Bihar Elections : सिर्फ वोट नहीं, यहां लगा है राजनीति की मां का महादांव ,जानिए किसका होगा पलड़ा भारी?
News India Live, Digital Desk: Bihar Elections : बिहार में विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ ही सियासी पारा सांतवें आसमान पर पहुँच गया है. हर राजनीतिक पंडित और आम आदमी भी ये सोच रहा है कि इस बार क्या होगा. इसकी वजह भी साफ है: यहाँ के चुनाव सिर्फ सत्ता बदलने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि अक्सर देश की बड़ी राजनीतिक दिशा भी तय करते हैं. और इस बार तो मुख्य किरदारों का इम्तिहान भी है!
1. नीतीश कुमार: अनुभव और विरासत का इम्तिहान
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जिन्होंने बिहार की सियासत में एक लंबा सफर तय किया है, एक बार फिर कसौटी पर हैं. 'सुशासन बाबू' की छवि बनाने वाले नीतीश जी की परीक्षा है कि वे लगातार बदलते गठबंधन के बीच अपनी प्रासंगिकता और जनाधार को कैसे बरकरार रखते हैं. उनकी पार्टी जदयू (JDU) को बीजेपी और राजद दोनों के साथ काम करने का लंबा अनुभव है. अब उन्हें ये साबित करना है कि वे अभी भी बिहार के सबसे मज़बूत नेता हैं, और उनका 'नीतीश मॉडल' आज भी जनता के बीच उतना ही प्रभावी है. उनकी यह चुनौती बड़ी है क्योंकि वह खुद एक लंबे राजनीतिक करियर के पड़ाव पर हैं.
2. तेजस्वी यादव: युवा शक्ति और आक्रामक अंदाज़
राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के युवा नेता तेजस्वी यादव अपनी पूरी ऊर्जा और जोश के साथ मैदान में हैं. 'युवा बनाम अनुभवी' की इस लड़ाई में तेजस्वी लगातार खुद को एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी सभाओं में जुटी भीड़ और उनका आक्रामक चुनाव प्रचार दिखाता है कि उन्होंने ज़मीन पर अपनी पकड़ मजबूत की है. उनका सामना बिहार की नई पीढ़ी को अपनी तरफ खींचने की चुनौती से है और उन्हें यह दिखाना है कि वे अपने पिता लालू प्रसाद यादव की विरासत को आगे बढ़ाने के साथ-साथ एक स्वतंत्र नेतृत्वकर्ता के तौर पर खुद को स्थापित कर सकते हैं.
3. कांग्रेस: पुनरुत्थान की उम्मीद में
जो कांग्रेस कुछ समय से बिहार में कमज़ोर नज़र आ रही थी, वो अब एक नए जोश के साथ चुनावी मैदान में उतर रही है. राष्ट्रीय स्तर पर बदल रहे समीकरणों का असर बिहार में भी दिख रहा है. कांग्रेस खुद को महागठबंधन के एक महत्वपूर्ण और बड़े भागीदार के तौर पर प्रस्तुत करना चाहती है. राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के बढ़ते प्रचार और स्थानीय नेताओं की सक्रियता से पार्टी को उम्मीद है कि वे बिहार में अपना खोया जनाधार वापस पा सकते हैं. यह उनके लिए अपने अस्तित्व की लड़ाई के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी पहचान दोबारा स्थापित करने का मौका है.
कुल मिलाकर, ये बिहार विधानसभा चुनाव सिर्फ सीटों का गणित नहीं हैं, बल्कि यह बिहार की राजनीतिक दिशा, युवा नेतृत्व के उदय, पुराने नेताओं की प्रासंगिकता और राष्ट्रीय पार्टियों के क्षेत्रीय असर को तय करेंगे. कौन बनेगा इस बार 'बिहार का सिकंदर', यह तो आने वाला समय ही बताएगा