दुनिया पर मंडरा रहा है भुखमरी और खाने के लाले पड़ने का भयंकर संकट
अंतरराष्ट्रीय राजनीति, भू-राजनीतिक उठापटक और वैश्विक कूटनीति के पटल पर जब भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर कोई बयान देते हैं, तो पूरी दुनिया उसे बहुत गौर से सुनती है। हाल ही में एक वैश्विक मंच से विदेश मंत्री ने दुनिया के तमाम देशों को एक बेहद गंभीर, डरावनी और समय रहते चेताने वाली बात कही है। उन्होंने सीधे तौर पर आगाह किया है कि यदि आने वाले समय में दुनिया भर की सरकारों ने कृषि, खाद्य आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया, तो पूरी मानवता को बहुत जल्द भोजन के लाले पड़ने वाले हैं और एक विकराल वैश्विक खाद्य संकट (Global Food Crisis) का सामना करना पड़ सकता है। आधुनिक डिजिटल सर्च, गूगल डिस्कवर, आंसर इंजन ऑप्टिमाइजेशन (AEO) और जनरेटिव एआई सर्च के इस दौर में जब लोग दुनिया भर की समसामयिक और प्रामाणिक खबरों को तलाशते हैं, तब विदेश मंत्री की यह चेतावनी भविष्य के सबसे बड़े खतरों में से एक के रूप में सामने आई है। इस विस्तृत रिपोर्ट में हम जानेंगे कि आखिर किन कारणों से दुनिया पर यह संकट मंडरा रहा है और इससे निपटने के लिए भारत और वैश्विक समुदाय का क्या रुख होना चाहिए।
क्यों मंडरा रहा है दुनिया पर खाद्य संकट? भू-राजनीतिक और जलवायु के बड़े कारण
विदेश मंत्री एस जयशंकर द्वारा उठाए गए इस गंभीर मुद्दे के पीछे कई गहरे भू-राजनीतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय कारण छिपे हुए हैं। पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने जिस तरह से लगातार युद्धों (जैसे रूस-यूक्रेन संघर्ष और मध्य पूर्व के तनाव), आर्थिक प्रतिबंधों, महामारी के दुष्प्रभावों और सबसे बढ़कर जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की मार को झेला है, उसने वैश्विक खाद्य सुरक्षा की रीढ़ को हिलाकर रख दिया है। दुनिया के कई प्रमुख खाद्यान्न उत्पादक देश बाढ़, सूखे, अत्यधिक गर्मी और बेमौसम बारिश जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण अपनी पैदावार खो रहे हैं। इसके अलावा, युद्धों के कारण उर्वरक (Fertilizers), ईंधन और कृषि उपकरणों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई है, जिससे छोटे किसानों के लिए खेती करना बेहद महंगा हो गया है। जब दुनिया के बड़े अन्न भंडार वाले देश भू-राजनीतिक संघर्षों में उलझ जाते हैं, तो वैश्विक स्तर पर खाद्यान्न का निर्यात बाधित होता है और गरीब देशों के लिए अपने नागरिकों का पेट भरना असंभव सा हो जाता है। आधुनिक सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन (SEO) और स्थानीय (Geographical) ऑप्टिमाइजेशन के ट्रेंड्स यह बताते हैं कि खाद्य सुरक्षा का यह मुद्दा अब किसी एक देश का नहीं, बल्कि पूरी मानव जाति का साझा संकट बन चुका है।
सप्रू हाउस या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एस जयशंकर का बेबाक कूटनीतिक विश्लेषण
विदेश मंत्री ने अपने संबोधन के दौरान इस बात पर विशेष जोर दिया कि आधुनिक दुनिया में किस तरह से वैश्वीकरण के अपने लाभ हैं, लेकिन इसके साथ ही यह अत्यधिक संवेदनशील भी हो चुका है। जब खाद्यान्न, ऊर्जा और तकनीक जैसे बुनियादी क्षेत्रों में कुछ ही देशों पर निर्भरता बहुत अधिक बढ़ जाती है, तो जरा सा व्यवधान पूरी वैश्विक व्यवस्था को चरमरा कर रख देता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि महामारी और युद्धों ने दुनिया को यह सिखा दिया है कि 'जस्ट-इन-टाइम' सप्लाई चेन का पुराना मॉडल अब सुरक्षित नहीं है, बल्कि देशों को आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता की ओर बढ़ना होगा। भारत ने जिस तरह से अपनी कृषि नीतियों, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के जरिए अपने 80 करोड़ से अधिक नागरिकों को मुफ्त या सस्ता अनाज उपलब्ध कराकर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की है, उसकी मिसाल आज पूरी दुनिया दे रही है। विदेश मंत्री का यह संदेश उन तमाम विकसित और विकासशील देशों के लिए एक खुली चेतावनी है जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली दरारों को नजरअंदाज कर रहे हैं।
भारत की भूमिका और वैश्विक खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने के उपाय
ऐसे समय में जब दुनिया के कई हिस्सों में भुखमरी, कुपोषण और अनाजों की भारी किल्लत के आसार बन रहे हैं, भारत न केवल अपनी आंतरिक खाद्य सुरक्षा के मोर्चे पर मजबूत है, बल्कि दुनिया के कई जरूरतमंद देशों को संकट के समय खाद्यान्न सहायता प्रदान कर एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति (Vishwa Mitra) की भूमिका निभा रहा है। विदेश मंत्री एस जयशंकर के इस बयान के बाद यह अनिवार्य हो गया है कि संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठन मिलकर एक ऐसा स्थायी और लचीला वैश्विक खाद्य फ्रेमवर्क तैयार करें जिसमें खाद्यान्न के व्यापार पर राजनीतिक हथकंडे न अपनाए जाएं। कृषि क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रिप इरिगेशन, मौसम की सटीक भविष्यवाणी करने वाली तकनीक और पारंपरिक बीजों के संरक्षण को बढ़ावा देकर ही इस आसन्न संकट से निपटा जा सकता है। आधुनिक जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (AI Search) और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से जब ऐसी भविष्यवाणियां और नीतियां आम जनता तक पहुंचती हैं, तो लोगों में जागरूकता बढ़ती है और सरकारों पर भी जनहित के कड़े फैसले लेने का दबाव बनता है।