महंगा होगा LPG सिलेंडर! देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के लिए 42 अरब डॉलर के रणनीतिक ईंधन भंडार की तैयारी

महंगा होगा LPG सिलेंडर! देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के लिए 42 अरब डॉलर के रणनीतिक ईंधन भंडार की तैयारी

दुनिया भर में जारी भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर मध्य पूर्व और ईरान-इज़राइल संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला (Energy Supply Chain) पर भारी खतरा मंडरा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे संवेदनशील समुद्री मार्गों से होने वाली तेल और गैस की निर्बाध आपूर्ति में आने वाली रुकावटों से सीख लेते हुए केंद्र सरकार अब देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एक अभूतपूर्व कदम उठाने जा रही है। भारत सरकार देश में 42 अरब डॉलर (लगभग ₹3.6 लाख करोड़ से ₹3.99 लाख करोड़) की लागत से एक विशाल 'रणनीतिक ईंधन भंडार' (Strategic Fuel Reserve) जुटाने के मेगा प्लान पर मंथन कर रही है। इस योजना के लिए जरूरी फंड जुटाने के उद्देश्य से रसोई गैस (LPG) और पाइपलाइन प्राकृतिक गैस (PNG) के उपयोगकर्ताओं पर एक नया विशेष शुल्क या लेवी टैक्स (Levy Tax) लगाने की तैयारी की जा रही है। यदि पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के इस प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी मिल जाती है, तो आम उपभोक्ताओं के इस्तेमाल वाले 14.2 किलोग्राम के घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत में लगभग ₹18 तक की बढ़ोतरी हो सकती है।

42 अरब डॉलर का 'स्ट्रैटेजिक फ्यूल रिजर्व': जानिए क्या है सरकार का मेगा प्लान

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है। इसके साथ ही, देश में रसोई गैस (LPG) और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की भी एक बड़ी मात्रा आयात की जाती है। हाल के वैश्विक संकटों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विदेशी आयात पर अत्यधिक निर्भरता वाले देशों के लिए आपातकालीन स्थिति में ईंधन का बफर स्टॉक (Buffer Stock) होना कितना अनिवार्य है।

सरकार का यह नया प्रस्ताव अगले एक दशक (10 वर्षों) में देश के रणनीतिक ईंधन भंडार की क्षमता को बहुगुणित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। 42 अरब डॉलर की इस महा-परियोजना के तहत आधी से अधिक राशि केवल अत्याधुनिक भंडारण अवसंरचना (Storage Infrastructure) के निर्माण पर खर्च की जाएगी, जबकि शेष राशि का उपयोग इन विशाल भंडारों में कच्चे तेल, एलपीजी और एलएनजी को खरीदकर स्टॉक करने में होगा। इस योजना का लक्ष्य भारत में लगभग 2 महीने की कच्चे तेल और एलपीजी की समग्र मांग तथा 6 सप्ताह की एलपीजी खपत को पूरा करने के लिए पर्याप्त ईंधन का एमरजेंसी रिजर्व तैयार करना है। इसके लिए अगले 10 सालों में अतिरिक्त 28 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) कच्चे तेल भंडारण क्षमता, 9 मिलियन टन एलएनजी भंडारण और 4 मिलियन टन एलपीजी भंडारण क्षमता के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है।

एलपीजी पर ₹1.29 और पीएनजी पर ₹1.43 शुल्क का प्रस्ताव: कैसे जुटाया जाएगा फंड?

इस विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के लिए फंडिंग मॉडल का जो खाका तैयार किया गया है, उसके अनुसार रणनीतिक ईंधन भंडार के दो हिस्से होंगे। पहला हिस्सा कच्चे तेल (Crude Oil) का होगा, जिसके भंडारण और खरीद का पूरा खर्च केंद्र सरकार अपने सरकारी खजाने से वहन करेगी। वहीं, दूसरा हिस्सा कुकिंग गैस (LPG) और नेचुरल गैस (PNG/CNG) के भंडारण इंफ्रास्ट्रक्चर का होगा, जिसके लिए सीधे उपयोगकर्ताओं पर एक छोटा सा अतिरिक्त लेवी शुल्क लगाने का विचार है।

सूत्रों के अनुसार, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एलपीजी पर ₹1.29 (लगभग $0.0136) प्रति किलोग्राम का शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है। घरेलू रसोई में इस्तेमाल होने वाले मानक 14.2 किलोग्राम के सिलेंडर में ₹1.29 प्रति किग्रा के हिसाब से लगभग ₹18.32 प्रति सिलेंडर की बढ़ोतरी होगी। मौजूदा खपत के आधार पर इस एलपीजी लेवी से सरकार को सालाना लगभग 460 मिलियन डॉलर (करीब ₹3,850 करोड़) की आय होने की उम्मीद है। इसी तरह, पाइपलाइन के जरिए घरों में सप्लाई होने वाली प्राकृतिक गैस (PNG) और सीएनजी वाहनों के लिए उपयोग होने वाली गैस के लिए ₹1.43 प्रति मानक घन मीटर (SCM) का शुल्क प्रस्तावित किया गया है, जिससे सालाना लगभग 1 अरब डॉलर जुटाए जा सकेंगे। इन दोनों तरह के शुल्कों को मिलाकर गैस स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए हर साल करीब 1.5 अरब डॉलर (लगभग ₹12,500 करोड़) का फंड एकत्र किया जाएगा।

जापान और दक्षिण कोरिया के मुकाबले भारत का एमरजेंसी फ्यूल बफर कितना कमजोर?

