कालाष्टमी पर अष्ट भैरव के व्रत-पूजन से मिलेगा असीम शक्ति का फल

श्रीलिंगपुराण में 52 भैरवों का उल्लेख है, लेकिन कालाष्टमी पर मुख्यत: काल भैरव-बटुक भैरव की पूजा होती है, लेकिन प्रमुख रूप से आठ भैरव .असितांग भैरव, रुद्र या रूरू भैरव, चण्ड भैरव, क्रोध भैरव, उन्मत्त भैरव, कपाली भैरव, भीषण भैरव और संहार भैरव माने गए हैं.

आदि शंकराचार्य ने भी खुद ‘प्रपञ्च-सार तंत्र’ में अष्ट भैरव का उल्लेख किया है। तंत्र शास्त्र में भी इनका वर्णन है। सप्तविंशति रहस्य में सात भैरव दर्ज हैं तो इसी ग्रंथ में दस वीर भैरवों का भी उल्लेख है। इसी में तीन बटुक-भैरवों का उल्लेख है, रुद्रायमल तंत्र में 64 भैरवों के नाम हैं। हिन्दू मान्यता के मुताबिक हिन्दू कैलेंडर में हर माह आने वाली कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि मासिक कालाष्टमी होती है. यह अष्टमी भैरवजी को समर्पित है, इसलिए इसे काला अष्‍टमी कहा गया है। यह तिथि भैरवजी से असीम शक्ति पाने का समय मानी गई है, जिस दिन व्रत पूजन का खास महत्व है.

कालाष्टमी से जुड़ी पौराणिक कथा
पौराणिक कथा अनुसार एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेशजी में श्रेष्ठता की लड़ाई छिड़ी. बहस बढ़ी तो सभी देवता बुलाए गए और बैठक की गई. सबसे पूछा गया कि श्रेष्ठ कौन है? सभी ने विचार व्यक्त किए और एक उत्तर खोजा गया, लेकिन इसका समर्थन भोलेनाथ और विष्णुजी ने तो किया, लेकिन ब्रह्माजी अड़ गए. मान्यता है कि उन्होंने शिवजी को कुछ कठोर शब्द कह दिए. इससे भड़के शिवजी ने इसे अपमान समझा. उन्होंने अपने क्रोध से भैरव को जन्म दिया, इस भैरव अवतार का वाहन काला कुत्ता बना. इस अवतार को ‘महाकालेश्वर’ भी कहा गया, और दंडाधिपति भी कहलाए. शिवजी का यह रूप देखकर सभी घबरा गए.

यहीं भैरव ने ब्रह्माजी के 5 मुखों में से एक को काट दिया, तब से ब्रह्माजी के पास चार मुख हैं। ब्रह्माजी के सिर को काटने पर भैरवजी पर ब्रह्महत्या का पाप आ गया. ब्रह्माजी ने भैरव बाबा से माफी मांगी तब जाकर शिवजी अपने असली रूप में आए. भैरवजी को पापों का दंड मिला और उन्हें भिखारी बनकर रहना पड़ा. वर्षों बाद वाराणसी में इनका दंड खत्म हुआ, जहां से भैरव का एक नाम ‘दंडपाणी’ भी पड़ा.

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