पारले-जी के बहाने उद्योगपति हर्ष गोयनका ने आखिर किस पर साधा बड़ा निशाना

पारले-जी के बहाने उद्योगपति हर्ष गोयनका ने आखिर किस पर साधा बड़ा निशाना

सोशल मीडिया की रंगीन और तेज-तर्रार दुनिया में जब भी देश के जाने-माने दिग्गज उद्योगपति और आरपीजी (RPG) ग्रुप के चेयरमैन हर्ष गोयनका (Harsh Goenka) कोई पोस्ट साझा करते हैं, तो वह इंटरनेट पर मिनटों में वायरल हो जाती है। अपनी अनूठी शैली, चुटीले व्यंग्य और बेबाक बयानों के लिए पहचाने जाने والے हर्ष गोयनका ने इस बार देश के सबसे लोकप्रिय और हर घर में खाए जाने वाले 'पारले-जी' (Parle-G) बिस्कुट के जरिए एक ऐसा तीखा और गहरा तंज कसा है, जिसे पढ़कर हर कोई सोचने पर मजबूर हो गया है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर एक ऐसी तुलनात्मक बात लिखी है जिसने कॉरपोरेट जगत से लेकर राजनीतिक गलियारों और आम जनता के बीच एक नई बहस छेड़ दी है। हर्ष गोयनका ने अपने इस ताजा पोस्ट में लिखा है कि आजकल महंगाई के इस दौर में जिस तरह से एक तरफ कंपनियों ने पैकेट के दाम वही रखकर उसके अंदर बिस्कुटों की संख्या कम कर दी है, ठीक उसी तरह से आधुनिक जीवन में काम के दिनों और प्रोडक्टिविटी के पैमानों में भी अजीबोगरीब फेरबदल देखने को मिल रहा है।

पारले-जी और श्रिंकफ्लेशन का खेल: आखिर क्या है इस मशहूर उद्योगपति के तंज के पीछे का असली गणित?

अर्थशास्त्र और बाजार की भाषा में इसे 'श्रिंकफ्लेशन' (Shrinkflation) कहा जाता है, जहां कंपनियां ग्राहकों की जेब पर सीधे बोझ डाले बिना उत्पाद का आकार या मात्रा घटा देती हैं ताकि महंगाई के दौर में भी मुनाफा बरकरार रखा जा सके। भारत के सबसे भरोसेमंद और गरीबों के बिस्कुट के रूप में मशहूर पारले-जी के पैकेट का जिक्र करते हुए हर्ष गोयनका ने जिस चतुराई से आज के कॉर्पोरेट सिस्टम और आधुनिक कामकाजी संस्कृति को जोड़ा है, उसने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। उनका यह तंज केवल बिस्कुट तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए उन्होंने आधुनिक कंपनियों, कार्य संस्कृति, वर्क-लाइफ बैलेंस और लगातार बदलते हुए व्यावसायिक मूल्यों पर भी एक करारा कटाक्ष किया है। उन्होंने यह इशारा करने का प्रयास किया है कि कैसे आज के दौर में चीजें ऊपर से तो वैसी ही दिखाई देती हैं, लेकिन अंदर से उनकी मात्रा, गुणवत्ता और मानवीय मूल्य धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं।

कॉर्पोरेट वर्ल्ड से लेकर आम जिंदगी तक, हर्ष गोयनका के इस वायरल पोस्ट ने छेड़ी नई बहस

जैसे ही हर्ष गोयनका का यह ट्वीट या पोस्ट इंटरनेट पर सामने आया, वैसे ही उस पर लाइक्स, कमेंट्स और शेयर की बाढ़ आ गई। सोशल मीडिया यूजर्स ने इस पर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दीं। एक तरफ जहां तमाम युवाओं और कॉर्पोरेट कर्मचारियों ने इसे आज के दफ्तरों के कड़े माहौल और काम के बढ़ते दबाव से जोड़कर देखा, वहीं दूसरी तरफ अर्थशास्त्रियों ने इसे महंगाई के दौर में कंपनियों की मजबूरी और व्यावसायिक रणनीतियों का एक सटीक उदाहरण बताया। लोगों का कहना है कि हर्ष गोयनका हमेशा से ही समाज और बाजार की कड़वी सच्चाइयों को बहुत ही सरल, हास्यप्रद और व्यंग्यात्मक तरीके से सामने रखने के लिए जाने जाते हैं, और उनका यह पारले-जी वाला उदाहरण इस बात का एक बेहतरीन नमूना है कि कैसे एक आम उपभोक्ता की जिंदगी इन बदलावों से प्रभावित होती है।

महंगाई और बदलते दौर की यह सच्चाई, क्या सचमुच कम हो रहा है हमारी खुशियों और संसाधनों का पैमाना?

हर्ष गोयनका के इस बयान ने हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आधुनिक उपभोक्तावादी समाज में हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। चाहे वह खाने-पीने की वस्तुएं हों, काम करने के घंटे हों या फिर इंसानी रिश्तों में मिलने वाला समय, हर जगह 'कम होने' या 'सिकुड़ने' की यह प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। उद्योगपति का यह संदेश भले ही एक हल्के-फुल्के मजाक या तंज के रूप में सामने आया हो, लेकिन इसके निहितार्थ बहुत गहरे हैं। यह उन तमाम व्यवस्थाओं पर एक खुला सवाल है जो विकास और मुनाफे के नाम पर आम आदमी के हिस्से की छोटी-छोटी खुशियों को धीरे-धीरे कम करती जा रही हैं। बहरहाल, पारले-जी के बहाने हर्ष गोयनका द्वारा कसा गया यह तंज इस समय देश भर में चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग इसकी अलग-अलग तरीकों से व्याख्या कर रहे हैं।