बिहार ने तोड़े वोटिंग के सारे रिकॉर्ड, ये नीतीश को बचाने की लहर है या तेजस्वी को लाने का तूफान?

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News India Live, Digital Desk: इस बार बिहार के चुनाव में कुछ ऐसा हुआ है, जिसने राजनीति के बड़े-बड़े पंडितों का भी दिमाग चकरा दिया है। लोगों ने इस बार इतनी खामोशी से, लेकिन इतनी बड़ी तादाद में वोट डाला है कि 1952 के बाद से लेकर आज तक के सारे रिकॉर्ड टूट गए हैं। जानकारों का कहना है कि वोटिंग में लगभग 10 प्रतिशत का यह उछाल कोई मामूली बात नहीं है, यह किसी बहुत बड़ी राजनीतिक आंधी का संकेत है।

लेकिन सबसे बड़ा और करोड़ों का सवाल यही है कि यह आंधी किसके पक्ष में है? क्या यह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की 15 साल पुरानी कुर्सी को बचाने के लिए उठी है या फिर विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव को सत्ता में लाने का तूफान है?

जब जनता चुपचाप वोट करती है, तो उसका क्या मतलब होता है?

राजनीति के जानकार मानते हैं कि जब भी वोटिंग प्रतिशत में अचानक से इतना बड़ा उछाल आता है, तो यह अक्सर बदलाव का इशारा होता है। उनका तर्क है कि जब जनता मौजूदा सरकार के कामकाज से खुश होती है, तो वह आराम से घर पर बैठती है। लेकिन जब उसे गुस्सा आता है, जब वह परेशान होती है, तभी वह भरी धूप और गर्मी की परवाह किए बिना अपने घरों से बाहर निकलती है, लाइनों में लगती है, ताकि वह सरकार को सबक सिखा सके।

इसे सियासी भाषा में 'एंटी-इनकंबेंसी' यानी सरकार के खिलाफ लहर कहा जाता है। लोग सोचते हैं कि चलो, एक मौका किसी और को देकर देखते हैं, शायद कुछ बदल जाए।

तो क्या नीतीश कुमार की विदाई तय है?

अगर इस सीधे से फॉर्मूले को मानें, तो बढ़ा हुआ वोटिंग प्रतिशत सीधे तौर पर नीतीश कुमार की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के लिए खतरे की घंटी है। इसका मतलब यह हो सकता है कि बिहार के लोगों ने मन बना लिया है कि अब उन्हें बदलाव चाहिए। यह तेजस्वी यादव के लिए एक बहुत बड़ी खुशखबरी हो सकती है, क्योंकि जनता ने शायद खामोशी से अपना फैसला सुना दिया है कि अब उन्हें यह सरकार नहीं चाहिए।

लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है

हालांकि, कुछ लोगों का यह भी मानना है कि कभी-कभी जनता का एक 'खामोश वोटर' वर्ग भी होता है, जो सरकार के काम से खुश तो होता है, लेकिन बोलता नहीं है। हो सकता है कि ये बढ़े हुए 10% वोट उसी खामोश वर्ग के हों, जो आखिरी मौके पर अपने पसंदीदा नेता को बचाने के लिए घर से बाहर निकल आया हो। ये वे लोग हो सकते हैं जिन्हें सरकारी योजनाओं का फायदा मिला हो और वे नहीं चाहते कि सरकार बदले।

लेकिन राजनीतिक इतिहास में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है। ज्यादातर मामलों में, खामोशी से बढ़ती हुई भीड़ बदलाव का ही तूफान लाती है।

अब असली सच क्या है, यह तो नतीजों के दिन ही पता चलेगा। लेकिन एक बात तो पक्की है - बिहार की जनता ने अपना फैसला ईवीएम में बंद कर दिया है, और इस फैसले ने पटना से लेकर दिल्ली तक, सबकी नींद उड़ा रखी है।