RBI NBFC Rules: टाटा संस को रिजर्व बैंक से बड़ा झटका! अपर-लेयर एसेट लिमिट बढ़ाने की मांग खारिज; अब IPO लाना मजबूरी?
देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित कॉर्पोरेट घराने 'टाटा ग्रुप' की होल्डिंग कंपनी टाटा संस (Tata Sons) को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) से एक बड़ा झटका लगा है। केंद्रीय बैंक ने नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कॉर्पोरेशन (NBFC) के नियमों को सख्त बनाए रखने का फैसला किया है, जिससे टाटा संस को रेगुलेटरी मोर्चे पर कोई राहत नहीं मिली है।
आरबीआई ने एनबीएफसी की 'अपर-लेयर' (Upper-Layer) में शामिल होने के लिए एसेट (संपत्ति) की सीमा को 1 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 2.5 लाख करोड़ रुपये करने की कॉर्पोरेट जगत की मांग को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। आसान भाषा में समझें तो आरबीआई के इस कड़े रुख का मतलब यह हुआ कि टाटा संस अभी भी रिजर्व बैंक के कड़े निगरानी दायरे (CIC-Core Investment Company) में बनी रहेगी और नियमों के तहत उसे भारतीय शेयर बाजार में लिस्ट होना अनिवार्य होगा।
क्यों एसेट लिमिट में बदलाव चाहती थी टाटा संस?
एनबीएफसी सेक्टर और टाटा ग्रुप की तरफ से लंबे समय से यह दलील दी जा रही थी कि किसी भी कंपनी के दर्जे को तय करने के लिए केवल संपत्ति का आकार ही नहीं, बल्कि उसके मुनाफे, वित्तीय स्थिरता और एसेट क्वालिटी को भी पैमाना बनाया जाना चाहिए। यदि आरबीआई इंडस्ट्री की मांग को मानते हुए एसेट लिमिट को बढ़ाकर ढाई लाख करोड़ रुपये कर देता, तो टाटा संस इस कड़े नियम के दायरे से पूरी तरह बाहर हो जाती।
वित्तीय वर्ष 2026 (FY26) के आंकड़ों के अनुसार, टाटा संस की कुल standalone संपत्ति 1.75 लाख करोड़ रुपये दर्ज की गई है। यह संपत्ति आरबीआई की मौजूदा 1 लाख करोड़ रुपये की सीमा से तो अधिक है, लेकिन प्रस्तावित ढाई लाख करोड़ रुपये की सीमा से कम थी। हालांकि, रिजर्व बैंक अपने इस वित्तीय स्थिरता के फैसले से टस से मस नहीं हुआ।
डूबी कंपनी तो पूरे फाइनेंशियल सिस्टम को खतरा: आरबीआई
एक लाख करोड़ रुपये की इस सीमा को बरकरार रखने के पीछे रिजर्व बैंक ने बेहद मजबूत तर्क दिया है। आरबीआई का कहना है कि यह लिमिट मौजूदा एनबीएफसी सेक्टर की जमीनी हकीकत और इस दायरे में आने वाली कंपनियों के वित्तीय प्रोफाइल का गहन विश्लेषण करने के बाद ही तय की गई है।
केंद्रीय बैंक ने साफ किया कि 'टू बिग टू फेल' (Too Big to Fail) के सिद्धांत के तहत इस स्तर की किसी भी बड़ी वित्तीय कंपनी के डूबने या संकट में आने से पूरे देश के फाइनेंशियल सिस्टम की स्थिरता और बैंकिंग नेटवर्क को बड़ा खतरा हो सकता है। आपको बता दें कि आरबीआई ने सबसे पहले सितंबर 2022 में ही टाटा संस को 'अपर-लेयर एनबीएफसी' की श्रेणी में डाला था, जिसके बाद से ही उसके लिए शेयर बाजार में अपना आईपीओ (IPO) लाना कानूनी रूप से जरूरी हो गया था।
कर्ज चुकाकर रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की चाल; बोर्ड में खुलकर आया मतभेद
शेयर बाजार में लिस्टिंग और आईपीओ की कड़े वैधानिक नियमों व बाध्यताओं से बचने के लिए टाटा संस ने पिछले दिनों एक रणनीतिक कदम उठाया था। कंपनी ने अपने ऊपर बकाया सभी तरह के कर्जों को पूरी तरह चुका दिया (Debt-Free) और खुद को कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के दायरे से बाहर बताते हुए आरबीआई के पास अपना एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन सरेंडर (रद्द) करने के लिए आवेदन कर दिया। टाटा संस का यह आवेदन अभी भी आरबीआई के पास लंबित (Pending) है।
इस बीच, टाटा संस के बोर्ड रूम के भीतर लिस्टिंग को लेकर दो बड़े दिग्गजों के बीच वैचारिक मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं:
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नोएल टाटा (Noel Tata): टाटा ट्रस्ट्स द्वारा नामांकित डायरेक्टर नोएल टाटा कंपनी की शेयर बाजार में लिस्टिंग और आईपीओ लाने के सख्त खिलाफ हैं। उनका मानना है कि होल्डिंग कंपनी की गोपनीयता बनी रहनी चाहिए।
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वेणु श्रीनिवासन (Venu Srinivasan): ट्रस्ट के ही दूसरे नामांकित डायरेक्टर वेणु श्रीनिवासन लिस्टिंग के पक्ष में हैं। उनका तर्क है कि पब्लिक लिस्टिंग से पारदर्शिता बढ़ेगी।
आपको बता दें कि टाटा ट्रस्ट्स ही टाटा संस में सबसे बड़ी और मुख्य शेयरधारक (Shareholder) है, इसलिए बोर्ड के इस आंतरिक विवाद पर पूरे बाजार की नजरें टिकी हैं।
standalone बैलेंस शीट से होगी जांच; बढ़ेंगी टाटा संस की मुश्किलें
आरबीआई ने अपने नए आदेश में स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी एनबीएफसी कंपनी का मूल्यांकन उसके पूरे ग्रुप के एकीकृत खातों (Consolidated Accounts) के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी व्यक्तिगत standalone ऑडिटेड बैलेंस शीट के आधार पर ही किया जाएगा। इसके अलावा, केंद्रीय बैंक अब हर 5 साल के बजाय हर 3 साल में इस एसेट लिमिट की समीक्षा करेगा ताकि तेजी से बदलते वित्तीय माहौल पर कड़ी नजर रखी जा सके।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरबीआई ने साफ तौर पर कहा है कि वह किसी भी विशिष्ट कंपनी को इस नियम में कोई 'विशेष छूट' या रियायत नहीं देगा। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि आरबीआई की यह टिप्पणी भले ही सीधे तौर पर कुछ सरकारी एनबीएफसी के संदर्भ में आई हो, लेकिन इसका सीधा और गहरा असर टाटा संस के रजिस्ट्रेशन रद्द करने वाले आवेदन पर पड़ेगा, जिससे टाटा संस के लिए अब आईपीओ के रास्ते पर आगे बढ़ना लगभग तय माना जा रहा है।