GST 2.0 की ओर बढ़ता भारत: अप्रत्यक्ष कर प्रणाली में बड़े संरचनात्मक बदलावों की तैयारी

GST 2.0 की ओर बढ़ता भारत: अप्रत्यक्ष कर प्रणाली में बड़े संरचनात्मक बदलावों की तैयारी

1 जुलाई 2017 को लागू हुई वस्तु एवं सेवा कर (GST) व्यवस्था ने देश के अप्रत्यक्ष कर ढांचे को 'एक देश, एक टैक्स' के सूत्र में पिरोने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। रिकॉर्ड मासिक राजस्व संग्रह और मजबूत डिजिटल कंप्लायंस के बाद अब भारत सरकार और जीएसटी काउंसिल इस व्यवस्था के अगले चरण यानी 'GST 2.0' को धरातल पर उतारने की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं। लंबे समय से कारोबारियों, एमएसएमई (MSME) सेक्टर और टैक्स जानकारों की मांग रही है कि मौजूदा कर ढांचे की विसंगतियों, जटिल इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) नियमों और टैक्स स्लैब की बहुलता को सुव्यवस्थित किया जाए। प्रमुख नीति आयोगों, सीआईआई (CII), फिक्की (FICCI) और कर विशेषज्ञों ने जीएसटी काउंसिल के समक्ष 6 युगांतरकारी सुधार प्रस्ताव पेश किए हैं, जिनसे व्यापार करने की सुगमता (Ease of Doing Business) को नई ऊंचाई मिलेगी।

1. टैक्स स्लैब का युक्तिकरण: 3-टियर टैक्स स्ट्रक्चर लागू करने का प्रस्ताव

वर्तमान जीएसटी व्यवस्था में मुख्य रूप से चार मानक टैक्स स्लैब (5%, 12%, 18% और 28%) मौजूद हैं, जिसके कारण कई उत्पादों के वर्गीकरण को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि इसे घटाकर एक संतुलित '3-टियर टैक्स स्ट्रक्चर' में बदला जाए। इसके तहत 12% और 18% वाले दो मध्यम स्लैब्स को मिलाकर 14% से 15% का एक एकीकृत 'स्टैंडर्ड स्लैब' बनाया जा सकता है। आवश्यक वस्तुओं के लिए 5% की रियायती दर और विलासिता व डीमेरिट वस्तुओं (तंबाकू, लग्जरी कार आदि) के लिए 28% का स्लैब बरकरार रखा जा सकता है। स्लैब की संख्या कम होने से उत्पादों के क्लासिफिकेशन विवादों पर विराम लगेगा और कर प्रणाली बेहद पारदर्शी बन जाएगी।

2. इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर की समाप्ति: एमएसएमई और मैन्युफैक्चरिंग को बड़ी राहत

उद्योग जगत की सबसे पुरानी शिकायतों में से एक 'इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर' (Inverted Duty Structure) रहा है, जहां तैयार माल (Finished Goods) पर लगने वाला टैक्स कच्चा माल (Raw Material) और इनपुट सेवाओं पर लगने वाले टैक्स से कम होता है। इसके चलते कपड़ा, जूता-चप्पल, उर्वरक और सोलर इक्विपमेंट जैसे क्षेत्रों में कारोबारियों का भारी इनपुट टैक्स क्रेडिट सरकार के पास ब्लॉक हो जाता है। जीएसटी 2.0 में इस विसंगति को पूरी तरह खत्म करने का प्रस्ताव है, जिससे कंपनियों की वर्किंग कैपिटल (कार्यशील पूंजी) मुक्त होगी और घरेलू विनिर्माण इकाइयों की नकदी प्रवाह समस्या का स्थायी समाधान निकलेगा।

3. इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) नियमों का सरलीकरण और धारा 16(4) में ढील

वर्तमान में इनपुट टैक्स क्रेडिट क्लेम करने की शर्तें बेहद कड़ी हैं। यदि कोई सप्लायर तकनीकी त्रुटि या डिफॉल्ट के कारण समय पर रिटर्न (GSTR-1) फाइल नहीं करता, तो खरीदार का आईटीसी ब्लॉक हो जाता है। विशेषज्ञों ने प्रस्ताव दिया है कि वास्तविक खरीदार को केवल विक्रेता के डिफॉल्ट के आधार पर दंडित नहीं किया जाना चाहिए। इसके अलावा, वित्तीय वर्ष समाप्त होने के बाद आईटीसी क्लेम करने की समयसीमा (Section 16(4)) में कारोबारी राहत देने और क्रेडिट रिवर्सल से जुड़े विवादों को कम करने के लिए स्वचालित एआई-आधारित सुलह (AI Reconciliation) प्रणाली लागू करने की सिफारिश की गई है।

