FCNR(B) Record Inflows: विदेशी मुद्रा खातों में बरसे डॉलर, एनआरआई डिपॉजिट्स में 7 गुना की ऐतिहासिक छलांग; जानिए कितना आया पैसा
भारतीय बैंकिंग व्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) के मोर्चे पर एक नया रिकॉर्ड बना है। अनिवासी भारतीयों (NRIs) ने भारतीय बैंकों के विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) यानी FCNR(B) खातों में जमकर डॉलर और अन्य विदेशी मुद्राएं जमा कराई हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जुलाई अवधि में एनआरआई डिपॉजिट प्रवाह में सालाना आधार पर करीब 7 गुना (678.2%) का जबरदस्त उछाल आया है। यह इनफ्लो बढ़कर रिकॉर्ड $36.24 बिलियन (लगभग 36.24 अरब डॉलर) के पार पहुंच गया है।
विशेषज्ञ इसे पिछले एक दशक में एनआरआई डिपॉजिट्स में आया सबसे बड़ा मोड़ मान रहे हैं, जिसने रुपये को मजबूती देने और देश के विदेशी मुद्रा भंडार को नई ऊंचाई पर ले जाने में अहम भूमिका निभाई है।
FCNR(B) खातों में अचानक क्यों आई डॉलर की बाढ़: समझिए असली वजह
एनआरआई निवेशकों की ओर से आए इस भारी निवेश के पीछे कोई संयोग नहीं, बल्कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की एक सोची-समझी नीतिगत रणनीति है:
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आरबीआई की स्पेशल स्वैप विंडो (Concessional Swap Facility): रिजर्व बैंक ने बैंकों के लिए एक विशेष एफसीएनआर (बी) स्वैप विंडो शुरू की, जिसके तहत बैंक एनआरआई से डॉलर जुटाकर आरबीआई के साथ बिना किसी करंसी हेजिंग लागत (Zero Hedging Cost) के स्वैप कर सकते हैं। हेजिंग की लागत (जो लगभग 3% से 3.5% होती थी) को आरबीआई द्वारा वहन किए जाने से बैंकों की फंडिंग लागत काफी घट गई।
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ब्याज दरों में 200 से 300 बेसिस प्वाइंट्स का उछाल: लागत कम होने का सीधा फायदा बैंकों ने ग्राहकों तक पहुंचाया। भारतीय बैंकों ने एफसीएनआर (बी) जमाओं पर ब्याज दरें 3.5%-4% से बढ़ाकर सीधे 6% से 7.10% तक कर दीं।
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CRR और SLR छूट: केंद्रीय बैंक ने इस विशेष विंडो के तहत जुटाए गए फंड पर बैंकों को अनिवार्य कैश रिजर्व रेश्यो (CRR) और स्टेट्यूटरी लिक्विडिटी रेश्यो (SLR) की शर्तों से छूट दी, जिससे बैंकों को ऊंचा ब्याज देने की अतिरिक्त गुंजाइश मिली।
वैश्विक बाजारों के मुकाबले क्यों बेहद आकर्षक बना FCNR(B) डिपॉजिट?
विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के निवेशकों के लिए यह ऑफर अत्यंत आकर्षक साबित हुआ, जिसके कई प्रमुख वित्तीय कारण हैं:
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शून्य करंसी रिस्क (Zero Exchange Rate Risk): FCNR(B) खाते की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें जमाकर्ता को रुपये में कन्वर्जन का कोई जोखिम नहीं उठाना पड़ता। यदि किसी निवेशक ने 100,000 अमेरिकी डॉलर जमा किए हैं, तो मैच्योरिटी पर उसे मूलधन और ब्याज दोनों डॉलर में ही वापस मिलते हैं।
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अमेरिकी ट्रेजरी और यील्ड से ज्यादा रिटर्न: अमेरिका में ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड लगभग 4.25%-4.5% के आसपास चल रही थी। वहीं, भारतीय बैंकों (विशेषकर स्मॉल फाइनेंस बैंक और कुछ प्राइवेट बैंकों) ने 3 से 5 साल की अवधि के लिए डॉलर जमा पर 6.5% से 7.10% तक का सुनिश्चित रिटर्न ऑफर किया, जो वैश्विक बाजारों से कहीं अधिक था।
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भारत में 100% टैक्स फ्री रिटर्न: आयकर अधिनियम की धारा 10(15) के तहत एनआरआई जमाकर्ताओं को एफसीएनआर (बी) पर मिलने वाले ब्याज पर भारत में कोई टैक्स नहीं देना होता।
प्रमुख बैंकों द्वारा दी गई आकर्षक ब्याज दरें
आरबीआई के कदम के बाद सरकारी से लेकर निजी और स्मॉल फाइनेंस बैंकों ने दरों में भारी इजाफा किया:
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स्मॉल फाइनेंस बैंक: एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक (AU Small Finance Bank) ने 3 से 4 साल की डॉलर एफडी पर 7.10% तक का सर्वाधिक रिटर्न पेश किया।
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निजी क्षेत्र के बैंक: आईसीआईसीआई बैंक और यस बैंक ने 6.50% से 6.60% तक की दरें ऑफर कीं, जबकि एचडीएफसी बैंक और कोटक महिंद्रा बैंक ने 6% से 6.15% का ब्याज दिया।
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सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक: स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) और पंजाब नेशनल बैंक (PNB) ने 3 से 5 साल की जमाओं पर 6% से 6.10% का ब्याज तय किया।
2013 के 'टैपर टैंट्रम' जैसा मास्टरस्ट्रोक
वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, रिजर्व बैंक ने यह कदम 2013 के अपने ऐतिहासिक मॉडल की तर्ज पर उठाया। 2013 में तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन ने जब रुपये की गिरावट थामने के लिए एफसीएनआर स्वैप विंडो खोली थी, तब देश में करीब $34 बिलियन का इनफ्लो आया था। ठीक उसी तरह, इस बार भी विदेशी मुद्रा की आवक ने भारतीय रुपये को अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता के बीच मजबूत सहारा दिया है और विदेशी मुद्रा भंडार को ऐतिहासिक स्तर पर पहुंचाने में मदद की है।