IRDAI New Rules Row: बीमा क्षेत्र में बड़ा भूचाल, 83 लाख कर्मियों पर मंडराया संकट; IBAI ने चेताया- 10 लाख लोगों की जा सकती है नौकरी

IRDAI New Rules Row: बीमा क्षेत्र में बड़ा भूचाल, 83 लाख कर्मियों पर मंडराया संकट; IBAI ने चेताया- 10 लाख लोगों की जा सकती है नौकरी

भारत के तेजी से बढ़ते वित्तीय और बीमा बाजार में उस समय हड़कंप मच गया जब इंश्योरेंस ब्रोकर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IBAI) ने बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDAI) के नए प्रस्तावित नियमों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। एसोसिएशन ने चेतावनी दी है कि यदि नियामक द्वारा प्रस्तावित नए वितरण ढांचे को बिना संशोधन के लागू किया गया, तो पूरे देश में बीमा वितरण तंत्र से जुड़े लगभग 83 लाख लोगों के भविष्य पर सीधा असर पड़ेगा। इनमें से न्यूनतम रूढ़िवादी अनुमान (Conservative Estimate) के आधार पर भी कम से कम 10 लाख कर्मियों की नौकरियां सीधे तौर पर खत्म हो सकती हैं। एसोसिएशन के अनुसार, नए नियमों के कारण इंटरमीडियरीज (दलालों व एजेंटों) के राजस्व में 60 से 70 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आने का अंदेशा है, जिससे ब्रोकरेज फर्म्स, डिजिटल वेब एग्रीगेटर्स और कॉरपोरेट एजेंटों के लिए अपने मौजूदा कार्यबल को बनाए रखना लगभग असंभव हो जाएगा। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए संगठन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की गुहार लगाई है।

आखिर क्या है इरडा का नया प्रस्ताव जिसने बढ़ाया इंडस्ट्री में तनाव?

इरडा ने 23 सितंबर को 'रि-कैलिब्रेटिंग इकोनॉमिक्स ऑफ इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन' (Recalibrating Economics of Insurance Distribution) शीर्षक से एक व्यापक कंसल्टेशन पेपर जारी किया था। नियामक का उद्देश्य बीमा उत्पादों की बिक्री को अधिक पारदर्शी बनाना, प्रबंधन खर्च (Expenses of Management - EoM) को तर्कसंगत करना और ग्राहकों तक बीमा पहुंच की लागत को कम करना है। नियामक का तर्क है कि बीमा कंपनियां और उनके मध्यस्थ अत्यधिक कमीशन और मार्केटिंग खर्च वसूल रहे हैं, जिससे अंतिम उपभोक्ता के प्रीमियम का बड़ा हिस्सा वितरण लागत में ही खप जाता है। इरडा ने अलग-अलग प्रोडक्ट्स और वितरण चैनलों पर सख्त सब-कैप (Sub-Caps) लगाने, 'इंश्योरेंस ब्रोकर' की पारंपरिक परिभाषा को बदलकर 'इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन एंटिटी' (IDE) करने और कमीशन के ढांचे को कड़ाई से सीमित करने का प्रस्ताव रखा है।

आईबीएआई (IBAI) की मुख्य आपत्तियां: 70% तक घट जाएगी कमाई

800 से अधिक पंजीकृत सदस्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन आईबीएआई के निदेशक पवनजीत सिंह ढींगरा और अध्यक्ष नरेंद्र भरिंदवाल ने मुंबई में आयोजित मीडिया संवाद में नियामक के प्रस्तावों पर कड़ी चिंता जताई:

  • आय में 70% की ऐतिहासिक गिरावट: सख्त सब-कैप लागू होने से स्वतंत्र ब्रोकरों और इंटरमीडियरीज की कमीशन आय में 60% से 70% तक की कटौती होगी। ब्रोकरों का कहना है कि जहां डीलर-नियंत्रित मोटर इंश्योरेंस (75% तक) या लोन-लिंक्ड क्रेडिट लाइफ (42-45%) में कमीशन बहुत ज्यादा है, वहीं स्वतंत्र ब्रोकरों का औसत कमीशन पहले से ही मात्र 17-18% और कॉरपोरेट ब्रोकरों का 6-11% ही है। ऐसे में सभी चैनलों पर एक समान सीमा थोपना स्वतंत्र ब्रोकरों के अस्तित्व को मिटा देगा।

  • 10 लाख नौकरियों पर सीधा प्रहार: पूरे देश में बीमा उद्योग 83 लाख से अधिक लोगों (एजेंट्स, ब्रोकर स्टाफ, बैक-एंड ऑपरेशंस, सर्वेयर्स, क्लेम एग्जीक्यूटिव्स) को रोजगार देता है। जब ब्रोकरेज कंपनियों का राजस्व दो-तिहाई घट जाएगा, तो छंटनी के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।

