RBI MPC Meeting August 2026: क्या कम होगी होम लोन की ईएमआई या रेपो रेट रहेगा स्थिर? आरबीआई गवर्नर आज 10 बजे करेंगे मौद्रिक नीति का बड़ा ऐलान
मुंबई: देश के करोड़ों लोन खरीदारों, निवेशकों और आम उपभोक्ताओं की निगाहें आज भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के फैसले पर टिकी हुई हैं। 3 अगस्त से शुरू हुई तीन दिवसीय समीक्षा बैठक के बाद आज, 5 अगस्त 2026 को सुबह 10 बजे आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा देश की नई क्रेडिट पॉलिसी और रेपो रेट (Repo Rate) से जुड़े बड़े फैसलों का ऐलान करेंगे। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की अनिश्चितता, मध्य-पूर्व की भू-राजनीतिक उथल-पुथल और जून महीने में खुदरा महंगाई (CPI Inflation) के 4.38 प्रतिशत पर पहुंचने के बीच यह बैठक काफी संवेदनशील मानी जा रही है। बाजार विशेषज्ञों और अधिकांश अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि रिजर्व बैंक फिलहाल ब्याज दरों में बदलाव न करते हुए रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रखने का फैसला ले सकता है।
यदि रिज़र्व बैंक आज रेपो रेट में बदलाव नहीं करता है, तो यह लगातार चौथी ऐसी नीतिगत समीक्षा होगी जिसमें दरों को यथावत (Status Quo) रखा जाएगा। इससे पहले दिसंबर 2025 में की गई कटौती के बाद से ही बेंचमार्क दर 5.25% पर बनी हुई है।
रेपो रेट में बदलाव न होने से होम लोन EMI पर क्या पड़ेगा असर?
देश में होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन लेने वाले करोड़ों ग्राहकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आज उनकी बैंक ईएमआई (EMI) कम होगी या नहीं। वर्तमान में अधिकांश बैंकों के होम लोन एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट (EBLR) यानी सीधे आरबीआई के रेपो रेट से जुड़े हुए हैं।
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रेपो रेट यथावत (Status Quo) रहने पर: यदि आरबीआई रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखता है, तो आपकी मौजूदा लोन ईएमआई में तुरंत कोई बड़ा फेरबदल नहीं होगा। बैंकों की ब्याज दरें वर्तमान स्तर पर ही बनी रहेंगी।
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रेपो रेट में कटौती होने पर: यदि केंद्रीय बैंक आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए 0.25% (25 बेसिस पॉइंट्स) की सरप्राइज कटौती करता है, तो बैंकों द्वारा EBLR दरें घटाए जाने से नए व पुराने होम लोन ग्राहकों की ईएमआई में हर महीने सीधी राहत मिल सकती है।
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MCLR से जुड़े पुराने लोन: मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड्स बेस्ड लेंडिंग रेट (MCLR) से जुड़े पुराने लोन पर रिसेट साइकिल के आधार पर धीरे-धीरे असर दिखता है।
रियल एस्टेट सेक्टर के विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय ब्याज दरों में स्थिरता बनाए रखना भी बाजार के लिए सकारात्मक संकेत है। नीतिगत स्थिरता से घर खरीदारों का भरोसा मजबूत रहता है और लंबे समय के निवेश को सहारा मिलता है।
महंगाई का दबाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार की चुनौतियां
आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती खुदरा महंगाई (CPI Inflation) और वैश्विक कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें हैं। जून 2026 में भारत की खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो मई में 3.93 प्रतिशत थी। यद्यपि यह दर रिज़र्व बैंक के 2 से 6 प्रतिशत के टॉलरेंस बैंड के भीतर है, लेकिन यह केंद्रीय बैंक के 4 प्रतिशत के मध्यकालिक लक्ष्य से ऊपर निकल चुकी है।
इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 83 से 84 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रही हैं। मध्य-पूर्व में जारी तनाव और वैश्विक सप्लाई चेन में आ रही रुकावटों के कारण आने वाले महीनों में आयातित महंगाई (Imported Inflation) का जोखिम बना हुआ है। वहीं, दक्षिण-पश्चिम मानसून की चाल और देश के कई हिस्सों में बाढ़ व जलभराव के कारण खाद्य पदार्थों (सब्जियों व खाद्यान्न) की कीमतों में उतार-चढ़ाव की स्थिति बनी हुई है। इन्हीं कारणों से एमपीसी सदस्यों द्वारा 'न्यूट्रल' या 'वेट एंड वॉच' (Wait and Watch) वाला रुख अपनाने की पूरी संभावना जताई जा रही है।
जीडीपी ग्रोथ और आर्थिक आउटलुक पर क्या होगी आरबीआई की टिप्पणी
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा आज न केवल दरों का ऐलान करेंगे, बल्कि चालू वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर और महंगाई के नए अनुमानों की समीक्षा भी पेश करेंगे। जून की पिछली बैठक में आरबीआई ने FY27 के लिए जीडीपी ग्रोथ रेट का अनुमान 6.6% तय किया था।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की आंतरिक मजबूत मांग, सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च और कॉरपोरेट बैलेंस शीट के बेहतर प्रदर्शन के कारण विकास दर स्थिर बनी हुई है। ऐसे में रिज़र्व बैंक द्वारा जीडीपी विकास दर के अनुमानों में कोई बड़ा नकारात्मक बदलाव करने की संभावना नहीं के बराबर है।
एक्सपर्ट्स की राय: क्या साल के अंत तक मिलेगी ब्याज दरों में राहत?
रॉयटर्स और विभिन्न वित्तीय संस्थानों के हालिया सर्वे के अनुसार, 72 में से 68 से अधिक वरिष्ठ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगस्त की इस समीक्षा बैठक में दरें स्थिर रखी जाएंगी। हालांकि, वित्तीय बाजारों के विश्लेषकों का मानना है कि यदि चालू तिमाही के दौरान खाद्य महंगाई दर नियंत्रित रहती है और अमेरिका के फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) द्वारा दरों में कटौती की दिशा में कदम बढ़ाया जाता है, तो भारतीय रिज़र्व बैंक चालू वित्त वर्ष की अंतिम तिमाहियों (अक्टूबर या दिसंबर 2026) में रेपो रेट घटाने पर विचार कर सकता है।
आज सुबह 10 बजे आरबीआई गवर्नर द्वारा दी जाने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगा कि देश में महंगाई से जंग की क्या रणनीति रहेगी और लोन ग्राहकों के लिए आने वाले दिन कैसे साबित होंगे।