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April 18 2026 01:28 am

AI की दुनिया में महासंकट, अमेरिका में गूगल-माइक्रोसॉफ्ट के अरबों डॉलर के प्रोजेक्ट्स पर ब्रेक

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News India Live, Digital Desk: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की रेस में पूरी दुनिया को पीछे छोड़ने का सपना देख रही अमेरिकी टेक कंपनियों को अपने ही घर में बड़ा झटका लगा है। एक तरफ गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियां एआई को भविष्य बता रही हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिका के कई राज्यों में इन कंपनियों के अरबों डॉलर के डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स पर 'प्रतिबंध' जैसी स्थिति पैदा हो गई है। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2026 में आधे से ज्यादा नियोजित डेटा सेंटर्स के निर्माण में या तो देरी हो रही है या उन्हें पूरी तरह रद्द किया जा रहा है। इस 'U-टर्न' ने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है कि क्या एआई का विकास अब खतरे में है?

बिजली की भारी खपत और ग्रिड पर बढ़ता दबाव

इस संकट की सबसे बड़ी वजह है 'बिजली'। एआई मॉडल को ट्रेन करने और चलाने के लिए इस्तेमाल होने वाले डेटा सेंटर्स को सामान्य से कई गुना ज्यादा बिजली की जरूरत होती है। अमेरिका के मेन (Maine) जैसे राज्यों ने नवंबर 2027 तक नए बड़े डेटा सेंटर्स के निर्माण पर रोक लगाने वाला बिल पेश किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि एक औसत एआई डेटा सेंटर इतनी बिजली खपत करता है जितनी 15,000 से ज्यादा घरों के लिए काफी होती है। इससे स्थानीय बिजली ग्रिड पर दबाव बढ़ रहा है और आम जनता के लिए बिजली के दाम बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।

उपकरणों की कमी: चीन पर निर्भरता बनी मुसीबत

सिर्फ कानून ही नहीं, बल्कि सामान की कमी भी इन प्रोजेक्ट्स के आड़े आ रही है। डेटा सेंटर्स के लिए जरूरी मुख्य इलेक्ट्रिकल पुर्जे जैसे ट्रांसफॉर्मर, स्विचगियर और हाई-कैपेसिटी बैटरी की भारी कमी है। हैरानी की बात यह है कि अमेरिका आज भी इन उपकरणों के लिए काफी हद तक चीन पर निर्भर है। सप्लाई चेन में रुकावट और ट्रेड वॉर जैसी स्थितियों के कारण इन सामानों की डिलीवरी में अब 2 साल के बजाय 5 साल तक का समय लग रहा है। बिना बिजली के बुनियादी ढांचे के, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट का अरबों का निवेश भी बेकार साबित हो रहा है।

ट्रम्प प्रशासन का 'रेटपेयर प्रोटेक्शन प्लेज'

इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एआई कंपनियों के लिए 'रेटपेयर प्रोटेक्शन प्लेज' (Ratepayer Protection Pledge) लागू किया है। इसके तहत गूगल, अमेजन, मेटा और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों को यह वादा करना पड़ा है कि वे अपने डेटा सेंटर्स के लिए जरूरी बिजली के बुनियादी ढांचे का पूरा खर्च खुद उठाएंगे। इसका मकसद आम जनता (Ratepayers) को बिजली के बढ़ते बिलों से बचाना है। अब इन कंपनियों को न सिर्फ डेटा सेंटर बनाना होगा, बल्कि अपने लिए नए पावर प्लांट और ग्रिड लाइन्स भी खुद लगानी होंगी, जिससे प्रोजेक्ट्स की लागत और समय दोनों बढ़ गए हैं।

क्या एआई की रेस में पिछड़ जाएगा अमेरिका?

डेटा सेंटर्स के निर्माण में आ रही इन रुकावटों ने एक नई बहस छेड़ दी है। चीन और अन्य देश जहां तेजी से एआई इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर रहे हैं, वहीं अमेरिका में स्थानीय विरोध, पर्यावरण संबंधी चिंताएं और बिजली की कमी ने 'एआई बबल' फटने का डर पैदा कर दिया है। अगर जल्द ही बिजली और उपकरणों की समस्या नहीं सुलझी, तो गूगल के 'जेमिनी' और माइक्रोसॉफ्ट के 'को-पायलट' जैसे एडवांस एआई टूल्स का विकास धीमा पड़ सकता है, जो वैश्विक स्तर पर अमेरिका की तकनीकी बढ़त को नुकसान पहुंचा सकता है।