RBI का बड़ा खुलासा: रेपो रेट में कटौती का सबसे ज्यादा फायदा दे रहे विदेशी बैंक, सरकारी पिछड़े

RBI का बड़ा खुलासा: रेपो रेट में कटौती का सबसे ज्यादा फायदा दे रहे विदेशी बैंक, सरकारी पिछड़े

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नीतिगत दरों (Repo Rate) में हुई कटौती का फायदा आम ग्राहकों तक पहुंचाने में देश में काम कर रहे विदेशी बैंकों (Foreign Banks) ने बाजी मार ली है। आरबीआई द्वारा जारी ताजा मंथली बुलेटिन के अनुसार, मौजूदा 'रेट कट साइकिल' (फरवरी 2025 से मई 2026) के दौरान विदेशी बैंकों ने नए और पुराने लोन के साथ-साथ डिपॉजिट (FD) दरों में भी सरकारी और प्राइवेट बैंकों के मुकाबले सबसे ज्यादा और तेजी से कटौती की है। आइए एक बिजनेस रिपोर्टर की नजर से समझते हैं कि आंकड़ों के खेल में कौन सा बैंक अपने ग्राहकों को सबसे ज्यादा राहत दे रहा है।

नए लोन पर ब्याज दरें घटाने में विदेशी बैंक सबसे आगे

आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक, केंद्रीय बैंक द्वारा रेपो रेट में कुल 1.25 प्रतिशत (125 बीपीएस) की कटौती किए जाने के बाद बैंकों ने अपने लोन और डिपॉजिट रेट्स को री-सेट किया:

  • विदेशी बैंक (Foreign Banks): इन्होंने नए रुपये लोन पर अपनी वेटेड एवरेज लेंडिंग रेट (WALR) में 1.24 प्रतिशत की भारी कटौती की है, जो आरबीआई के 1.25% के आंकड़े के सबसे करीब है।

  • प्राइवेट बैंक (Private Banks): निजी क्षेत्र के बैंकों ने नए लोन पर ब्याज दरों में 1.08 प्रतिशत की कटौती की।

  • सरकारी बैंक (Public Sector Banks): दरें घटाने के मामले में सरकारी बैंक सबसे पीछे रहे और उन्होंने नए लोन पर महज 0.66 प्रतिशत की ही राहत दी।

वहीं, अगर पहले से चल रहे पुराने लोन (Outstanding Loans) की बात करें तो वहां भी विदेशी बैंकों ने 1.20% की कटौती के साथ लीड ली, जबकि प्राइवेट बैंकों ने 0.98% और सरकारी बैंकों ने 0.81% दरें घटाईं।

डिपॉजिट (FD) रेट्स में भी विदेशी बैंकों ने की सबसे तेज कटौती

रेपो रेट कम होने का असर सिर्फ कर्ज सस्ता होने पर ही नहीं, बल्कि बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) की ब्याज दरों पर भी पड़ता है। एफडी दरों को घटाने में भी विदेशी बैंकों का ट्रांसमिशन सबसे आक्रामक रहा:

बैंक का प्रकार नए डिपॉजिट्स (Fresh FDs) पर कटौती पुराने डिपॉजिट्स (Outstanding FDs) पर कटौती
विदेशी बैंक 0.91% 0.90%
प्राइवेट बैंक 0.74% 0.46%
सरकारी बैंक 0.73% 0.53%

क्यों इतनी तेजी से दरें बदलते हैं विदेशी बैंक?

बैंकिंग विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी बैंकों का लोन पोर्टफोलियो मुख्य रूप से कॉरपोरेट और हाई-नेट-वर्थ क्लाइंट्स पर आधारित होता है, जहां दरें सीधे एक्सटर्नल बेंचमार्क (EBLR) या रेपो रेट से जुड़ी होती हैं। इसके अलावा, उनके पास लिक्विडिटी मैनेजमेंट काफी फ्लेक्सिबल होता है।

इसके उलट, भारतीय सरकारी और प्राइवेट बैंक खुदरा (Retail) जमाकर्ताओं पर अधिक निर्भर होते हैं, जिसके कारण वे अपनी लायबिलिटी कॉस्ट तुरंत कम नहीं कर पाते। बहरहाल, आरबीआई के इस बुलेटिन से साफ है कि रिजर्व बैंक की रेपो रेट कटौती का असली फायदा फिलहाल विदेशी बैंकों के ग्राहकों को सबसे ज्यादा मिल रहा है।

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