जीआई टैग से जनजातीय संस्कृति-कला को मिलेगी पहचान, बढ़ेंगे रोजगार के अवसर : डॉ. गोविल

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भोपाल, 23 सितंबर (हि.स.)। जनजातीय कार्य विभाग के वन्या प्रकाशन द्वारा शुक्रवार को कुशाभाऊ ठाकरे इंटरनेशनल सेंटर में ‘जियोग्राफिक इंडिकेशंस चैलेंजेस एंड द वे फॉर्वर्ड’ विषय पर एक दिवसीय सेमीनार किया गया। इसका शुभारंभ जनजातीय कार्य विभाग की प्रमुख सचिव डॉ. पल्लवी जैन गोविल ने किया। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज के उत्पादों, कला और कलाकृतियों को संरक्षित किए जाने के प्रयास को आगे बढ़ाने के लिए यह आयोजन किया गया।

उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज संकोची होता है। अत: उनकी कला एवं संस्कृति की विरासत को संरक्षित और सुरक्षित कर उसका अस्तित्व बचाए रखना बहुत जरूरी हो जाता है। हमारा उद्देश्य जीआई टैग से जनजातीय संस्कृति व कला को पहचान दिला कर रोजगार के अवसर प्रदान करना है। साथ ही इसे आमजन तक पहुँचाना भी जरूरी है, जिससे जनजातीय लोगों के लिए अनुसंधान और आर्थिक लाभ के अवसर सृजित किए जा सकें।

सेमीनार में विशेषज्ञ पद्मश्री रजनीकांत ने कहा कि भारत की जीआई ही सोने की चिड़िया है। यही जीआई भारत की आत्मा भी है जिसे संरक्षित और संवर्धित करने का प्रयास किया जा रहा है। इसी उद्देश्य से आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में हमने देशभर के 75 उत्पाद का जीआई रजिस्ट्रेशन किया है। यही जीआई प्रोडक्ट्स पहले देश की जीडीपी का बड़ा हिस्सा हुआ करते थे जिसके कारण पूरी दुनिया के भारत से व्यापारिक संबंध थे।

जीआई टैग आवेदनों पर हुए हस्ताक्षर

जनजातीय कार्य विभाग की उपसचिव एवं वन्या की प्रबंध संचालक मीनाक्षी सिंह ने केन्द्र सरकार के वस्त्र मंत्रालय की टेक्सटाइल कमेटी के डॉ. तपन कुमार राऊत के साथ मध्यप्रदेश के 7 उत्पाद के लिए जीआई टैग आवेदनों पर हस्ताक्षर किए। वन्या द्वारा विभिन्न जनजातीय क्षेत्रों के उत्पादों की जीआई टैगिंग का कार्य किया जा रहा है, जिसके प्रथम चरण में अनूपपुर के काष्ठ शिल्प (मुखौटा), झाबुआ की गुड़िया, शहडोल, अनूपपुर और डिंडौरी का जनजाति वाद्ययंत्र बाना एवं चिकारा, धार, झाबुआ, खरगौन, बड़वानी और अलीराजपुर का हस्तशिल्प बोलनी, पोतमाला एवं गलशन माला की जीआई टैगिंग का कार्य किया जा रहा है। इसे केन्द्र सरकार के वस्त्र मंत्रालय के उपक्रम टेक्सटाइल कमेटी के सहयोग से किया जा रहा है।

जनजातीय एवं जीआई टैग उत्पादों की लगाई गई प्रदर्शनी

सेमीनार में मध्यप्रदेश के जनजातीय और अन्य कला उत्पादों की लघु प्रदर्शनी भी लगाई गई। इसमें पिथौरा चित्रकला, भीली गलशन माला, पोत माला, लकड़ी के मुखौटे, भीली दुल्हन श्रृंगार पेटी बोलनी, बेल मेटल, चंदेरी साड़ी, बाग साड़ी और महेश्वर साड़ी प्रदर्शित की गईं। वहीं, दुर्लभ गोंड वाद्ययंत्र बाना परधान और चिकारा परधान भी विशेष रूप से प्रदर्शित किए गए। साथ ही जनजातीय अंचलों के खाद्य उत्पाद जैसे सफेद मूसली, कोदो, कुटकी और कड़की भी प्रदर्शित की गई। प्रमुख सचिव डॉ. गोविल सहित सभी अधिकारी एवं विशेषज्ञों ने प्रदर्शनी का अवलोकन किया।

डिंडौरी के जनजाति वादक धरम सिंह वरकड़े ने दुर्लभ जनजातीय वाद्य यंत्र बाना का वादन किया। उन्होंने पितृपक्ष में पूर्वजों और जनजातीय राजाओं के सम्मान में गाए जाने वाले गोंडी लोकगीत की प्रस्तुति दी।

सेमीनार में देश और प्रदेश के कला क्षेत्र एवं जीआई के विशेषज्ञ, कला समीक्षक, विधि विशेषज्ञ, कलाकार, उत्पाद निर्माता-विक्रेता आदि शामिल हुए। प्रमुख सचिव कुटीर एवं ग्रामोद्योग मनु श्रीवास्तव, जनजातीय कार्य विभाग आयुक्त संजीव सिंह, उप सचिव मीनाक्षी सिंह, एमडी हस्तशिल्प विकास निगम अनुभा श्रीवास्तव, अपर आयुक्त केजी तिवारी, डायरेक्टर टीएडीपी रवीन्द्र सिंह चौधरी उपस्थित रहे। केन्द्र सरकार की टेक्सटाइल कमेटी, टीआरआई, नाबार्ड, ट्राइफेड, टीएडीपी, मैपसेट, दिल्ली विश्वविद्यालय, हस्तशिल्प विकास निगम, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, फीडस लॉ चेंबर्स, ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन आदि के प्रतिभागी भी शामिल हुए।

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