नितिन नवीन को बांकीपुर में जनता ने नहीं दिया वोट, तो शिक्षक वर्ग में उनकी कौन पूछेगा
बिहार की राजनीति में जुबानी जंग और राजनीतिक उठापटक का दौर हमेशा से अपने चरम पर रहता है, जहां हर एक बयान पर राज्य के सियासी समीकरण पलभर में बदलते नजर आते हैं। जन सुराज पार्टी के संस्थापक और पटना की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट से विधायक प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उसके नेतृत्व पर एक बार फिर से बेहद तीखा और करारा हमला बोला है। हाल ही में एक मीडिया बातचीत के दौरान प्रशांत किशोर ने बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष व नेताओं की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए यह तंज कसा कि जिस नेता को उनके अपने गढ़ यानी बांकीपुर की जनता ने ही सिरे से नकार दिया और वोट नहीं दिया, भला शिक्षक और आम समाज के बीच उनकी पूछ कैसे हो सकती है। प्रशांत किशोर के इस बयान के सामने आने के बाद से बिहार के राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है और सत्ताधारी दल तथा जन सुराज के बीच एक नया सियासी संग्राम छिड़ गया है। आइए इस विस्तृत रिपोर्ट में जानते हैं कि प्रशांत किशोर ने अपने इस बयान के जरिए किस प्रकार बीजेपी नेतृत्व को घेरा है और इसके पीछे की जमीनी राजनीतिक परिस्थितियां क्या हैं।
बांकीपुर के चुनावी नतीजों का हवाला देकर बीजेपी अध्यक्ष पर साधा निशाना
प्रशांत किशोर ने अपने आक्रामक तेवर दिखाते हुए कहा कि बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र को हमेशा से भाजपा का सबसे सुरक्षित और मजबूत गढ़ माना जाता रहा है, जहां पार्टी के बड़े-बड़े नेता और राष्ट्रीय स्तर के पदाधिकारी अपनी जीत का दावा करते थे। लेकिन जनता ने बदलाव का मन बनाते हुए उस मिथक को पूरी तरह से तोड़ दिया और बीजेपी के दावों की हवा निकाल दी। इसी संदर्भ में निशाना साधते हुए पीके ने कहा कि जब बांकीपुर की जागरूक जनता ने ही पार्टी अध्यक्ष और उनके उम्मीदवारों को समर्थन देने से साफ इंकार कर दिया, तो अब राज्य का शिक्षक वर्ग, युवा और आम मतदाता उनकी बातों या लुभावने वादों पर कैसे भरोसा कर सकता है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब जनता सिर्फ कागजी दावों और बड़बोले बयानों से बहकने वाली नहीं है, बल्कि वह जमीन पर किए गए कामों और अपने हकों के आधार पर फैसले ले रही है।
शिक्षकों के मुद्दों और 7वें वेतनमान को लेकर सरकार पर बोला बड़ा हमला
इस सियासी हमले के दौरान प्रशांत किशोर ने केवल राजनीतिक जुबानी जंग तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि बिहार के लाखों शिक्षकों और कर्मचारियों के ज्वलंत मुद्दों को भी जोर-शोर से उठाया। उन्होंने राज्य की एनडीए सरकार और विशेषकर उप-मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि शिक्षक समाज पिछले लंबे समय से अपने वाजिब हक, सम्मान और सातवें वेतनमान (7th Pay Commission) जैसी बुनियादी मांगों को लेकर संघर्ष कर रहा है। लेकिन सत्ता में बैठे लोगों के पास उनकी समस्याओं को सुनने या उनका समाधान करने के लिए कोई समय नहीं है। प्रशांत किशोर ने चुनौती देते हुए कहा कि यदि शिक्षक समाज और स्नातक वर्ग अपने हक की लड़ाई के लिए एकजुट हो जाए, तो बड़े-बड़े सियासी दिग्गजों का अहंकार धराशायी हो जाता है, जिसकी शुरुआत बांकीपुर की ऐतिहासिक जीत से हो चुकी है।
राजनीतिक गलियारों में गूंज रहा है प्रशांत किशोर का यह बयान, एनडीए की बढ़ी टेंशन
प्रशांत किशोर के इस तीखे कटाक्ष के बाद से बिहार के अन्य राजनीतिक दलों की तरफ से भी प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है। एक तरफ जहां जन सुराज के समर्थक इसे राज्य की पारंपरिक और जातिवादी राजनीति के खिलाफ एक नए विकल्प की शुरुआत बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सत्ताधारी दल के नेता इस बयान को महज राजनीतिक स्टंट करार दे रहे हैं। हालांकि, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बांकीपुर उप-चुनाव के बाद से प्रशांत किशोर ने जिस प्रकार जमीनी मुद्दों—विशेष तौर पर शिक्षा, रोजगार और व्यवस्था परिवर्तन—को अपनी राजनीति के केंद्र में रखा है, उसने मुख्यधारा के दोनों बड़े गठबंधनों (NDA और Mahagathbandhan) की नींद उड़ा रखी है। आने वाले समय में शिक्षकों और युवाओं के मुद्दों को लेकर यह राजनीतिक तकरार और अधिक तीव्र होने की पूरी संभावना है, जिससे सूबे की सियासत का तापमान लगातार हाई बना रहेगा।