PF निकाल लिया, तो भी न छोड़ें अधूरा काम: नौकरी बदलने पर EPS सर्विस रिकॉर्ड ट्रांसफर करना क्यों है बेहद जरूरी?

PF निकाल लिया, तो भी न छोड़ें अधूरा काम: नौकरी बदलने पर EPS सर्विस रिकॉर्ड ट्रांसफर करना क्यों है बेहद जरूरी?

निजी क्षेत्र में काम करने वाले वेतनभोगी कर्मचारियों के बीच नौकरी बदलना एक आम बात है, लेकिन करियर की इस भागदौड़ में वित्तीय और भविष्य निधि से जुड़े रिकॉर्ड्स की अनदेखी अक्सर भारी पड़ जाती है। अधिकांश कर्मचारी नई कंपनी ज्वाइन करते ही अपने पुराने प्रॉविडेंट फंड यानी ईपीएफ (EPF) खाते से या तो पैसे निकाल लेते हैं या फिर नए खाते में केवल पीएफ बैलेंस ट्रांसफर करवाकर निश्चिंत हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि उनका सारा काम पूरा हो चुका है, जबकि हकीकत में वे अपनी सेवानिवृत्ति सुरक्षा का सबसे अहम हिस्सा यानी कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) का रिकॉर्ड ट्रांसफर करना भूल जाते हैं। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के नियमों के अनुसार आपके वेतन से कटने वाला पीएफ योगदान दो अलग-अलग हिस्सों में विभाजित होता है, जिसमें एक हिस्सा ईपीएफ और दूसरा हिस्सा ईपीएस में जमा होता है। जब आप सिर्फ पीएफ का पैसा ट्रांसफर करते हैं या आपात स्थिति में उसे विड्रॉ करते हैं, तो पेंशन खाते का सर्विस रिकॉर्ड अपने आप ट्रांसफर नहीं होता जब तक कि आप उसके लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन न करें। यदि आपने पुरानी कंपनियों की सर्विस हिस्ट्री को नए यूएएन (UAN) या वर्तमान मेंबर आईडी से लिंक नहीं कराया, तो भविष्य में बुढ़ापे के समय मिलने वाली मासिक पेंशन पर स्थायी ग्रहण लग सकता है।

ईपीएफ और ईपीएस के गणित को समझना क्यों है बुनियादी जरूरत

ईपीएफओ के नियमों के तहत किसी भी संगठित क्षेत्र के कर्मचारी के मूल वेतन (बेसिक सैलरी) और महंगाई भत्ते (DA) का 12 प्रतिशत हिस्सा ईपीएफ खाते में कटता है। नियोक्ता यानी कंपनी भी कर्मचारी के खाते में 12 प्रतिशत का ही बराबर योगदान देती है, लेकिन नियोक्ता के इस 12 प्रतिशत अंशदान में से 3.67 प्रतिशत हिस्सा कर्मचारी के ईपीएफ खाते में जाता है और शेष 8.33 प्रतिशत हिस्सा (अधिकतम 1,250 रुपये प्रतिमाह की वैधानिक सीमा तक) सीधे कर्मचारी पेंशन योजना यानी ईपीएस (EPS-95) में जमा होता है। इसका सीधा मतलब यह है कि ईपीएफ का पैसा आपकी बचत है जिस पर हर साल चक्रवृद्धि ब्याज मिलता है और जिसे आप जरूरत पड़ने पर निकाल सकते हैं, लेकिन ईपीएस का पैसा कोई सामान्य बचत खाता नहीं है बल्कि यह आपकी जीवनभर की पेंशन निधि है। ईपीएस खाते में जमा राशि पर ब्याज नहीं मिलता, बल्कि इसमें आपकी कुल सेवा अवधि यानी 'सर्विस लेंथ' दर्ज होती रहती है। जब कोई कर्मचारी नौकरी बदलता है और पुरानी कंपनी की ईपीएस सर्विस को नई कंपनी में ट्रांसफर नहीं करता, तो ईपीएफओ के रिकॉर्ड में उसकी पिछली सेवा अवधि शून्य या अधूरी मानी जा सकती है।

