अमेरिका में एच-1बी वीजा पर संकट: भारतीय टेक प्रोफेशनल्स के लिए बढ़ती चुनौतियाँ

अमेरिका की सख्त इमिग्रेशन नीतियों के कारण कानूनी और गैरकानूनी, दोनों तरह के प्रवासी असमंजस में हैं। खासतौर पर सिलिकॉन वैली में ट्रंप सरकार की नीतियों का विरोध हो रहा है, जिसका मुख्य कारण एच-1बी वीजा कार्यक्रम है।

भारतीय इंजीनियर कबीर (बदला हुआ नाम) सिलिकॉन वैली में एक स्टार्टअप में काम करते हैं। उन्होंने बताया कि यदि उनकी नौकरी चली जाती है, तो उन्हें अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है क्योंकि एच-1बी वीजा पर रहने के लिए कंपनी की स्पॉन्सरशिप आवश्यक होती है। ग्रीन कार्ड मिलने से स्थायी रूप से अमेरिका में रहने की अनुमति मिलती है, लेकिन बढ़ती संख्या के कारण भारतीय आवेदकों को 108 साल तक इंतजार करना पड़ सकता है।

एच-1बी वीजा धारकों की चिंताएँ और विवाद

एच-1बी वीजा को 1990 में कुशल विदेशी कामगारों के लिए लाया गया था ताकि अमेरिकी बाजार में पेशेवरों की कमी को पूरा किया जा सके। इस वीजा की अवधि तीन साल होती है, जिसे बाद में तीन साल के लिए बढ़ाया जा सकता है।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रोग्राम अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल नहीं हुआ।

🔹 कंपनियां कम वेतन में विदेशी कर्मचारियों को रखती हैं, जिससे अमेरिकी कामगारों को नुकसान होता है।
🔹 एच-1बी वीजा धारकों को अमेरिकी कर्मचारियों के समान अधिकार नहीं मिलते हैं।
🔹 नौकरी छूटने पर केवल 90 दिन में नई नौकरी ढूंढनी होती है, वरना देश छोड़ना पड़ता है।

हॉवर्ड यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ रॉन हीरा का कहना है कि एच-1बी वीजा धारकों की स्थिति अस्थायी होती है और वे पूरी तरह से अपने नियोक्ता पर निर्भर होते हैं। वे अपने बॉस को ‘ना’ कहने से डरते हैं, क्योंकि नौकरी जाने का मतलब अमेरिका छोड़ना होता है।

ग्रीन कार्ड बनाम एच-1बी वीजा: सिलिकॉन वैली का ‘गहरा राज’

सिलिकॉन वैली की टेक इंडस्ट्री विदेशी कुशल कामगारों पर निर्भर है, लेकिन बड़ी टेक कंपनियां ग्रीन कार्ड आवेदकों की बजाय एच-1बी वीजा धारकों को प्राथमिकता देती हैं।

वाओनिक्स बायोसाइंस के सीईओ विवेक वाधवा इसे सिलिकॉन वैली का “गहरा राज” बताते हैं। वे कहते हैं,
“अगर आप एक बड़ी टेक कंपनी चला रहे हैं, तो आप ऐसे कर्मचारी रखना चाहेंगे जो लंबे समय तक कम वेतन में काम करें। यह पूरी तरह आर्थिक निर्णय है।”

हालांकि, यह भी सच है कि सिलिकॉन वैली के कई बड़े नेता खुद प्रवासी पृष्ठभूमि से आते हैं:

सुंदर पिचाई (गूगल के सीईओ) – भारत
सत्य नडेला (माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ) – भारत
जेन्सेन हुआंग (एनवीडिया के संस्थापक) – ताइवान
एरिक युआन (जूम के सीईओ) – चीन
इलॉन मस्क (स्पेसएक्स और टेस्ला के सीईओ) – दक्षिण अफ्रीका

ट्रंप प्रशासन और भारतीय टेक माइग्रेशन पर असर

पहले ट्रंप प्रशासन ने “अमेरिकी खरीदो, अमेरिकियों को नौकरी दो” नीति के तहत एच-1बी वीजा का विरोध किया था। लेकिन इस बार उनका रुख थोड़ा नरम दिख रहा है।

सिलिकॉन वैली चैंबर ऑफ कॉमर्स की सीईओ हरबीर कौर भाटिया का मानना है कि टेक इंडस्ट्री के प्रमुख ट्रंप की नीतियों को प्रभावित कर सकते हैं।


भारतीयों के लिए बढ़ती मुश्किलें और भविष्य की संभावनाएँ

एच-1बी वीजा धारकों में 70% से अधिक भारतीय होते हैं, इसलिए इस नीति में बदलाव उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

🔹 भारतीयों को अक्सर नफरती हमलों का सामना करना पड़ता है।
🔹 उन पर आरोप लगाया जाता है कि वे अमेरिकियों की नौकरियां छीन रहे हैं और वेतन घटा रहे हैं।
🔹 भारतीय आईटी कंपनियां एच-1बी वीजा पर आउटसोर्सिंग बिजनेस के लिए निर्भर हैं।

लेकिन इस अनिश्चितता के कारण कई भारतीय पेशेवर अमेरिका छोड़कर भारत लौट रहे हैं और खुद की कंपनियां शुरू कर रहे हैं।

विवेक वाधवा का कहना है कि अगले 5-10 वर्षों में भारत में कई ‘सिलिकॉन वैली’ उभर सकती हैं। वे खुद भी अपनी कंपनी भारत में स्थापित कर चुके हैं।

अगर ट्रंप प्रशासन ने कुशल प्रवासियों के लिए और कड़े नियम बनाए, तो यह अमेरिका के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। कई प्रतिभाशाली लोग अपनी इनोवेशन और स्किल्स को लेकर दूसरे देशों का रुख कर सकते हैं।