अगर दुनिया के अन्य बड़े एशियाई आयातक देशों से तुलना की जाए, तो भारत का मौजूदा आपातकालीन ईंधन बफर काफी सीमित और चिंताजनक स्थिति में है। वर्तमान में भारत सरकार के नियंत्रण वाले रणनीतिक रिजर्व से देश की केवल 10 दिनों से भी कम समय की जरूरतें पूरी हो पाती हैं। यदि इसमें भारतीय तेल कंपनियों के रिफाइनरी और डिपो में मौजूद कमर्शियल स्टॉक को भी जोड़ दिया जाए, तब भी भारत के पास कुल मिलाकर सीमित समय का ही बैकअप रहता है।

इसके विपरीत, अंतरराष्ट्रीय मानकों के तहत जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के पास अपने राष्ट्रीय आपातकालीन रिजर्व में 100 दिनों से भी अधिक की जरूरतों को पूरा करने वाला ईंधन बफर हमेशा सुरक्षित रहता है। भारत में यदि पश्चिम एशिया में युद्ध या होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी जैसी कोई बड़ी भू-राजनीतिक तबाही होती है, तो देश में ऊर्जा की भारी किल्लत हो सकती है। यही वजह है कि भारत सरकार अब अन्य विकसित देशों की तर्ज पर अपने रणनीतिक गैस और क्रूड रिजर्व को वैश्विक मानकों के अनुरूप मजबूत बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है।

घरेलू बजट पर पड़ेगा 2% का अतिरिक्त बोझ: क्या होगा आम जनता पर असर?

हालांकि देश की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से यह योजना बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है, लेकिन तात्कालिक रूप से इसका असर देश के करोड़ों आम और मध्यमवर्गीय परिवारों के घरेलू बजट पर पड़ना तय माना जा रहा है। सरकार के प्राथमिक अनुमानों के अनुसार इस प्रस्तावित शुल्क से घरेलू गैस बिलों में लगभग 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की जाएगी।

उज्जवला योजना के लाभार्थियों और निम्न-मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए यह बढ़ोतरी महंगाई के दौर में एक अतिरिक्त वित्तीय बोझ साबित हो सकती है। आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि यद्यपि रणनीतिक सुरक्षा देश के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है, फिर भी सरकार को यह देखना होगा कि क्या इस लेवी का एक हिस्सा सब्सिडी तंत्र के माध्यम से कम आय वाले परिवारों के लिए संतुलित किया जा सकता है। इसके अलावा, वाणिज्यिक एलपीजी और औद्योगिक नेचुरल गैस पर यह शुल्क लगने से रेस्तरां, होटल और विनिर्माण क्षेत्र की परिचालन लागत में भी हल्की वृद्धि देखी जा सकती है।

विभिन्न मंत्रालयों के बीच मंथन जारी: प्रधानमंत्री कैबिनेट की मंजूरी का इंतजार

वर्तमान में यह प्रस्ताव पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा तैयार किए गए एक अंतर-मंत्रालयी मसौदे (Draft Proposal) का हिस्सा है। इस पर वित्त मंत्रालय, वाणिज्य मंत्रालय और नीति आयोग सहित विभिन्न संबंधित विभागों में विस्तृत चर्चाएं और समीक्षाएं की जा रही हैं। अभी तक इस प्रस्ताव को औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली केंद्रीय कैबिनेट (Union Cabinet) के समक्ष अंतिम मंजूरी के लिए पेश नहीं किया गया है।

यह भी अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि इस शुल्क को किस व्यावहारिक तंत्र या टैक्स हेड के तहत वसूला जाएगा—क्या इसे पेट्रोल और डीजल की तर्ज पर एक विशेष सेस के रूप में जोड़ा जाएगा या बिलिंग में एक अलग 'एनर्जी सिक्योरिटी सरचार्ज' के रूप में दिखाया जाएगा। अंतिम निर्णय कैबिनेट की बैठक के बाद ही लिया जाएगा। यदि कैबिनेट से इसे हरी झंडी मिल जाती है, तो आने वाले समय में ईंधन बिलिंग प्रणाली में आवश्यक संशोधन करके इसे लागू किया जा सकता है।

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