10 साल की पेंशन योग्य सेवा का कड़ा नियम और सर्विस की निरंतरता

कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) का सबसे बुनियादी और अटल नियम यह है कि किसी भी कर्मचारी को 58 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद आजीवन मासिक पेंशन पाने के लिए न्यूनतम 10 वर्ष (120 महीने) की अहर्ता सेवा (Eligible Service) पूरी करनी अनिवार्य होती है। मान लीजिए आपने पहली कंपनी में 4 साल काम किया, दूसरी कंपनी में 3 साल काम किया और तीसरी कंपनी में 5 साल काम किया; यदि आप इन सभी नौकरियों के दौरान अपनी ईपीएस सेवा को ट्रांसफर कराते रहते हैं, तो आपकी कुल पेंशन सेवा 12 वर्ष गिनी जाएगी और आप जीवनभर मासिक पेंशन पाने के वैध हकदार बन जाएंगे। इसके विपरीत, यदि आपने हर नौकरी बदलने पर सर्विस रिकॉर्ड को लिंक नहीं कराया और पिछली कंपनियों के रिकॉर्ड बिखरे रह गए, तो ईपीएफओ के सिस्टम में आपकी कोई भी नौकरी 10 साल की सीमा पार नहीं कर पाएगी। ऐसी स्थिति में 58 साल की उम्र में आपको मासिक पेंशन का लाभ मिलने के बजाय केवल एकमुश्त नाममात्र की रकम वापस मिलेगी, जो बुढ़ापे में बढ़ती महंगाई के सामने नाकाफी साबित होगी। सर्विस ट्रांसफर कराने से आपकी पिछली सेवा अवधि नई सेवा में जुड़ जाती है और सर्विस में कोई गैर-अंशदायी ब्रेक नहीं माना जाता।

पीएफ विड्रॉ करने के बाद भी ईपीएस सर्विस ट्रांसफर क्यों जरूरी है

कई बार कर्मचारी पैसों की तंगी या अन्य प्राथमिकताओं के चलते पुरानी नौकरी छोड़ने के बाद फॉर्म 19 भरकर अपना पूरा ईपीएफ फंड निकाल लेते हैं। यहां सबसे बड़ा भ्रम यह फैलता है कि जब पीएफ का पैसा ही निकाल लिया गया, तो अब ट्रांसफर करने के लिए क्या बचा है। विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि यदि आपने 10 साल से कम की नौकरी में पीएफ का पैसा निकाल भी लिया है, तब भी आपको अपनी पेंशन सर्विस हिस्ट्री को जिंदा रखना चाहिए और फॉर्म 10सी के जरिए 'स्कीम सर्टिफिकेट' (Scheme Certificate) हासिल करना चाहिए या नई नौकरी में सर्विस को जोड़ना चाहिए। यदि आप 10 साल की सेवा पूरी होने से पहले ईपीएस का पैसा भी एकमुश्त विड्रॉ कर लेते हैं, तो आपकी वह पूरी सर्विस अवधि हमेशा के लिए लैप्स हो जाती है और अगली नौकरी में आपकी पेंशन सेवा की उल्टी गिनती फिर से शून्य से शुरू होगी। इसलिए समझदारी इसी में है कि अगर बहुत मजबूरी न हो, तो ईपीएस का पैसा निकालने के बजाय उसकी सर्विस हिस्ट्री को हमेशा नई कंपनी के साथ ट्रांसफर करते रहें ताकि 10 साल का माइलस्टोन आसानी से पूरा हो सके।