  • रेगुलेटरी अनिश्चितता (Regulatory Instability): 2016 और 2023 के बाद पिछले एक दशक में यह तीसरा बड़ा खर्च नियमन सुधार है। 2023 के सुधारों की तय समीक्षा 2028 में होनी थी, लेकिन उससे पहले ही दोबारा नियमों को बदलने से विदेशी निवेशकों और घरेलू कंपनियों में अविश्वास पैदा हुआ है। हालिया घटनाक्रमों के बाद लिस्टेड बीमा कंपनियों के मार्केट कैप में करीब ₹1.5 लाख करोड़ की गिरावट दर्ज की जा चुकी है।

  • गलत भुगतानों और जीएसटी टैक्स चोरी की आशंका: आईबीएआई ने आगाह किया कि 2023 के सुधारों से पहले उत्पाद-वार कैप के चलते 15 बीमा कंपनियां ₹824 करोड़ के बोगस जीएसटी इनपुट क्रेडिट और ऑफ-द-बुक्स भुगतानों में फंसी थीं। कड़े सब-कैप दोबारा लगाने से वही अवांछित प्रवृत्तियां फिर से जन्म ले सकती हैं।

IRDAI के प्रस्तावित सुधार बनाम IBAI की आपत्तियां

प्रमुख पहलू IRDAI का प्रस्तावित दृष्टिकोण IBAI व उद्योग जगत की मुख्य चिंता
वितरण कमीशन व शुल्क प्रोडक्ट और चैनल के आधार पर सख्त सब-कैप लगाना। इंटरमीडियरी आय में 60-70% की गिरावट, संचालन बंद होने का खतरा।
रोजगार प्रभाव लागत नियंत्रण से दीर्घकालिक दक्षता का दावा। 83 लाख में से कम से कम 10 लाख प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष नौकरियों की कटौती।
मध्यस्थों की पहचान 'ब्रोकर' शब्द की जगह 'डिस्ट्रीब्यूशन एंटिटी' (IDE)। वैश्विक पहचान खत्म होगी; पॉलिसीधारक के कानूनी प्रतिनिधि की भूमिका कमजोर होगी।
बीमा पैठ (Penetration) सस्ते प्रीमियम के जरिए '2047 तक सभी को बीमा' का लक्ष्य। फील्ड एजेंट्स और एडवाइजरी नेटवर्क टूटने से ग्रामीण इलाकों में पहुंच घटेगी।
प्रतिक्रिया की समयसीमा सीमित दिनों का प्राथमिक कंसल्टेशन। तकनीकी जटिलताओं के अध्ययन के लिए दिसंबर 2026 तक का समय मांगा।

पॉलिसीधारकों और क्लेम सेटलमेंट पर क्या पड़ेगा असर?

म्यूचुअल फंड के विपरीत, जहां एकमुश्त निवेश के बाद डिजिटल प्रबंधन होता है, बीमा एक जटिल वित्तीय सुरक्षा उत्पाद है जिसमें साल-दर-साल पॉलिसी रिन्यूअल, एंडोर्समेंट और सबसे महत्वपूर्ण—क्लेम सेटलमेंट के समय भौतिक सहायता की आवश्यकता होती है।

  • क्लेम में ब्रोकर की भूमिका: आईबीएआई ने नियामक के ही आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि जनरल इंश्योरेंस में 69% शिकायतें क्लेम से संबंधित होती हैं, और शिकायत निवारण पोर्टल पर 63% मामलों में ग्राहकों के पक्ष में फैसला होता है। स्वतंत्र ब्रोकर कानूनी रूप से बीमा कंपनी के बजाय ग्राहक (पॉलिसीधारक) का प्रतिनिधि होता है।

  • सपोर्ट सिस्टम में कमी: यदि डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों की कमाई सिमट गई, तो वे फील्ड में क्लेम असिस्टेंट्स, सर्वेयर्स और कस्टमर सर्विस नेटवर्क का खर्च नहीं उठा पाएंगी। इससे अंततः क्लेम रिजेक्शन के समय आम जनता और एमएसएमई (MSME) ग्राहकों को बड़ी असुविधा का सामना करना पड़ेगा।

एसोसिएशन ने प्रधानमंत्री से लगाई गुहार: दिसंबर तक समयसीमा बढ़ाने की मांग

आईबीएआई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्रालय को भेजे ज्ञापन में इस पूरे मसले की समीक्षा के लिए एक उच्चस्तरीय अंतर-मंत्रालयी समिति गठित करने का अनुरोध किया है। संगठन ने स्पष्ट किया है कि वे नियमों में पारदर्शिता और सुधार के विरोधी नहीं हैं, लेकिन सुधार ऐसे होने चाहिए जो उद्योग की रीढ़ कहे जाने वाले फील्ड वर्कर्स और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क को तबाह न करें। आईबीएआई ने इरडा से मांग की है कि कंसल्टेशन पेपर पर फीडबैक देने की समयसीमा को कम से कम दो महीने बढ़ाकर दिसंबर 2026 के अंत तक किया जाए, ताकि सभी हितधारकों से व्यापक चर्चा के बाद ही एक संतुलित और सतत आर्थिक नीति तैयार की जा सके।