Real Estate Shift: मेट्रो शहरों की चमक पड़ी फीकी! टियर 2 और 3 शहरों की तरफ दौड़ीं विदेशी कंपनियां, घर खरीदने की मची होड़
भारत के कॉरपोरेट और रियल एस्टेट बाजार में एक बड़ा संरचनात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। दिल्ली-एनसीआर, मुंबई और बेंगलुरु जैसे पारंपरिक मेट्रो शहरों का बढ़ता ट्रैफिक, अत्यधिक जीवन-यापन लागत और महंगे ऑफिस किराए अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) को छोटे शहरों की ओर रुख करने पर मजबूर कर रहे हैं। लखनऊ, जयपुर, इंदौर, कोयंबटूर, चंडीगढ़, भुवनेश्वर और विशाखापट्टनम जैसे टियर 2 और टियर 3 शहर अब भारत की नई आर्थिक धुरी बनकर उभर रहे हैं। ऑफिस स्पेस के विस्तार के साथ-साथ इन उभरते शहरों में प्रीमियम और लग्जरी घरों की बिक्री में भी रिकॉर्ड तोड़ उछाल दर्ज किया जा रहा है।
ग्लोबल कंपनियों की पहली पसंद क्यों बन रहे हैं छोटे शहर?
विदेशी कंपनियों और भारतीय आईटी दिग्गजों के टियर 2 और 3 शहरों की तरफ जाने के पीछे कई मजबूत आर्थिक और व्यावहारिक कारण हैं:
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कम ऑपरेशनल कॉस्ट: मेट्रो शहरों की तुलना में टियर 2 शहरों में कमर्शियल ऑफिस स्पेस का किराया 40 से 50 प्रतिशत तक सस्ता है। इससे कंपनियों के ओवरहेड खर्चे काफी कम हो जाते हैं।
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स्थानीय स्तर पर बेहतरीन टैलेंट पूल: शीर्ष इंजीनियरिंग कॉलेजों, आईआईएम और विश्वविद्यालयों से निकलने वाले युवा अब अपने गृह राज्यों में ही करियर विकल्प तलाश रहे हैं। कंपनियों को स्थानीय स्तर पर कुशल वर्कफोर्स आसानी से मिल रही है।
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बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस और कम एट्रिशन: महानगरों में दैनिक घंटों के ट्रैफिक जाम के विपरीत, छोटे शहरों में यात्रा का समय बेहद कम होता है। इससे कर्मचारियों की उत्पादकता बढ़ती है और कर्मचारियों के कंपनी छोड़ने (Attrition Rate) की दर भी कम रहती है।
रेजिडेंशियल मार्केट में आई तेजी: घर खरीदने की मची होड़
जैसे-जैसे इन शहरों में कॉरपोरेट दफ्तर खुल रहे हैं और अच्छी सैलरी वाली नौकरियां बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे स्थानीय रियल एस्टेट बाजार में घरों की मांग नई ऊंचाइयों को छू रही है।
प्रॉपर्टी कंसल्टिंग फर्म्स की रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में टियर 2 शहरों में रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी की कीमतों में औसतन 15 से 25 प्रतिशत तक की वार्षिक वृद्धि देखी गई है। पहले जहां छोटे शहरों में केवल प्लॉट्स और स्वतंत्र मकानों का चलन था, वहीं अब गेटेड कम्युनिटीज, हाई-राइज लग्जरी अपार्टमेंट्स, क्लब हाउस और स्विमिंग पूल जैसी सुविधाओं वाले प्रोजेक्ट्स हाथों-हाथ बिक रहे हैं।
मेट्रो शहरों में क्यों सुस्त हो रही है चमक?
देश के बड़े मेट्रो शहर इस समय गंभीर बुनियादी ढांचे के दबाव (Infrastructure Saturation) से जूझ रहे हैं। आवास की आसमान छूती कीमतें, प्रदूषण, वाटर क्राइसिस और अत्यधिक महंगा जीवन मध्यम वर्ग के पेशेवरों के लिए असहज होता जा रहा है।
हाइब्रिड और रिमोट वर्क कल्चर के बाद बड़ी संख्या में प्रोफेशनल्स अपने गृह नगरों में बसना पसंद कर रहे हैं, जहां वे मेट्रो शहर के छोटे 2BHK फ्लैट की कीमत में टियर 2 शहर में एक शानदार विला या स्पेशियस 3/4BHK लग्जरी अपार्टमेंट खरीद सकते हैं।
एक्सप्रेसवे और एयरपोर्ट कनेक्टिविटी से बदली तस्वीर
केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा बुनियादी ढांचे पर किए जा रहे भारी निवेश ने इस बदलाव को नई गति दी है। बेहतर हाई-स्पीड एक्सप्रेसवे नेटवर्क, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और रीजनल कनेक्टिविटी स्कीम (उड़ान) के तहत टियर 2 शहरों में नए एयरपोर्ट्स के शुरू होने से लॉजिस्टिक्स और आवागमन बेहद सुगम हो गया है।
टाटा, गोदरेज, डीएलएफ और शोभा जैसे देश के बड़े रियल एस्टेट डेवलपर्स ने भी अब अपने बड़े प्रोजेक्ट्स का एक बड़ा हिस्सा टियर 2 शहरों में लॉन्च करना शुरू कर दिया है।