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April 22 2026 08:43 am

Bengal Leader : राम मंदिर के बाद अब नई बाबरी मस्जिद? इस विधायक की खुली चुनौती ने 6 दिसंबर से पहले बढ़ाई देश की धड़कनें

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News India Live, Digital Desk : राजनीति में कब कौन सा मुद्दा उठ खड़ा हो और कब राख के ढेर में दबी चिंगारी फिर से हवा पा जाए, यह कोई नहीं कह सकता। अभी देश में राम मंदिर बनने की खुशियां मनाई जा रही थीं, माहौल शांत था, कि अचानक पश्चिम बंगाल से एक ऐसी आवाज उठी है जिसने पुरानी यादें ताजा कर दी हैं।

अक्सर नेता लाइमलाइट में आने के लिए बयान देते हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल के भरतपुर से विधायक हुमायूं कबीर (Humayun Kabir) ने जो कहा है, उसने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। यह मामला सिर्फ एक मस्जिद बनाने का नहीं, बल्कि उसके लिए चुनी गई 'तारीख' का है।

आइए, बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर मामला क्या है और 6 दिसंबर को क्या होने वाला है।

विधायक का खुला ऐलान: "फिर बनेगी मस्जिद"

तृणमूल कांग्रेस (TMC) के विधायक हुमायूं कबीर ने एक जनसभा में खुलेआम कसम खाई है कि वे एक नई मस्जिद का निर्माण करेंगे। यहाँ तक तो सब ठीक था, लेकिन विवाद तब खड़ा हुआ जब उन्होंने इसका नाम बाबरी मस्जिद या उससे मिलता-जुलता रखने और इसे उसी ऐतिहासिक संदर्भ से जोड़ने की बात कही।

उनका कहना है कि अयोध्या में जो हुआ, उसका दर्द उनके समुदाय के लोगों के दिलों में अभी भी है। इसलिए वे पश्चिम बंगाल में एक ऐसी मस्जिद बनाएंगे जो उस याद को जिंदा रखेगी।

6 दिसंबर की तारीख ही क्यों?

दोस्तों, 6 दिसंबर का दिन भारत के इतिहास में एक बेहद संवेदनशील दिन माना जाता है। 1992 में इसी दिन अयोध्या में बाबरी ढांचा गिराया गया था।
हुमायूं कबीर ने ऐलान किया है कि वे 6 दिसंबर को ही अपनी इस नई मस्जिद की आधारशिला (Foundation Stone) रखेंगे। उनका यह कहना कि "हम इस दिन को भूलने नहीं देंगे," साफ दर्शाता है कि यह कदम सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि पूरी तरह से राजनीतिक है। उन्होंने दावा किया है कि इस दिन शिलान्यास कार्यक्रम में लाखों लोगों की भीड़ जमा होगी।

सियासत शुरू, माहौल गरमाया

जाहिर सी बात है, विधायक के इस बयान पर दूसरी पार्टियों ने कड़ा एतराज जताया है। विपक्ष (BJP) का कहना है कि यह सब लोकसभा चुनावों को देखते हुए और एक खास समुदाय के वोट हासिल करने के लिए किया जा रहा है। लोगों का कहना है कि जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देश आगे बढ़ चुका है, तो फिर से उन पुराने जख्मों को कुरेदने का क्या मतलब है?

क्या यह सच में आस्था का सवाल है या फिर चुनाव से पहले भावनाओं को भड़काने की कोशिश? सवाल बड़ा है, क्योंकि एक तरफ देश विकास की बात कर रहा है और दूसरी तरफ कुछ नेता इतिहास के पन्ने फाड़कर फिर वहीं ले जाना चाहते हैं जहां से हम मुश्किल से निकले थे।