सरकार ने बदले नियम, जानिए क्या आपकी मौजूदा कार में डलेगा 100% एथेनॉल और जेब पर कितना होगा असर?

सरकार ने बदले नियम, जानिए क्या आपकी मौजूदा कार में डलेगा 100% एथेनॉल और जेब पर कितना होगा असर?

देशभर के फ्यूल स्टेशनों और ऑटोमोबाइल सेक्टर में इन दिनों एक बड़े बदलाव की हलचल तेज हो गई है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने केंद्रीय मोटर वाहन नियमों (CMVR) में संशोधन करते हुए E100 यानी 100 फीसदी एथेनॉल ईंधन के इस्तेमाल को लेकर नई अधिसूचना जारी कर दी है। अब तक भारतीय सड़कों पर 10 से 20 फीसदी एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E10 और E20) ही इस्तेमाल किया जा रहा था, लेकिन अब सरकार ने पूरी तरह से एथेनॉल से चलने वाली गाड़ियों के लिए तकनीकी और सुरक्षा मानकों का रास्ता साफ कर दिया है। इसका सीधा मतलब यह है कि देश में अब ऐसी गाड़ियों का उत्पादन और बिक्री कानूनी रूप से मान्य हो गई है जो पेट्रोल की एक बूंद के बिना केवल गन्ने, मक्के और कृषि अपशिष्ट से बने शुद्ध बायो-एथेनॉल से दौड़ सकेंगी।

क्या आपकी पुरानी या मौजूदा पेट्रोल कार में डल सकता है 100% एथेनॉल

यह सवाल हर उस वाहन मालिक के जेहन में उठ रहा है जिसके पास सामान्य पेट्रोल कार या बाइक है। इसका सीधा और तकनीकी उत्तर है—बिल्कुल नहीं। आपकी मौजूदा कार का फ्यूल इंजेक्शन सिस्टम, रबर होसेस, गैस्केट और इंजन ट्यूनिंग E10 या अधिकतम E20 (20% एथेनॉल) के अनुकूल ही तैयार किए गए हैं। एथेनॉल की रासायनिक संरचना पेट्रोल से भिन्न होती है और इसमें नमी सोखने की प्रवृत्ति होती है। यदि किसी सामान्य पेट्रोल इंजन में शुद्ध E100 भर दिया जाए, तो इंजन के संवेदनशील पुर्जों में जंग (corrosion) लगने, रबर पाइप गलने और कंबशन चेंबर के तापमान में असंतुलन पैदा होने का खतरा बन जाता है। सरकार के नए नियमों का उद्देश्य मौजूदा सामान्य कारों को जबरन E100 पर चलाना नहीं है, बल्कि बाजार में विशेष 'फ्लेक्स-फ्यूल' (Flex-Fuel Vehicles - FFV) और पूर्ण एथेनॉल अनुकूलित वाहनों को बढ़ावा देना है।

फ्लेक्स फ्यूल इंजन क्या होते हैं और यह आम इंजन से कैसे अलग काम करते हैं

E100 पर चलने वाली गाड़ियों में फ्लेक्स-फ्यूल इंजन तकनीक का इस्तेमाल होता है। यह एक ऐसा स्मार्ट पावरट्रेन होता है जिसके फ्यूल सिस्टम में खास 'एथेनॉल सेंसर' लगे होते हैं। यह सेंसर फ्यूल टैंक में मौजूद ईंधन को तुरंत स्कैन करता है और यह पहचान लेता है कि टैंक में पेट्रोल की मात्रा कितनी है और एथेनॉल कितना है। इसके बाद कार का इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट (ECU) स्वतः ही एयर-फ्यूल रेशियो और स्पार्क टाइमिंग को एडजस्ट कर देता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि फ्लेक्स-फ्यूल कार में आप चाहें तो 100% पेट्रोल डालें, 50% पेट्रोल और 50% एथेनॉल का मिश्रण डालें, या फिर सीधे 100% शुद्ध E100 भरवाएं—इंजन बिना किसी झटके के सुचारू रूप से काम करेगा। ब्राजील और अमेरिका जैसे देशों में यह तकनीक दशकों से सफलतापूर्वक चल रही है, जहां कार चालक पेट्रोल और एथेनॉल की कीमतों के आधार पर तय करते हैं कि आज उन्हें कौन सा ईंधन डलवाना है।

