चिराग पासवान ने जीतन राम मांझी और उनके बेटे से मांगा इस्तीफा, आरक्षण के मुद्दे पर एनडीए के भीतर छिड़ी बड़ी सियासी जंग

चिराग पासवान ने जीतन राम मांझी और उनके बेटे से मांगा इस्तीफा, आरक्षण के मुद्दे पर एनडीए के भीतर छिड़ी बड़ी सियासी जंग

बिहार के राजनीतिक गलियारों और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के भीतर इन दिनों भूचाल सा आ गया है, जिसने राज्य की राजनीति के तापमान को अचानक से बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है। केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ने आरक्षण के मुद्दे पर एक ऐसा आक्रामक और सीधा रुख अख्तियार कर लिया है, जिसने सियासी विश्लेषकों को भी हैरान कर दिया है। अपनी मुखर शैली के लिए जाने जाने वाले चिराग पासवान ने केंद्रीय मंत्री और हम पार्टी के संरक्षक जीतन राम मांझी तथा उनके बेटे और बिहार सरकार में मंत्री संतोष सुमन से खुलकर इस्तीफा मांग लिया है। आरक्षण और संविधान प्रदत्त अधिकारों को लेकर दोनों दलों के नेताओं के बीच जुबानी जंग अब इस मुकाम पर पहुंच गई है कि बात इस्तीफे तक आ टिकी है। एनडीए गठबंधन के भीतर मची इस अंदरूनी कलह और आरक्षण के संवेदनशील मुद्दे पर गर्माई सियासत के कारण राज्य का राजनीतिक माहौल पूरी तरह से गरमा गया है, और हर कोई यह जानने को बेताब है कि आखिर इस घमासान का आगामी चुनावों पर क्या असर पड़ेगा।

आरक्षण के मुद्दे पर तल्ख हुए तेवर और वैचारिक तनातनी

इस पूरे विवाद की जड़ में मुख्य रूप से आरक्षण और दलित-शोषित वर्ग के अधिकारों को लेकर चल रही वैचारिक और राजनीतिक बयानबाजी है। चिराग पासवान हमेशा से ही अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण के प्रावधानों, क्रीमी लेयर और संविधान की नौवीं अनुसूची में इसे शामिल करने जैसे मुद्दों पर बहुत सख्त और स्पष्ट स्टैंड लेते रहे हैं। उनका मानना है कि वंचित वर्गों के अधिकारों के साथ किसी भी प्रकार का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, चाहे वह राजनीतिक दल के भीतर का मामला क्यों न हो। दूसरी ओर, पूर्व मुख्यमंत्री और हम (HAM) पार्टी के प्रमुख जीतन राम मांझी भी अपने बेबाक बयानों के लिए जाने जाते हैं, जो कई बार ऐसे मुद्दों पर अलग राय रखते हैं जो एलजेपी (राम विलास) के एजेंडे से मेल नहीं खाते। दोनों नेताओं के बीच बयानों का यह सिलसिला पिछले कुछ दिनों से लगातार तेज होता जा रहा था, जो अब खुलकर एक-दूसरे पर सीधे हमले और इस्तीफे की मांग के रूप में सामने आ चुका है।

एनडीए के भीतर बढ़ती असहजता और विपक्षी दलों की नजर

बिहार में आगामी राजनीतिक समीकरणों और चुनाव की तैयारियों के बीच सत्ताधारी गठबंधन एनडीए के भीतर इस तरह की सार्वजनिक तनातनी का सामने आना विपक्षी दलों के लिए एक बड़ा मुद्दा बन गया है। विपक्षी पार्टियां इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद बारीकी से नजर बनाए हुए हैं और वे यह साबित करने में जुटी हैं कि एनडीए के अंदर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और विभिन्न दलों के नेता अपने-अपने निजी सियासी फायदों के लिए गठबंधन के अनुशासन को दरकिनार कर रहे हैं। चिराग पासवान द्वारा जीतन राम मांझी और उनके बेटे से इस्तीफा मांगे जाने के बाद से ही गठबंधन के भीतर समन्वय बनाने वाले बड़े नेताओं की सांसें अटक गई हैं, क्योंकि यदि इस विवाद को समय रहते नहीं सुलझाया गया, तो यह एनडीए के दलित वोट बैंक पर भी गहरा असर डाल सकता है। दोनों ही नेता अपने-अपने समाज के भीतर एक मजबूत और प्रभावी पकड़ रखते हैं, ऐसे में दोनों का इस तरह आमने-सामने आ जाना गठबंधन के केंद्रीय नेतृत्व के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन गया है।

जीतन राम मांझी के बेटे संतोष सुमन के इस्तीफे की मांग क्यों?

इस पूरे राजनीतिक घमासान में जीतन राम मांझी के साथ-साथ उनके सुपुत्र संतोष सुमन का नाम विशेष रूप से इसलिए लिया जा रहा है क्योंकि वे वर्तमान में बिहार सरकार में मंत्री पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। चिराग पासवान का यह तीखा प्रहार सीधे तौर पर इस बात पर केंद्रित है कि यदि वैचारिक मतभेद इतने गहरे हैं और आरक्षण के मूल सिद्धांतों को लेकर असहमतियां बनी हुई हैं, तो फिर सत्ता या पदों पर बने रहने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस तरह की मांग उठाकर चिराग पासवान ने एक बड़ा सियासी दांव चला है, जिसके जरिए वे यह संदेश देना चाहते हैं कि वे दलित और पिछड़ों के अधिकारों के मुद्दे पर किसी भी तरह के दबाव या समझौते के आगे झुकने वाले नहीं हैं। संतोष सुमन के इस्तीफे की मांग करने से प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या आने वाले दिनों में दोनों दल एक साथ मिलकर आगे का सफर तय कर पाएंगे या फिर एनडीए के भीतर कोई बड़ा राजनीतिक फेरबदल देखने को मिलेगा।

बिहार की सियासत पर पड़ेगा इस टकराव का दूरगामी असर

बिहार की राजनीति हमेशा से ही जातिगत समीकरणों, सामाजिक न्याय और आरक्षण के इर्द-गिर्द घूमती रही है, और इस बार का यह ताजा विवाद उसी पुरानी और संवेदनशील धुरी पर दोबारा आकर टिक गया है। चिराग पासवान और जीतन राम मांझी दोनों ही नेता राज्य के दलित और महादलित समुदाय के बड़े और प्रभावशाली चेहरे माने जाते हैं, और दोनों का अपना एक अलग जनाधार है। जब इस वर्ग के दो कद्दावर नेता आपस में ही इस तरह से टकराने लगते हैं, तो इसका सीधा असर जमीन पर मौजूद उनके समर्थकों और मतदाताओं के मन पर पड़ता है। राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि यदि इस विवाद को शीर्ष नेतृत्व द्वारा जल्द ही मध्यस्थता करके शांत नहीं कराया गया, तो यह आने वाले दिनों में गठबंधन की एकता के लिए बहुत भारी पड़ सकता है। फिलहाल, सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि दिल्ली और पटना में बैठे एनडीए के मुख्य रणनीतिकार इस बढ़ते हुए सियासी बवंडर को रोकने के लिए क्या कदम उठाते हैं और क्या वाकई कोई समाधान निकल पाता है या फिर यह तल्खी और अधिक गहरी होती चली जाती है।

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