फॉर्म 13 और यूनिफाइड पोर्टल से ऑनलाइन ट्रांसफर की आसान विधि

डिजिटल इंडिया के दौर में ईपीएफओ ने सर्विस ट्रांसफर की पूरी प्रक्रिया को पूरी तरह से पेपरलेस और पारदर्शी बना दिया है। इसके लिए आपको किसी भी पुराने दफ्तर के चक्कर लगाने की कतई आवश्यकता नहीं है। सबसे पहले ईपीएफओ के 'यूनिफाइड मेंबर पोर्टल' (Unified Member Portal) पर अपने 12 अंकों के यूएएन (UAN) और पासवर्ड की मदद से लॉगिन करें। लॉगिन करने के बाद 'Online Services' टैब में जाएं और 'One Member - One EPF Account (Transfer Request)' विकल्प पर क्लिक करें। यहां आपकी वर्तमान नियुक्ति का विवरण दिखाई देगा। इसके बाद आपको अपनी पुरानी मेंबर आईडी दर्ज करनी होगी और यह चुनना होगा कि आप क्लेम का सत्यापन (Attestation) अपनी पिछली कंपनी से कराना चाहते हैं या वर्तमान कंपनी से। जैसे ही आप आधार बेस्ड ओटीपी दर्ज करेंगे, आपकी ऑनलाइन ट्रांसफर रिक्वेस्ट दर्ज हो जाएगी। इस एक सिंगल रिक्वेस्ट के जरिए न केवल आपका ईपीएफ बैलेंस ट्रांसफर होता है, बल्कि सिस्टम जनरेटेड फॉर्म 13 (Annexure-K) के जरिए आपकी पुरानी ईपीएस सर्विस का पूरा विवरण भी नए पीएफ खाते में स्थानांतरित कर दिया जाता है।

स्कीम सर्टिफिकेट: करियर ब्रेक और लंबी बेरोजगारी के समय सबसे बड़ा सुरक्षा कवच

यदि कोई कर्मचारी एक नौकरी छोड़ने के बाद तुरंत दूसरी नौकरी नहीं पकड़ पाता, या वह उच्च शिक्षा, स्टार्टअप अथवा पारिवारिक कारणों से कुछ वर्षों का ब्रेक ले रहा है, तो ऐसी दशा में 'स्कीम सर्टिफिकेट' एक वरदान साबित होता है। ईपीएफओ फॉर्म 10सी के जरिए कर्मचारी स्कीम सर्टिफिकेट के लिए आवेदन कर सकता है। यह सर्टिफिकेट इस बात का पक्का सरकारी दस्तावेज होता है कि आपने कितने महीने या साल ईपीएस में योगदान दिया है। जब भी आप भविष्य में दोबारा संगठित क्षेत्र में नौकरी शुरू करेंगे, तो नई कंपनी को यह सर्टिफिकेट सौंपकर अपनी पिछली पूरी सर्विस को सीधे नए खाते में जुड़वा सकते हैं। यह सर्टिफिकेटधारक की असामयिक मृत्यु की स्थिति में उसके परिवार या आश्रितों को तत्काल पारिवारिक पेंशन की सुरक्षा भी प्रदान करता है।

पेंशन गणना का फॉर्मूला और सर्विस ट्रांसफर न करने का भारी नुकसान

ईपीएस के तहत मिलने वाली मासिक पेंशन का निर्धारण एक तय फॉर्मूले से होता है: (पेंशन योग्य सेवा × पेंशन योग्य वेतन) / 70। इस फॉर्मूले में 'पेंशन योग्य सेवा' (Pensionable Service) का सीधा संबंध आपके कुल ट्रांसफर किए गए वर्षों से है। यदि किसी कर्मचारी की कुल प्रमाणित सेवा 20 साल या उससे अधिक हो जाती है, तो ईपीएफओ उसे नियम के अनुसार 2 साल का बोनस वेटेज प्रदान करता है, जिससे उसकी पेंशन राशि में भारी इजाफा हो जाता है। यदि आपने सर्विस ट्रांसफर नहीं कराई और आपकी सेवा 20 साल के बजाय कागजों में 18 साल ही रह गई, तो आप न केवल कम वर्षों की पेंशन पाएंगे बल्कि 2 साल के अतिरिक्त बोनस लाभ से भी हमेशा के लिए हाथ धो बैठेंगे। इसके अलावा यदि आपके सभी खातों का सर्विस रिकॉर्ड एकीकृत नहीं होगा, तो 58 साल की आयु में पेंशन का क्लेम (Form 10D) भरते समय ईपीएफओ के फील्ड ऑफिस में क्लेम बार-बार रिजेक्ट होगा और सत्यापन के लिए पुरानी बंद हो चुकी कंपनियों के दस्तावेज जुटाना नामुमकिन जैसा हो जाएगा। इसलिए जागरूक कर्मचारी बनें और अपनी हर पुरानी नौकरी का ईपीएस रिकॉर्ड समय रहते ट्रांसफर करवाएं।