बिहार : खाकी वर्दी के साथ कैसे बदली हजारों गरीब बच्चों की तकदीर, सुपर 30 से लेकर 'आनंद शिक्षा निकेतन' तक का सफर
शिक्षकों का सम्मान करने का दिन यानी शिक्षक दिवस हर साल हमारे समाज में एक खास उम्मीद और प्रेरणा लेकर आता है, लेकिन जब बात एक ऐसे शख्स की हो जो हाथों में कानून की किताब और राइफल थामने के साथ-साथ झुग्गी-झोपड़ियों और गरीब बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए किताबें बांटता रहा हो, तो कहानी अपने आप में अद्भुत हो जाती है। बात हो रही है बिहार के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) और जाने-माने शिक्षाविद् अभयानंद की, जिनकी पहचान सिर्फ एक कड़क आईपीएस अधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि उन अनगिनत इंजिनियरों और डॉक्टरों के गॉडफादर के रूप में भी दर्ज है जिन्होंने कभी अभावों में अपनी जिंदगी बिताई थी। एक वर्दीधारी अधिकारी के तौर पर उन्होंने जिस तरह शिक्षा का संचार समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक किया, उसने यह साबित कर दिया कि ज्ञान वह रोशनी है जो हर अंधेरे कोने को रोशन कर सकती है।
भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के एक उच्च पद पर आसीन अधिकारी के लिए अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकालकर गणित और भौतिकी के जटिल समीकरणों को पढ़ाना किसी चमत्कार से कम नहीं लगता, लेकिन अभयानंद ने इस असंभव लगने वाले काम को अपनी जिंदगी का मुख्य मकसद बना लिया था। जब वे दिनभर अपराधियों की धरपकड़ और कानून-व्यवस्था की समीक्षा में व्यस्त रहते थे, तब उनकी शामें उन होनहार और गरीब बच्चों के नाम होती थीं जिनके पास महंगे कोचिंग संस्थानों की फीस भरने के लिए एक फूटी कौड़ी भी नहीं होती थी। फिजिक्स (भौतिकी) के उनके पढ़ाने के अनूठे अंदाज और कॉन्सेप्ट्स को क्लियर करने की उनकी क्षमता ने छात्रों के मन से विज्ञान का डर हमेशा के लिए निकाल दिया। उन्होंने साबित किया कि प्रतिभा किसी की बपौती नहीं होती, उसे बस सही मार्गदर्शन और एक अदद मौके की जरूरत होती है जो उन्होंने अपनी कक्षाओं के माध्यम से हजारों बच्चों को दिया।
किसी भी व्यक्ति के जीवन में उसके परिवार का जो प्रभाव होता है, वही उसके भविष्य की नींव तय करता है और अभयानंद के मामले में भी यह बात पूरी तरह सटीक बैठती है। उनका शुरुआती परिवेश बौद्धिक और वैचारिक रूप से बेहद समृद्ध रहा, जहां शिक्षा को ही सबसे बड़ा धन माना जाता था। उनके घर का माहौल हमेशा से ऐसा था जहां किताबों के बीच चर्चाएं होना आम बात थीं और उनके पिता से मिले अनुशासन व समाज सेवा के संस्कारों ने उनके भीतर बचपन से ही एक गहरी सामाजिक जिम्मेदारी का भाव भर दिया था। परिवार से मिले इन्हीं शुरुआती पाठों ने उन्हें यह सिखाया कि प्रशासनिक पद पर रहकर जनता की सेवा करना अपनी जगह एक कर्तव्य है, लेकिन समाज के बौद्धिक स्तर को ऊपर उठाने के लिए ज्ञान का दान सबसे बड़ा पुण्य है। यही कारण था कि उन्होंने अपनी पारिवारिक और पेशेवर जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाते हुए शिक्षा के प्रसार को अपना अनौपचारिक मिशन बना लिया।
बिहार की धरती से उपजी वह क्रांतिकारी शैक्षिक पहल जिसे आज पूरी दुनिया 'सुपर 30' के नाम से जानती है, उसके शुरुआती संस्थापकों में अभयानंद का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। गणितज्ञ आनंद कुमार के साथ मिलकर उन्होंने समाज के सबसे गरीब तबके के 30 ऐसे मेधावी बच्चों को चुनना शुरू किया जो आईआईटी (IIT) जैसी दुनिया की सबसे कठिन इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने का सपना तो देखते थे, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण कदम पीछे खींच लेते थे। अभयानंद ने अपने आवास और सीमित संसाधनों के जरिए इन बच्चों को पढ़ाना शुरू किया और अपनी अनूठी रणनीतिक सोच से यह साबित कर दिया कि अगर सही दिशा में मेहनत की जाए, तो संसाधनों की कमी कभी सफलता के आड़े नहीं आ सकती। उनके पहले ही प्रयास में जब इन बच्चों ने ऐतिहासिक सफलता हासिल की, तो देश-दुनिया का ध्यान इस अनूठे प्रयोग की ओर आकर्षित हुआ और शिक्षा जगत में एक नई क्रांति का सूत्रपात हुआ।
वक्त के साथ भले ही शुरुआती संस्थागत साझेदारियों में कुछ वैचारिक अंतर आए और रास्ते अलग हुए, लेकिन अभयानंद के भीतर सुलग रही शिक्षा की वह लौ और अधिक तेज हो गई। उन्होंने अपनी राह खुद चुनी और ग्रामीण क्षेत्रों के उन इलाकों का रुख किया जहां शिक्षा की पहुंच अब भी एक सपना बनी हुई थी। पटना के पास बाढ़ (Barh) अनुमंडल के एक छोटे से ग्रामीण इलाके मसौढ़ी और अन्य सुदूर गांवों में उन्होंने 'आनंद शिक्षा निकेतन' जैसी पहलों की शुरुआत की, जहां उन्होंने सीधे तौर पर समाज के सबसे पिछड़े और मुसहर जैसी जातियों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ा। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि केवल शहरी और संभ्रांत वर्ग के बच्चे ही नहीं, बल्कि खेतों में काम करने वाले और ईंट-भट्ठों पर मजदूरी करने वाले परिवारों के बच्चे भी कलम पकड़ना सीखें और अपने भविष्य की पटकथा खुद लिखें।
पुलिस विभाग के सर्वोच्च पद से सेवानिवृत्त होने के बाद जब अमूमन लोग अपने परिवार और विश्राम की जिंदगी चुनते हैं, तब अभयानंद ने अपने इस शैक्षिक आंदोलन को और अधिक विस्तार दे दिया। आज भी वे अपनी कक्षाओं में पूरी तल्लीनता से युवाओं को पढ़ाते नजर आते हैं और उनका यह समर्पण इस बात का प्रमाण है कि एक सच्चा शिक्षक कभी रिटायर नहीं होता। उनके पढ़ाए हुए छात्र आज देश और दुनिया के नामी-गिरामी तकनीकी संस्थानों, वैज्ञानिक शोध केंद्रों और प्रशासनिक पदों पर देश की सेवा कर रहे हैं, जो उनके द्वारा बोए गए बीज का ही वटवृक्ष रूप है। शिक्षक दिवस के इस पावन अवसर पर उनकी यह कहानी हमें यह याद दिलाती है कि समाज में बदलाव लाने के लिए केवल पदों की नहीं, बल्कि सच्ची नीयत, दृढ़ संकल्प और निस्वार्थ भाव से ज्ञान बांटने की जरूरत होती है।