चमोली टनल हादसे ने बिहार-झारखंड को रुलाया, रोजी-रोटी की तलाश में घर से निकले 3 गरीब मजदूरों की दर्दनाक मौत
पहाड़ों की वादियों और प्राकृतिक सुंदरता के लिए देश-दुनिया में प्रसिद्ध उत्तराखंड का चमोली जिला इन दिनों एक भीषण और भयावह त्रासदी का गवाह बन चुका है, जिसने वहां काम कर रहे गरीब मजदूरों के परिवारों पर दुखों का पहाड़ तोड़ दिया है. चमोली क्षेत्र में स्थित एक निर्माणाधीन टनल (सुरंग) के भीतर अचानक हुए एक दर्दनाक हादसे ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है. इस भयंकर दुर्घटना में जिन बेकसूर मजदूरों ने अपनी जान गंवाई है, वे अपने घरों से हजारों किलोमीटर दूर अपने बीवी-बच्चों के दो जून की रोटी और सुनहरे भविष्य के सपनों को पूरा करने के लिए रोजी-रोटी की तलाश में आए थे. जब इस प्रकार की आपदाएं देश के किसी भी कोने में घटित होती हैं, तो उनका सबसे गहरा और खौफनाक दर्द उन दूरदराज के गांवों और गरीब घरों तक पहुंचता है, जहां से ये मजदूर अपने घरों को रोशन करने के लिए निकलते हैं. इस दुखद हादसे की खबर जैसे ही बिहार और झारखंड के संबंधित गांवों में पहुंची, वहां कोहराम मच गया और हर आंख नम हो गई.
बिहार और झारखंड के तीन लालों की मौत से गांवों में छाया सन्नाटा
इस भीषण चमोली टनल हादसे में अपनी जान गंवाने वाले मजदूरों में मुख्य रूप से बिहार और झारखंड राज्यों के विभिन्न गरीब और पिछड़े जिलों के रहने वाले तीन युवा मजदूर शामिल थे. अपने घर-परिवार की आर्थिक तंगी को दूर करने के लिए इन तीनों ने कुछ महीने पहले ही अपने पैतृक गांवों को छोड़कर उत्तराखंड का रुख किया था और उस सुरंग निर्माण परियोजना में मजदूरी का कठिन काम शुरू किया था. किसी को इस बात का दूर-दूर तक अंदाजा नहीं था कि वे जिस अंधेरे में रोशनी करने के लिए सुरंग खोद रहे हैं, वही सुरंग एक दिन उनकी अपनी जिंदगी का हमेशा के लिए अंधेरा बन जाएगी. हादसे की सूचना मिलते ही उनके घरों में चीख-पुकार मच गई और बूढ़े माता-पिता, पत्नी तथा मासूम बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल है. बिहार और झारखंड के इन इलाकों में इस मनहूस खबर के पहुंचने के बाद से किसी के घर में चूल्हा नहीं जला है और पूरे गांव में एक गहरा और असहनीय सन्नाटा पसर गया है, जो इस बात की गवाही दे रहा है कि गरीबी और लाचारी की मार झेल रहे इन परिवारों पर कुदरत और सिस्टम की कितनी बड़ी गाज गिरी है.
निर्माण स्थलों पर सुरक्षा मानकों की अनदेखी और टनल हादसे का सच
इस प्रकार की टनल दुर्घटनाएं कोई पहली बार देश में नहीं हुई हैं, बल्कि इससे पहले भी कई बार पर्वतीय क्षेत्रों में निर्माण कार्यों के दौरान सुरक्षा मानकों की भारी अनदेखी के कारण ऐसी दर्दनाक घटनाएं सामने आती रही हैं. प्रारंभिक जानकारियों और स्थानीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, चमोली की इस टनल के भीतर अचानक ऊपरी हिस्से से मलबा खिसकने या तकनीकी खराबी के चलते काम कर रहे मजदूर अंदर ही फंस गए. जब तक बचाव और राहत दल (Rescue Team) की टीमें भारी मशीनों के साथ मौके पर पहुंचकर मलबा हटाने में कामयाब हुईं, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और बहुत से मजदूरों की सांसें थम चुकी थीं. सवाल यह उठता है कि क्या निर्माण कंपनियों द्वारा मजदूरों की सुरक्षा के लिए तय किए गए कड़े अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मानकों का ईमानदारी से पालन किया जा रहा था? यदि सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होते, तो शायद इन तीनों गरीब मजदूरों की जान बचाई जा सकती थी. ठेकेदारों और निर्माण एजेंसियों की इस प्रकार की लापरवाही अब हर बार गरीब मजदूरों की लाशों पर ही क्यों भारी पड़ती है, यह एक ऐसा गंभीर सवाल है जिसका जवाब देने से हर कोई कतराता नजर आता है.
प्रशासनिक सहायता और मुआवजे की मांग को लेकर उठ रही आवाजें
इस हृदयविदारक घटना के बाद से ही राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के साथ-साथ स्थानीय नागरिकों में भी भारी गुस्सा देखा जा रहा है. पीड़ित परिवारों के सामने अब सबसे बड़ा संकट यह खड़ा हो गया है कि उनके घर का इकलौता कमाने वाला सदस्य अब इस दुनिया में नहीं रहा, तो उनका भरण-पोषण कैसे होगा. बिहार और झारखंड की राज्य सरकारों के साथ-साथ उत्तराखंड प्रशासन पर भी यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे इन गरीब मजदूरों के पार्थिव शरीर को उनके पैतृक गांवों तक सम्मानजनक तरीके से पहुंचाने का पूरा प्रबंध करें और उनके आश्रितों को उचित मुआवजा तथा सरकारी नौकरी प्रदान करें. हालांकि दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इस हादसे पर गहरा शोक व्यक्त किया है और संवेदनाएं प्रकट की हैं, लेकिन पीड़ित परिवारों का कहना है कि शब्दों की सांत्वना उनके उजड़े हुए आशियाने को वापस नहीं ला सकती है. देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी मेहनत की मजदूरी करने वाले इन प्रवासियों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत और जवाबदेह व्यवस्था बनाने की सख्त जरूरत है, ताकि आगे फिर किसी मां की गोद सूनी न हो और किसी बहन का सुहाग न उजड़े.