4. पेट्रोल-डीजल, प्राकृतिक गैस और रियल एस्टेट को जीएसटी के दायरे में लाना

भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए ऊर्जा उत्पादों को जीएसटी के दायरे से बाहर रखना एक बड़ी बाधा माना जाता रहा है। विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों ने पेट्रोल, डीजल, एटीएफ (विमानन ईंधन) और प्राकृतिक गैस (Natural Gas) को चरणबद्ध तरीके से जीएसटी के तहत लाने का रोडमैप सौंपा है। इससे लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन लागत में सीधी गिरावट आएगी और राज्यों को इनपुट टैक्स का सीमलेस फ्लो मिलेगा। साथ ही, रियल एस्टेट क्षेत्र में निर्माणाधीन और तैयार संपत्तियों पर स्टांप ड्यूटी व जीएसटी के दोहरे प्रभाव को समाप्त करने के लिए समग्र भूमि-भवन बिक्री पर एकीकृत कर व्यवस्था का सुझाव दिया गया है।

5. विवाद समाधान के लिए जीएसटी अपीलेट ट्रिब्यूनल (GSTAT) का तेज संचालन

जीएसटी लागू होने के वर्षों बाद भी राज्यों में स्वतंत्र अपीलीय न्यायाधिकरणों (GSTAT) की पूरी पीठों का सक्रिय न होना मुकदमों की बढ़ती संख्या का बड़ा कारण बना हुआ है। इसके कारण छोटे व्यापारियों को भी साधारण विवादों के लिए हाईकोर्ट का रुख करना पड़ता है, जो बेहद खर्चीला और समय लेने वाला है। जीएसटी 2.0 के तहत राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय अपीलेट ट्रिब्यूनल्स को पूरी तरह डिजिटलाइज्ड, पेपरलेस और फास्ट-ट्रैक मोड में संचालित करने का प्रस्ताव है, जिससे लंबित मुकदमों का निपटारा 3 से 6 महीने की तय सीमा के भीतर किया जा सके।

6. असेसमेंट और ऑडिट में फेसलेस व ऑटोमेटेड सिस्टम का विस्तार

आयकर विभाग की तर्ज पर जीएसटी प्रशासन में भी मानवीय हस्तक्षेप और इंस्पेक्टर राज की गुंजाइश को पूरी तरह खत्म करने के लिए 'फेसलेस स्क्रूटनी और असेसमेंट' व्यवस्था को अनिवार्य बनाने की सिफारिश की गई है। इसके तहत नोटिस जारी करने, दस्तावेजों के सत्यापन और कर निर्धारण का कार्य केंद्रीकृत एल्गोरिदम और मशीन लर्निंग टूल्स के जरिए रैंडम आधार पर अधिकारियों को आवंटित किया जाएगा। इससे करदाताओं को स्थानीय अधिकारियों द्वारा अनावश्यक समन या ऑडिट के नाम पर होने वाले उत्पीड़न से सुरक्षा मिलेगी और टैक्स कंप्लायंस की लागत घटेगी।

आम उपभोक्ताओं और भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा दूरगामी सकारात्मक प्रभाव

यदि जीएसटी काउंसिल इन 6 प्रमुख सुधारों को जीएसटी 2.0 फ्रेमवर्क के तहत मंजूरी देती है, तो इससे न केवल कारोबारियों के अनुपालन खर्च में भारी कटौती होगी बल्कि अर्थव्यवस्था के औपचारिकरण को नई गति मिलेगी। स्लैब्स के सरलीकरण से रोजमर्रा के उपभोग की कई वस्तुएं सस्ती होंगी, जिससे आम नागरिकों की क्रय शक्ति बढ़ेगी। एक पारदर्शी और विवाद-मुक्त कर व्यवस्था विदेशी निवेशकों को भारत में विनिर्माण संयंत्र स्थापित करने के लिए भी प्रोत्साहित करेगी, जिससे देश 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को तेजी से हासिल कर सकेगा।

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