माइलेज, परफॉर्मेंस और गाड़ी चलाने के खर्च पर कितना असर पड़ेगा

ईंधन के मामले में हर भारतीय उपभोक्ता के लिए 'कितना देती है' सबसे अहम सवाल होता है। ऊर्जा घनत्व (Energy Density) के हिसाब से एथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में लगभग 30 से 33 प्रतिशत कम ऊर्जा होती है। इसका सीधा असर यह होता है कि E100 पर चलने वाली गाड़ी का माइलेज पेट्रोल के मुकाबले करीब 15 से 25 फीसदी तक घट सकता है। हालांकि, इसकी भरपाई एथेनॉल की कम कीमत से हो जाती है। एथेनॉल का उत्पादन घरेलू स्तर पर कृषि उत्पादों से होता है, इसलिए इसकी रिफाइनिंग और रिटेल लागत अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) के मुकाबले काफी कम बैठती है। यदि सरकार और तेल कंपनियां E100 की पंप कीमत को पेट्रोल से 30 से 40 रुपये प्रति लीटर सस्ता रखती हैं, तो माइलेज में मामूली कमी के बावजूद प्रति किलोमीटर चलने का खर्च पेट्रोल की तुलना में काफी सस्ता पड़ेगा। साथ ही, एथेनॉल का ऑक्टेन नंबर 100 से ऊपर होता है, जिससे इंजन को बेहतर पिकअप और उच्च संपीड़न अनुपात (compression ratio) मिलता है।

देश की अर्थव्यवस्था, किसानों और पर्यावरण को E100 से क्या लाभ होगा

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करता है, जिससे भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा बाहर जाती है। E100 को मुख्यधारा में लाने से इस तेल आयात पर निर्भरता में भारी कटौती आएगी। इसके साथ ही, एथेनॉल उत्पादन का सीधा फायदा देश के गन्ना और अनाज उत्पादक किसानों को मिलेगा, क्योंकि उनकी उपज के अतिरिक्त स्टॉक को डिस्टिलरीज द्वारा खरीदकर ईंधन में बदला जाएगा। पर्यावरण के दृष्टिकोण से देखें तो E100 एक 'कार्बन न्यूट्रल' विकल्प माना जाता है, क्योंकि पौधे उगते समय जिस कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं, जलने पर वही गैस निकलती है। सामान्य पेट्रोल की तुलना में 100% एथेनॉल का दहन होने पर टेलपाइप से कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन का उत्सर्जन 70 से 80 प्रतिशत तक घट जाता है, जिससे बड़े शहरों में वायु गुणवत्ता सुधारने में सीधी मदद मिलेगी।

ऑटोमोबाइल कंपनियों की तैयारी और आम आदमी के लिए आगे की राह

टोयोटा, मारुति सुजुकी, हुंडई, टीवीएस और बजाज जैसी प्रमुख ऑटोमोबाइल कंपनियां पहले ही भारतीय ऑटो एक्सपो में अपने फ्लेक्स-फ्यूल प्रोटोटाइप और E100 रेडी मॉडल प्रदर्शित कर चुकी हैं। टीवीएस अपनी अपाचे आरटीआर 200 एफआई ई100 को सीमित स्तर पर पेश भी कर चुकी है। अब जब सरकार ने कानूनी मानक स्पष्ट कर दिए हैं, तो वाहन निर्माता कंपनियों के लिए इन गाड़ियों का बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उत्पादन शुरू करना आसान हो जाएगा। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) ने भी चुनिंदा शहरों के प्रमुख रिटेल आउटलेट्स पर E100 डिस्पेंसिंग यूनिट लगाने की पायलट शुरुआत कर दी है। आम कार खरीदारों के लिए संकेत साफ है—यदि आप आज सामान्य पेट्रोल कार चला रहे हैं तो चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि सामान्य पेट्रोल और E20 ईंधन उपलब्ध रहेगा, लेकिन आने वाले कुछ वर्षों में जब आप अपनी अगली कार खरीदने जाएंगे, तो शोरूम में E100 फ्लेक्स-फ्यूल कार एक बेहद किफायती और व्यावहारिक विकल्प के रूप में आपके सामने मौजूद होगी।