वैश्विक ब्रोकरेज फर्म जेपी मॉर्गन का बड़ा अलर्ट, 2027 में आ सकता है खाद्य महंगाई का नया तूफान

वैश्विक ब्रोकरेज फर्म जेपी मॉर्गन का बड़ा अलर्ट, 2027 में आ सकता है खाद्य महंगाई का नया तूफान

दुनियाभर के केंद्रीय बैंक और आम नागरिक जब महंगाई की मार से राहत मिलने की उम्मीद लगा रहे हैं, ठीक उसी समय दुनिया के सबसे बड़े निवेश बैंकों में से एक जेपी मॉर्गन (JPMorgan Chase & Co.) ने एक बेहद चिंताजनक चेतावनी जारी की है। जेपी मॉर्गन की नवीनतम वैश्विक शोध रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2027 की पहली छमाही में वैश्विक खाद्य मुद्रास्फीति (Global Food Inflation) में अप्रत्याशित उछाल आ सकता है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि खाद्य महंगाई दर 2026 की पहली छमाही के 2.8 प्रतिशत से बढ़कर 2027 में लगभग 5.0 प्रतिशत के स्तर तक पहुंच सकती है। इस भारी तेजी के पीछे किसी एक कारण को नहीं, बल्कि मौसम के चरम रूप यानी 'सुपर अल नीनो' और मिडिल ईस्ट (खाड़ी देशों) के भू-राजनीतिक संकट के एक साथ टकराने को मुख्य जिम्मेदार ठहराया गया है।

क्या है जेपी मॉर्गन का '5-W' संकट फॉर्मूला?

जेपी मॉर्गन की वरिष्ठ वैश्विक अर्थशास्त्री नोरा सजेंटिवानी (Nora Szentivanyi) के नेतृत्व में तैयार की गई इस रिपोर्ट में वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर मंडराने वाले खतरे को '5-W' के रूप में परिभाषित किया गया है। इन पांच प्रमुख कारकों में शामिल हैं:

  • War (युद्ध व भू-राजनीतिक तनाव): पश्चिम एशिया में बढ़ता संघर्ष और समुद्री मार्गों में रुकावट।

  • Weather (चरम मौसम): प्रशांत महासागर में तेजी से मजबूत होता सुपर अल नीनो।

  • Warehousing (भंडारण की चुनौतियां): प्रमुख अनाजों के लॉजिस्टिक्स और भंडारण लागत में वृद्धि।

  • Water (जल संकट): प्रमुख कृषि क्षेत्रों में मानसूनी अनिश्चितता और भूजल का गिरता स्तर।

  • Waste (सप्लाई चेन में बर्बादी): परिवहन अवरोधों के कारण कृषि उपजों का नष्ट होना।

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि यह संकट दुनिया में अचानक भोजन खत्म होने का नहीं है, बल्कि यह कृषि लागत में भारी बढ़ोतरी और प्रतिकूल मौसम के कारण फसल उत्पादन में आने वाली गिरावट का एक घातक तालमेल है।

सुपर अल नीनो का खतरा: 81% संभावना एक ऐतिहासिक मौसमी आपदा की

जलवायु वैज्ञानिकों और वैश्विक मौसम एजेंसियों के डेटा का हवाला देते हुए जेपी मॉर्गन ने बताया है कि वर्ष 2026 के अंत तक मौजूदा अल नीनो चक्र के 'वेरी स्ट्रॉन्ग' या 'सुपर अल नीनो' (Super El Niño) में तब्दील होने की संभावना 81 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इसके साथ ही, 97 प्रतिशत संभावना इस बात की है कि यह मौसमी परिस्थितियां पूरे वर्ष 2027 तक खिंच सकती हैं।

अल नीनो की वजह से प्रशांत महासागर की सतह का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है, जिससे दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, ऑस्ट्रेलिया और लैटिन अमेरिका में भीषण सूखे, अनियमित मॉनसून और अत्यधिक गर्मी का चक्र शुरू होता है। ऐतिहासिक रूप से जब भी सुपर अल नीनो सक्रिय हुआ है, उष्णकटिबंधीय (Tropical) कृषि क्षेत्रों में फसलों के कुल उत्पादन में औसतन 3.5 प्रतिशत तक की सीधी गिरावट दर्ज की गई है। जेपी मॉर्गन का अनुमान है कि अकेले सुपर अल नीनो ही अपने चरम प्रभाव के दौरान वैश्विक खाद्य महंगाई में 0.7 प्रतिशत अंकों की सीधी बढ़ोतरी कर सकता है।

मिडिल ईस्ट युद्ध और होर्मुज संकट से यूरिया-खाद की भारी किल्लत

खाद्य संकट का दूसरा सबसे गंभीर पहलू ऊर्जा और उर्वरक (Fertilizer) बाजार से जुड़ा हुआ है। कृषि उत्पादन पूरी तरह से रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर नाइट्रोजन-आधारित यूरिया और अमोनिया पर निर्भर करता है, जिसके निर्माण में प्राकृतिक गैस (Natural Gas) मुख्य कच्चा माल है।

