Ashwin Reveals Truth : वो एक वादा जो उनकी रिटायरमेंट की वजह बना, जानकर आप भी करेंगे सलाम

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News India Live, Digital Desk : हम सब जानते हैं कि आर. अश्विन (R Ashwin) सिर्फ एक गेंदबाज नहीं, बल्कि क्रिकेट के 'साइंटिस्ट' थे। जब उन्होंने रिटायरमेंट लिया, तो हम सब सन्न रह गए थे। लेकिन अब, उन्होंने उस फैसले के पीछे की असली कहानी बताई है, जिसे सुनकर शायद आपको भी उन पर और प्यार आएगा।

हाल ही में एक इंटरव्यू में अश्विन ने अपने दिल का वो दर्द बयां किया है जो शायद बहुत सालों से उनके अंदर दबा हुआ था। बात सिर्फ उम्र या थकान की नहीं थी, बात थी उस 'फीलिंग' की, जब एक चैंपियन खिलाड़ी को अपनी अहमियत पर सवाल उठाने पड़ते हैं।

2012 का वो वादा...
अश्विन ने बताया कि इसकी शुरुआत बहुत पहले, साल 2012 में ही हो गई थी। आपको याद है जब इंग्लैंड ने भारत को घर में हराया था? उस हार ने अश्विन को अंदर तक झकझोर दिया था। उस वक्त उन्होंने शीशे में देख कर खुद से एक वादा किया था "जब तक मैं खेलूंगा, भारत अपने घर में कोई टेस्ट सीरीज नहीं हारेगा।"

यह कोई मामूली वादा नहीं था। और देखिए, उन्होंने इसे लगभग 12 साल तक निभाया भी! एक दशक तक भारत अपने किले (Home Soil) में अजेय रहा। लेकिन जब पिछले साल (न्यूजीलैंड के खिलाफ) वो किला ढहा, तो शायद अश्विन को लगा कि उनका चक्र पूरा हो गया है। वो वादा, जो उनकी प्रेरणा था, कहीं न कहीं अब उन्हें रुकने का संकेत दे रहा था।

"मैं यहाँ बैठकर क्या कर रहा हूँ?" (Why am I sitting at...?)
लेकिन रिटायरमेंट की वजह सिर्फ वो हार नहीं थी। अश्विन ने एक और बहुत बड़ी बात कही जो 'बेंच' पर बैठने से जुड़ी है। हम सबने देखा है कि अश्विन घर में तो 'शेर' होते थे, लेकिन जैसे ही टीम इंडिया विदेश (SENA देशों) में जाती थी, उन्हें प्लेइंग इलेवन से बाहर बैठा दिया जाता था।

अश्विन ने खुलासा किया कि यही वो चीज थी जो उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रही थी। उन्होंने कहा, "मैं दौरों पर जाता था, और मुझे लगातार बाहर बैठना पड़ता था। एक समय आया जब मैंने खुद से पूछा—मैं यहाँ क्यों बैठा हूँ? अगर मुझे खेलना ही नहीं है, तो मैं अपने परिवार और बच्चों से दूर यहाँ बेंच पर क्यों समय बर्बाद कर रहा हूँ?"

जरा सोचिए, जिस खिलाड़ी के पास 500 से ज्यादा विकेट हों, उसे जब बार-बार बाहर बैठना पड़े, तो उस पर क्या गुजरती होगी? अश्विन ने माना कि "Sitting out" (बाहर बैठना) ने उनके दिमाग पर गहरा असर डाला और उन्हें लगा कि अब बस करने का वक्त आ गया है।

परिवार ने दी हिम्मत, पर फैसला था अटल
अश्विन कहते हैं कि जब आपके बच्चे बड़े हो रहे होते हैं और आप उन्हें छोड़कर विदेश में सिर्फ पानी पिलाने या बेंच गर्म करने के लिए बैठे रहते हैं, तो वो त्याग (Sacrifice) बेकार लगने लगता है। इसलिए, उन्होंने फैसला किया कि अब वो अपनी शर्तें पर जिएंगे और खेल से इज्जत के साथ विदा लेंगे।

वाकई, अश्विन जैसा लीजेंड डिजर्व करता था कि वो मैदान पर खेलते हुए विदा हो, न कि बेंच पर बैठे हुए। उनका यह खुलासा बताता है कि खिलाड़ियों के लिए मेंटल हेल्थ और आत्म-सम्मान (Self-respect) कितना मायने रखता है।

आप अश्विन के इस फैसले के बारे में क्या सोचते हैं? क्या टीम मैनेजमेंट को विदेशों में उन्हें और मौके देने चाहिए थे? कमेंट करके जरूर बताएं