बच्चों को वसीयत में दें प्रॉपर्टी या जीवनकाल में करें गिफ्ट? एक्सपर्ट से जानिए किसमें है ज्यादा फायदा और कम जोखिम
जीवन भर की गाढ़ी कमाई से बनाई गई अचल संपत्ति (मकान, फ्लैट, जमीन आदि) को अपने बच्चों या उत्तराधिकारियों को सौंपने का निर्णय हर माता-पिता के लिए बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण होता है। अक्सर लोग इस असमंजस में रहते हैं कि प्रॉपर्टी को जीवनकाल में ही 'गिफ्ट डीड' (Gift Deed) के जरिए बच्चों के नाम ट्रांसफर कर देना चाहिए या फिर 'वसीयत' (Will) के माध्यम से छोड़ना सुरक्षित विकल्प है। कानूनी और वित्तीय सलाहकारों के अनुसार, इन दोनों माध्यमों की अपनी-अपनी कानूनी प्रक्रियाएं, खर्च, टैक्स देनदारियां और जोखिम हैं। सही निर्णय लेने से न केवल भविष्य के पारिवारिक विवादों से बचा जा सकता है, बल्कि भारी-भरकम टैक्स और अदालती खर्चों की भी बचत की जा सकती है।
वसीयत (Will) के जरिए प्रॉपर्टी ट्रांसफर: नियंत्रण और सुरक्षा का सबसे मजबूत विकल्प
वसीयत एक कानूनी दस्तावेज है, जिसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति यह तय करता है कि उसके निधन के बाद उसकी स्व-अर्जित संपत्ति का बंटवारा किसके बीच और किस अनुपात में होगा। वसीयत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह व्यक्ति के जीवनकाल में प्रभावी नहीं होती, बल्कि उसके निधन के तुरंत बाद लागू होती है। इसका सीधा फायदा यह है कि जब तक व्यक्ति जीवित रहता है, संपत्ति का पूर्ण मालिकाना हक और नियंत्रण उसी के पास रहता है। वह जब चाहे अपनी वसीयत में बदलाव कर सकता है या उसे पूरी तरह रद्द कर सकता है।
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लागत और औपचारिकता: वसीयत बनाने के लिए किसी भारी-भरकम स्टांप ड्यूटी की आवश्यकता नहीं होती। इसे सामान्य कागज पर दो गवाहों की मौजूदगी में तैयार किया जा सकता है। हालांकि, भविष्य में किसी विवाद से बचने के लिए इसे उप-पंजीयक (Sub-Registrar) कार्यालय में पंजीकृत करवाना सबसे सुरक्षित माना जाता है।
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टैक्स लाभ: वसीयत या विरासत के जरिए मिलने वाली किसी भी संपत्ति पर उत्तराधिकारी को कोई आयकर या गिफ्ट टैक्स नहीं देना पड़ता।
गिफ्ट डीड (Gift Deed) के जरिए प्रॉपर्टी ट्रांसफर: तत्काल स्वामित्व लेकिन बड़ा जोखिम
गिफ्ट डीड के तहत संपत्ति का मालिकाना हक जीवित रहते हुए ही पूरी तरह से बच्चों के नाम स्थानांतरित कर दिया जाता है। इसके निष्पादन और सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में पंजीकरण होते ही प्रॉपर्टी पर माता-पिता का कानूनी अधिकार पूरी तरह समाप्त हो जाता है और बच्चे उसके नए मालिक बन जाते हैं।
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लागत और स्टांप शुल्क: गिफ्ट डीड को पंजीकृत कराना कानूनन अनिवार्य होता है। इसके लिए राज्य सरकार के नियमों के अनुसार संपत्ति के सर्किल रेट/बाजार मूल्य पर स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन चार्ज देना पड़ता है। यद्यपि कई राज्यों में रक्त संबंधों (माता-पिता से बच्चों) में स्टांप शुल्क पर कुछ छूट मिलती है, फिर भी यह वसीयत की तुलना में काफी महंगा सौदा है।
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टैक्स प्रावधान: आयकर अधिनियम की धारा 56(2) के तहत करीबी रिश्तेदारों (जैसे माता-पिता से बच्चों) को दिए गए गिफ्ट पर कोई इनकम टैक्स नहीं लगता।
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जोखिम: गिफ्ट डीड निष्पादित होने के बाद उसे आसानी से वापस नहीं लिया जा सकता। यदि बाद में पारिवारिक संबंधों में खटास आती है, तो माता-पिता अपने ही घर में बेबस हो सकते हैं।
वसीयत बनाम गिफ्ट डीड: कौन सा विकल्प आपके लिए है बेहतर?
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यदि वित्तीय और भावनात्मक सुरक्षा प्राथमिकता है: एक्सपर्ट्स का स्पष्ट मत है कि माता-पिता को जीवनकाल में अपनी प्राथमिक आवासीय संपत्ति का मालिकाना हक कभी नहीं छोड़ना चाहिए। इसके लिए 'वसीयत' सबसे सुरक्षित माध्यम है, ताकि बुढ़ापे में किसी पर निर्भर न रहना पड़े।
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यदि भविष्य के विवादों को तत्काल खत्म करना हो: यदि आपके पास एक से अधिक संपत्तियां हैं और आप अपने जीवनकाल में ही बच्चों के बीच संपत्ति का स्पष्ट बंटवारा कर देना चाहते हैं ताकि बाद में प्रोबेट (Probate) या मुकदमेबाजी की नौबत न आए, तब अतिरिक्त प्रॉपर्टी के लिए 'गिफ्ट डीड' चुनी जा सकती है।
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सीनियर सिटीजन प्रोटेक्शन क्लॉज: यदि जीवनकाल में गिफ्ट डीड करना अनिवार्य हो, तो वरिष्ठ नागरिक अधिनियम 2007 (Senior Citizens Act) के तहत गिफ्ट डीड में यह विशेष शर्त (कंडीशनल गिफ्ट डीड) अवश्य जोड़नी चाहिए कि बच्चे आजीवन माता-पिता की सेवा और भरण-पोषण करेंगे, ऐसा न करने पर गिफ्ट डीड रद्द मानी जाएगी।