वैश्विक उर्वरक आपूर्ति में मध्य-पूर्व की हिस्सेदारी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। दुनिया के कुल यूरिया निर्यात का लगभग 42 प्रतिशत और अमोनिया निर्यात का 27 प्रतिशत हिस्सा अकेले खाड़ी क्षेत्र से आता है। कतर और ईरान जैसे देश वैश्विक यूरिया निर्यात में क्रमशः 9.3% और 8.4% की बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जारी सैन्य तनाव और ड्रोन व मिसाइल हमलों के जोखिम के कारण जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो रही है। यदि उर्वरक कारखानों को गैस आपूर्ति बाधित होती है या शिपिंग रूट्स बंद होते हैं, तो वैश्विक स्तर पर यूरिया की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। चूंकि फसलों की बुआई और प्रारंभिक विकास के दौरान यूरिया का सही समय पर इस्तेमाल अनिवार्य होता है, इसलिए समय पर खाद न मिलने से फसल की पैदावार सीधे तौर पर 15 से 25 प्रतिशत तक गिर सकती है।

भारत और उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर सबसे बड़ा खतरा क्यों?

जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि इस दोहरी मार का सबसे गंभीर प्रभाव अमेरिका या यूरोप जैसे विकसित देशों के बजाय भारत, इंडोनेशिया, ब्राजील और कोलंबिया जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं (Emerging Markets) पर पड़ेगा।

इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • खर्च में खाने-पीने की बड़ी हिस्सेदारी: विकसित देशों में जहां एक औसत परिवार अपनी कुल आय का मात्र 10 से 15 प्रतिशत हिस्सा भोजन पर खर्च करता है, वहीं भारत जैसे विकासशील देशों में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में खाद्य वस्तुओं का भारांक (Weightage) लगभग 45 से 50 प्रतिशत होता है। खाद्य वस्तुओं के दाम थोड़े भी बढ़ते ही आम परिवार का पूरा मासिक बजट पटरी से उतर जाता है।

  • मौसम पर निर्भर कृषि: भारत में 50 प्रतिशत से अधिक कृषि क्षेत्र आज भी सिंचाई के लिए सीधे तौर पर मानसूनी बारिश पर निर्भर है। यदि अल नीनो के कारण दक्षिण-पश्चिम मॉनसून कमजोर पड़ता है, तो धान, दलहन (दालें), तिलहन और गन्ने की बुआई और उत्पादन पर सीधा नकारात्मक असर पड़ेगा।

  • इंपोर्टेड महंगाई (Imported Inflation): भारत खाने के तेलों (पाम ऑयल, सोयाबीन तेल) और उर्वरक के कच्चे माल का एक बड़ा आयातक है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल, डीजल और खाद्य तेल के दाम बढ़ने से भारत में घरेलू कीमतें तेजी से बढ़ेंगी।

आम आदमी की रसोई पर क्या पड़ेगा असर?

यदि जेपी मॉर्गन का यह पूर्वानुमान सही साबित होता है, तो वर्ष 2027 में आम उपभोक्ताओं को अपने दैनिक राशन और खान-पान के खर्च में भारी इजाफा देखना पड़ सकता है:

  • दालें और चावल: अल नीनो के कारण पैदावार घटने से अरहर (तुअर), उड़द, मूंग और गैर-बासमती चावल के खुदरा भाव में 15 से 20 प्रतिशत तक की तेजी आ सकती है।

  • सब्जियां और फल: अत्यधिक गर्मी और असमय बारिश की वजह से टमाटर, प्याज, आलू और हरी सब्जियों की कीमतों में बार-बार तेज उछाल देखने को मिलेगा।

  • कुकिंग ऑयल: मलेशिया और इंडोनेशिया में सूखे के कारण पाम ऑयल उत्पादन घटने से सभी ब्रांडेड खाद्य तेलों के दाम बढ़ेंगे।

  • दूध और पोल्ट्री उत्पाद: चारे और पशु आहार (मक्का, सोयाबीन) की लागत बढ़ने से दूध, घी, पनीर और पोल्ट्री उत्पादों के भाव में भी वृद्धि तय मानी जा रही है।

क्या हैं राहत की उम्मीदें और सरकारों की तैयारी?

हालांकि चेतावनी गंभीर है, लेकिन जेपी मॉर्गन ने रिपोर्ट में एक सकारात्मक पहलू का भी उल्लेख किया है। वर्तमान में वैश्विक स्तर पर अनाजों का बफर स्टॉक पिछले संकटों की तुलना में काफी मजबूत स्थिति में है। भारत के पास भी भारतीय खाद्य निगम (FCI) के गोदामों में गेहूं और चावल का पर्याप्त रणनीतिक भंडार मौजूद है, जो किसी भी आकस्मिक झटके को शुरुआती महीनों में सोखने में सक्षम है।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस संभावित खतरे से निपटने के लिए भारत सरकार को अभी से खरीफ और रबी फसलों के लिए उर्वरक आयात के वैकल्पिक लॉन्ग-टर्म सौदे करने होंगे, पीएम कृषि सिंचाई योजना और माइक्रो-इरिगेशन को बढ़ावा देना होगा और खाद्य वस्तुओं की जमाखोरी रोकने के लिए सख्त सप्लाई-चेन मॉनिटरिंग सिस्टम लागू करना होगा ताकि 2027 में आम जनता को कमरतोड़ महंगाई से सुरक्षित रखा जा सके।

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