जब एक सीट से खड़े हो गए थे हजार से ज्यादा उम्मीदवार… तो बैलेट पेपर की जगह पूरी ‘किताब’ छपवानी पड़ी थी

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों (Assembly Election 2022) की तारीखों का ऐलान हो चुका है. सभी पार्टियों ने चुनाव को लेकर कमर कस ली है. सिर्फ पार्टियों ने ही नहीं, बल्कि उन उम्मीदवारों ने भी तैयारियां शुरू कर दी है, जो इस बार निर्दलीय ही चुनावी मैदान में उतरने वाले हैं. हर बार पार्टी उम्मीदवारों के साथ बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवार भी मैदान में उतरते हैं. एक बार तो तमिलनाडु (TamilNadu) की एक सीट पर इतने निर्दलीय उम्मीदवारों ने पर्चा भर दिया कि चुनाव आयोग (Election Commission) को मतदान की तारीख भी आगे बढ़ानी पड़ी.

जी हां, यह चुनाव इतिहास का सबसे खास चुनाव माना जाता है, जिसमें सबसे ज्यादा लोगों ने अपनी दावेदारी प्रस्तुत की थी. उस वक्त जमाना भी बैलेट पेपर का था, तो सोचिए कितने पन्नों को बैलेट पेपर बना होगा और किस तरह से लोगों को नाम उसमें जोड़ा गया है. ऐसे में आज हम आपको उस चुनाव की ही कहानी बताते हैं कि उस चुनाव में कैसे चुनाव हुए थे और क्या क्या बदलाव किए गए थे. तो जानते हैं इतिहास के इस चुनाव की खास बातें…

कहां हुए थे ये चुनाव?

यह बात है साल 1996 की है, जब तमिलनाडू में विधानसभा के चुनाव होने थे. इस चुनाव में वैसे तो सबकुछ सामान्य रहा, लेकिन राज्य की एक विधानसभा सीट मोदाकुरिची काफी चर्चा में रही. इस सीट के चर्चा में रहने का कारण यहां चुनाव में खड़े होने वाले प्रत्याशियों की संख्या. दरअसल, उस चुनाव में यहां से 100-200 ने नहीं बल्कि हजार से ज्यादा लोगों ने नामांकन पत्र दाखिल कर दिया. अब सोचिए किसी सीट से 1000 से ज्यादा आदमी चुनाव लड़ रहे हो तो क्या ही माहौल रहा होगा.

एक महीने आगे बढ़ाने पड़े चुनाव

बता दें कि इस चुनाव में यहां 1033 लोगों ने अपने दावेदारी प्रस्तुत की. इतने लोगों के नामांकन आने के बाद चुनाव आयोग को भी काफी मुश्किलें हुईं. ऐसा कम ही होता है कि एक सीट से 1000 से ज्यादा लोग चुनाव लड़ने पहुंच जाए, लेकिन क्या किया जा सकता है. लोकतंत्र में सभी को चुनाव लड़ने का अधिकार है, ऐसे में उन्हें कोई मना भी नहीं कर सकता था. इतने लोगों के चुनाव में खड़े होने के ऐलान के बाद चुनाव आयोग को काफी मुश्किल हुई और आयोग ने चुनाव एक महीने आगे बढ़ा दिया गया.

चुनाव आयोग ने की खास व्यवस्था

रिपोर्ट के अनुसार, दरअसल, चुनाव आयोग को तैयारी के लिए कुछ वक्त चाहिए था ताकि 1000 लोगों को वोट देने के लिए व्यवस्था की जाए. उस वक्त बैलेट पेपर का जमाना था, इसलिए आयोग ने 1033 नाम वाले बैलेट पेपर छपवाए. वैसे आम तौर पर बैलेट पेपर 1-2 पेज के होते थे, लेकिन इस चुनाव में तो कई पेज वाला बैलेट पेपर छपा. कहा जाता है कि वो बैलेट पेपर नहीं था, बल्कि पूरी किताब ही थी. उस वक्त जिसने इस बैलेट पेपर पर वोट दिया होगा, उससे पहले तो नाम खोजना पड़ा और फिर उन्होंने वोट दिया होगा.

इसके अलावा उस वक्त चुनाव आयोग ने जमानत राशि को भी बढ़ा दिया था. इस रिपोर्ट के अनुसार, आयोग ने अनरिजर्व्ड कैटेगरी के लिए 250 रुपये और एससी-एसटी के लिए 125 रुपये जमानत राशि तय कर दी थी. साथ ही बैलेट पेपर की साइज बढ़ाई गई और मतदाताओं को पूरा बैलेट पेपर पढ़ने के लिए टाइम भी दिया गया. इस वजह से आयोग को पोलिंग टाइम को भी बढ़ाना पड़ा और इन बैलेट पेपर को रखने के लिए खास व्यवस्था की गई, क्योंकि एक पेपर अब किताब था. साथ ही मत पेटियां भी दूसरी तरीके से डिजाइन की गई, जो काफी बड़ी थी.

कई लोगों को नहीं मिला एक भी वोट

अब चुनाव इतना रोचक है तो इसका रिजल्ट भी काफी रोचक रहा था. फैक्टली की एक रिपोर्ट के अनुसार, उस चुनाव में 88 उम्मीदवार तो ऐसे थे, जिन्हें एक भी वोट नहीं मिला था यानी उन्होंने खुद को भी वोट नहीं दिया था. वहीं, 158 उम्मीदवार ऐसे थे, जिन्हें सिर्फ एक वोट मिला था. कई उम्मीदवार दिहाई के आंकड़े तक ही सीमित थे, इस वजह से इस चुनाव के तो नतीजे भी काफी रोचक रहे थे. यहां पर प्रत्याशियों की संख्या 1088 थी, जिसमें से 42 रिजेक्ट हुए थे और 13 ने नाम वापस ले लिए.

क्यों खड़े हो गए इतने लोग?

अब सवाल ये है कि आखिर उस चुनाव में इतने लोगों ने क्यों चुनाव लड़ा. उस वक्त किसान फेडरेशन नाराज चल रहे थे और वो सरकार का ध्यान अपनी मांगों की ओर आकर्षित करना चाहता था. इस वजह से कई किसानों ने चुनाव लड़ने का फैसला किया ताकि सरकार उनकी तरफ आकर्षित हो. इस वजह से बड़ी संख्या में लोगों ने चुनाव लड़ा था.

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