बिहार : राज्य नागरिक परिषद और 20 सूत्री कमेटियों के जरिए सम्राट सरकार ने किसे दिया तोहफा और क्या है इसके सियासी मायने
बिहार के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों सरकार द्वारा प्रशासनिक और सांगठनिक स्तर पर किए जा रहे नए बदलावों और नियुक्तियों की चर्चा जोरों पर है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने हाल ही में राज्य स्तरीय कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति यानी बीस सूत्री कमेटी और बिहार राज्य नागरिक परिषद में कई महत्वपूर्ण नियुक्तियां की हैं। इन नियुक्तियों को राजनीतिक विश्लेषक केवल सामान्य प्रशासनिक फेरबदल नहीं मान रहे हैं, बल्कि इसे आने वाले राजनीतिक समीकरणों और कोर वोटर माने जाने वाले सवर्ण वर्ग को रिझाने की एक सोची-समझी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। जानकारों का मानना है कि पिछले कुछ चुनावों में एनडीए के पारंपरिक माने जाने वाले सवर्ण मतदाताओं के एक वर्ग में उपजे असंतोष को थामने के लिए सरकार ने यह डैमेज कंट्रोल प्लान तैयार किया है। इन पदों पर जिन चेहरों को नवाजा गया है और जिन्हें राज्य मंत्री या उप मंत्री का दर्जा दिया गया है, उसके पीछे की जातीय और क्षेत्रीय गणित को समझना बेहद दिलचस्प है।
राज्य नागरिक परिषद में महत्वपूर्ण नियुक्तियां और डॉ. अजय कुमार सिंह को मिली बड़ी जिम्मेदारी
सरकार द्वारा किए गए इस ताजा राजनीतिक और प्रशासनिक प्रबंधन के तहत बिहार राज्य नागरिक परिषद में रिक्त पड़े पदों पर अहम जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। सिवान क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले और प्रमुख राजनीतिक परिवार से जुड़े डॉ. अजय कुमार सिंह को राज्य नागरिक परिषद का नया उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि डॉ. अजय सिंह की पत्नी को चुनाव के दौरान टिकट न मिलने से सवर्ण और खासकर राजपूत समाज के एक वर्ग में नाराजगी पनप रही थी। इस नाराजगी को दूर करने और डैमेज कंट्रोल करने के लिए ही सरकार ने उन्हें इस पद पर बिठाकर राज्य मंत्री का दर्जा प्रदान किया है। इसके साथ ही, मुख्यमंत्री के बेहद करीबी और लंबे समय तक वफादार सुरक्षाकर्मी रहे हरेंद्र बहादुर सिंह को नागरिक परिषद का नया महासचिव बनाया गया है। हरेंद्र सिंह की यह नियुक्ति भी सियासी रूप से काफी अहम मानी जा रही है, क्योंकि इसके जरिए पार्टी ने एक बार फिर अपने पुराने और भरोसेमंद कैडर को साधने का संदेश दिया है।
बीस सूत्री कमेटियों में एनडीए के सहयोगियों को जगह और भूमिहार-राजपूत जातियों का संतुलन
राज्य स्तरीय बीस सूत्री कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति के विस्तार में भी जातीय और राजनीतिक संतुलन साधने की पूरी कोशिश साफ दिखाई दे रही है। सरकार ने एनडीए के विभिन्न घटक दलों के प्रमुख चेहरों को इस समिति में जगह देकर एक तीर से कई निशाने साधे हैं। रालोमो के प्रदेश अध्यक्ष आलोक कुमार सिंह, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा सेक्युलर के वरिष्ठ नेता व पूर्व मंत्री अनिल कुमार और लोजपा (रामविलास) के प्रदेश अध्यक्ष सुरेंद्र कुमार उर्फ सुरेंद्र विवेक को इस राज्य स्तरीय कमेटी का सदस्य बनाया गया है। इन सभी नियुक्त सदस्यों को सरकार की तरफ से उप मंत्री का दर्जा दिया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भूमिहार और राजपूत जातियों के इन कद्दावर नेताओं को संगठन और सत्ता में यह जगह देकर सरकार ने यह जताने का प्रयास किया है कि एनडीए गठबंधन में सवर्ण जातियों के हितों और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का पूरा ख्याल रखा जा रहा है, ताकि आगामी राजनीतिक लड़ाइयों में किसी भी तरह की नाराजगी का सामना न करना पड़े।
क्या यह फैसला महज एक सियासी लॉलीपॉप है या जमीनी स्तर पर असर डालेगा यह कदम
इस तरह की राजनीतिक नियुक्तियों के सामने आने के बाद राज्य के राजनीतिक हलकों में यह बहस छिड़ गई है कि क्या यह कदम वाकई सवर्ण समाज को सशक्त करने का प्रयास है या फिर यह सिर्फ चुनाव से पहले का एक 'लॉलीपॉप' या डैमेज कंट्रोल है? विरोधी दलों का मानना है कि जब चुनाव सिर पर होते हैं या जब किसी खास वर्ग की नाराजगी खुलकर सामने आने लगती है, तभी इस प्रकार के पदों और रेवड़ियों का वितरण किया जाता है। हालांकि, एनडीए के रणनीतिकारों का तर्क है कि इन नियुक्तियों के जरिए सरकार ने प्रशासनिक कामकाज में क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन को बेहतर करने का काम किया है। हालिया उप चुनावों और स्थानीय राजनीतिक उथल-पुथल के बाद जिस तरह से सवर्ण वोटों के खिसकने की चर्चाएं शुरू हुई थीं, उसे रोकने के लिए यह कदम सरकार की तरफ से एक बड़ा और व्यावहारिक दांव माना जा रहा है।
आने वाले दिनों में बिहार की सियासत और जातियों के समीकरण पर क्या होगा इसका प्रभाव
बिहार की राजनीति हमेशा से ही जातिगत समीकरणों, सोशल इंजीनियरिंग और सत्ता की हिस्सेदारी के इर्द-गिर्द घूमती रही है। सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बनी इस नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सभी जातियों को एकजुट रखकर अपने जनाधार को बचाए रखना है। राज्य नागरिक परिषद और बीस सूत्री कमेटियों के बहाने जिन करीब आधा दर्जन से अधिक नेताओं को बड़े पदों और उप मंत्री के दर्जे से नवाजा गया है, उसके दूरगामी परिणाम आने वाले चुनावों में देखने को मिल सकते हैं। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या यह सियासी मलमपट्टी सवर्ण मतदाताओं के गुस्से को शांत करने में पूरी तरह कामयाब होती है या फिर विपक्ष इसे चुनावी स्टंट बताकर जनता के बीच एक नया मुद्दा बनाने में सफल रहता है। फिलहाल, इन नियुक्तियों ने बिहार के राजनीतिक तापमान को एक बार फिर गर्मा दिया है और हर कोई इसके नफा-नुकसान का हिसाब लगाने में जुट गया है।