बिना सिम और टावर होगी कॉलिंग: TRAI की D2D सर्विस पर बड़ी सिफारिश
भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने देश के टेलीकॉम सेक्टर में ऐतिहासिक बदलाव की नींव रख दी है। ट्राई ने केंद्र सरकार को अपनी बहुप्रतीक्षित सिफारिशें सौंपते हुए डायरेक्ट-टू-डिवाइस (D2D) कनेक्टिविटी और सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क के लिए एक स्वतंत्र ऑथराइजेशन फ्रेमवर्क बनाने का प्रस्ताव दिया है। इस नई व्यवस्था के तहत स्मार्टफोन यूजर्स को वॉयस कॉलिंग, मैसेजिंग और इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए पारंपरिक जमीनी मोबाइल टावरों या फिजिकल नेटवर्क कवरेज पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। यह तकनीक अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट्स को सीधे आपके हाथ में मौजूद सामान्य स्मार्टफोन से जोड़ देगी। यदि सरकार इन सिफारिशों को अंतिम मंजूरी दे देती है, तो भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा जहां आम नागरिक अंतरिक्ष आधारित डायरेक्ट कम्युनिकेशन का सीधा लाभ उठा सकेंगे।
क्या है डायरेक्ट-टू-डिवाइस (D2D) तकनीक और कैसे करेगा यह काम?
वर्तमान मोबाइल नेटवर्क व्यवस्था में आपके फोन का सिग्नल पास के सेल्युलर मोबाइल टावर तक जाता है और वहां से कोर नेटवर्क के जरिए दूसरे यूजर तक पहुंचता है। जब आप घने जंगलों, गहरे समुद्र, ऊंचे पहाड़ों या दूरदराज के सीमावर्ती इलाकों में होते हैं, तो टावर न होने के कारण 'नो सर्विस' या 'कॉल ड्रॉप' की समस्या आती है। ट्राई द्वारा सुझाई गई डायरेक्ट-टू-डिवाइस (D2D) तकनीक नॉन-टेरेस्ट्रियल नेटवर्क (NTN) पर काम करती है। इसमें पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit - LEO) या मध्यम कक्षा में चक्कर लगा रहे सैटेलाइट्स अंतरिक्ष में तैरते हुए मोबाइल टावर की तरह काम करते हैं। आपका फोन बिना किसी विशेष भारी-भरकम एंटीना के सीधे इन उपग्रहों से रेडियो सिग्नल पकड़ेगा, जिससे पृथ्वी के किसी भी दुर्गम कोने में शून्य नेटवर्क कवरेज होने पर भी तुरंत इमरजेंसी कॉल, सामान्य वॉयस कॉल और डेटा ट्रांसमिशन संभव हो सकेगा।
'सैटेलाइट नेटवर्क एज ए सर्विस': जियो, एयरटेल और वीआई को कैसे होगा फायदा?
ट्राई ने अपनी सिफारिशों में टेलीकम्युनिकेशंस एक्ट, 2023 के तहत 'सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क एज ए सर्विस' (SCNaaS) मॉडल का प्रस्ताव रखा है। इस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि रिलायंस जियो, भारती एयरटेल या वोडाफोन-आइडिया (Vi) जैसी घरेलू टेलीकॉम कंपनियों को अपने खुद के महंगे सैटेलाइट्स अंतरिक्ष में भेजने की जरूरत नहीं होगी। वे स्टारलिंक (Starlink), वनवेब (Eutelsat OneWeb) या अन्य ग्लोबल सैटेलाइट नेटवर्क ऑपरेटर्स के साथ साझेदारी करके अपने मौजूदा ग्राहकों को यह सुविधा दे सकेंगी। इसके लिए नियामक ने एक अलग ऑथराइजेशन श्रेणी की सिफारिश की है, जो पूरे भारत के लिए 20 साल की अवधि तक वैध रहेगी और जिसे आगे 20 साल के लिए बढ़ाया जा सकेगा। इस सहयोगात्मक ढांचे से कंपनियों का इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च घटेगा और उपभोक्ताओं को किफायती दरों पर निर्बाध सैटेलाइट कनेक्टिविटी मिल सकेगी।
आपदा और ब्लैकआउट में बनेगा जीवन रक्षक: जानें भारत के लिए इसके मायने
अक्सर चक्रवाती तूफान, बाढ़, भूकंप या भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान बिजली कटने से जमीनी मोबाइल टावर ठप पड़ जाते हैं, जिससे राहत और बचाव कार्यों में भारी बाधा आती है। D2D सैटेलाइट तकनीक ऐसी किसी भी जमीनी तबाही से पूरी तरह अप्रभावित रहती है। आपात स्थिति में फंसे नागरिक बिना किसी लोकल नेटवर्क के भी तुरंत एनडीआरएफ, पुलिस या परिजनों को एसओएस (SOS) संदेश और अपनी लाइव लोकेशन भेज सकेंगे। इसके साथ ही ट्राई ने यह भी सुझाव दिया है कि केंद्र सरकार भविष्य में भारत में बिकने वाले नए 5G और आगामी 6G स्मार्टफोन्स में आवश्यक मोबाइल सैटेलाइट सर्विस (MSS) बैंड्स और जरूरी चिपसेट मॉड्यूल शामिल करने के लिए हैंडसेट निर्माताओं को प्रोत्साहित करे। यह कदम देश के डिजिटल विभाजन को समाप्त कर हर नागरिक को 24×7 कनेक्टेड रखने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।