेंट और पोस्ट-शिपमेंट एक्सपोर्ट क्रेडिट पर इंटरेस्ट सबवेंशन स्कीम (Interest Equalisation/Subvention) का लाभ उठा रहे हैं, वे समानांतर रूप से (Concurrently) एक्सपोर्ट फैक्टोरिंग सहायता का लाभ भी ले सकते हैं। इस दोहरे लाभ से निर्यातकों की उधारी लागत (Borrowing Cost) में रिकॉर्ड गिरावट आएगी। इससे न केवल उनके पास नकदी का प्रवाह (Cash Flow) हमेशा बना रहेगा, बल्कि वे वैश्विक खरीदारों को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर माल की आपूर्ति कर सकेंगे। यह नीतिगत सुधार भारत के निर्यात लक्ष्य को गति देने और एमएसएमई इकाइयों को अंतरराष्ट्रीय वैल्यू चेन का सशक्त हिस्सा बनाने में मील का पत्थर साबित होगा।