Crude Oil Price Today: पश्चिम एशिया में तनाव से कच्चे तेल में लगातार छठे दिन तेजी, $90 के करीब पहुंचा ब्रेंट क्रूड; भारत पर बढ़ेगा दबाव
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में उफान थमने का नाम नहीं ले रहा है। मध्य पूर्व (पश्चिम एशिया) में अमेरिका और ईरान के बीच गहराते कूटनीतिक व सैन्य तनाव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने को लेकर जारी अनिश्चितता के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के दामों में लगातार छठे कारोबारी दिन तेजी दर्ज की गई है। अंतर्राष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) वायदा की कीमतें एक बार फिर उछलकर $89 - $90 प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गई हैं। तेल की कीमतों में आई इस हालिया तेजी ने भारत सहित दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के लिए मुद्रास्फीति (Inflation) की चिंता बढ़ा दी है।
क्या हैं कच्चे तेल में आई इस तेजी के मुख्य कारण?
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होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बरकरार गतिरोध:
दुनिया के कुल कच्चे तेल की आपूर्ति का लगभग 20% हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। ईरान द्वारा अमेरिका पर रखी गई कड़ी शर्तों (नौसैनिक नाकाबंदी समाप्त करने और वित्तीय प्रतिबंध हटाने) के चलते इस रणनीतिक समुद्री मार्ग के फिर से सुरक्षित खुलने पर सस्पेंस बना हुआ है।
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अमेरिका-ईरान वार्ता में विफलता की आशंका:
राजनयिक वार्ताओं में प्रगति की शुरुआती उम्मीदों के बावजूद दोनों देशों के बीच बयानों का दौर उग्र हुआ है। वार्ता की राह में आए गतिरोध के बाद बाजार निवेशकों को डर है कि यदि शांति वार्ता विफल होती है तो आपूर्ति में भारी कटौती आ सकती है।
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वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव:
लीबिया के तेल प्रतिष्ठानों पर हुए ड्रोन हमलों और लाल सागर/बाब अल-मंदेब क्षेत्र में मालवाहक जहाजों के लंबा रूट तय करने की वजह से शिपिंग लागत और बीमा प्रीमियम में बढ़ोतरी हुई है, जिसने कच्चे तेल की कीमतों को मजबूत सपोर्ट दिया है।
भारतीय अर्थव्यवस्था और पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर असर
भारत अपनी कच्चे तेल की कुल आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात (Import) करता है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल का $90 प्रति बैरल के पास पहुंचना देश के आर्थिक सेहत के लिए सही संकेत नहीं है:
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करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD): कच्चे तेल के दाम बढ़ने से भारत का आयात बिल (Import Bill) बढ़ेगा, जिससे चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है और भारतीय रुपये पर दबाव आ सकता है।
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महंगाई (Inflation): कच्चे तेल और फ्रेट चार्ज महंगा होने से लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ती है, जिससे रोजमर्रा की चीजों और ट्रांसपोर्टेशन के दामों में तेजी आ सकती है।
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ईंधन की दरें: यदि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लंबे समय तक $90 के ऊपर बनी रहती हैं, तो घरेलू तेल विपणन कंपनियों (OMCs) पर भी दबाव बढ़ेगा, हालांकि वर्तमान में सरकार स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए है।
ट्रेड एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब तक मध्य पूर्व संकट में कोई स्थायी युद्धविराम या होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की बेरोक-टोक आवाजाही शुरू नहीं होती, तब तक तेल बाजार में यह अनिश्चितता और तेजी बनी रह सकती है।